पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१६३

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१६८ इस कारण लगनका अच्छी तरह विचार करना परमा- ! और वृहस्पति धनुगनिम हो एवं आठवें स्थानमें महल गया है, लगन स्थिर नहीं होने जाता ज्ञापनका रहे, तो जानरको चौदह दिनमें मृत्यु होगी। मिथुन शुभाशुभ नहीं जाना जा सकता। लगनसे गणित्रके सनम हो कर जयंटमें शनि. मनममय रहने से द्वादश गृहको दादा लग्न कहते हैं । जैसे-लगन, बन, मिथुनलानििष्ट होनी है। बटलग नम जन्म हो कर सोदर, चंधु, पुत्र, रिपु, पनी नियन. धर्मकर्म, आय और , तुला वा कुम्मन यदि हरपति तथा बह राहु वा मदन्ट- श्यय, उन हादग गृहको द्वारा लगनलइने है । जैसे घन से देखा जाय. तो करंट लग नरिष्टि. दि सिंहलग नमे लग न. सोटर लगन, बन्धु लग्न, इत्यादि। किंतु गनिमे जन्म हो तथा चन्दलग नमें हें और मर मिन्न अन्य रविके उदय कालकर लगन ही प्रधान है । उसीको प्रधान गनिमें गनि और रवि हो. तो सिंहलग नरिष्टि यदि लक्ष्य करके अन्यान्य विषयोंका विचार करना होता है। कन्या लगनमें जन्म हो नया उन लगन में चन्द्र तथा वृह लगनभायफन्टका शिम विवरण नीचे लिखा जाता है। पनि रेन्द्र में शनि रहे, तो कन्यालगनगिष्टि, तुलालगन- जो जो भावपनि लग नले अथवा भायम्यानले छटे, जात तिरे छठे घरमें शुक नया दगनमें चन्द्र रहेको आश्वें और बारहवेंमे रहे. नो उस उस मावोत्य कनकी तुला दग नरिष्टि, मिनालग नजान पनि पार्क टने हानि होती है। अतएव किगे मायका शुभाशुभ विचार चन्द्र, धनुलंग नज्ञात व्यक्तिरे लग नमें पनि नथा करने में देखना होगा, कि वह गावपनि लगनसे नया मामे गानि रहे. नगलग नजात ध्यान मेपमें चन्द्र भावस्थानले कहां है । यदि दोनों स्थानसे शुभ स्थानमें और सिंहम रवि. अम्मानज्ञान व्यन्ति चतुर्थमे चन्द्र स्थिन हो, नो उस भावमलका सम्पूर्ण फल नया शुमा वान्या अथवा तुला में शुक्र मीना नजान व्यनिके शुभ न्धान हो, तो फलका भी शुभाशुभ होता है। लगनने चन्द्र बार वृश्चिा गनि रहनेने लगनर्रािष्ट्र ___ वृहज्जातकके टीकाकार भट्टोत्पलका मत है, कि होती है। ये सर निष्ट हो जातको मृत्यु या फेवल छठे म्यानको छोड कर अन्य स्थानका शुमप्रह करती है। भाववृद्धिकर हुआ करता है। छठे स्थानका अशुभप्रह' प्रत्येक लगनको सन्म पर पढ़ वर्ग किया जाता है। शशुभप्रद होने पर भी शत्रुनानक होता है। लग्नसे पड वर्ग इस प्रकार है, लगन, होरा, देहाण, मतांग, छठा, आठवां और बारहवां म्यान दु.स्थान है। उन । नवांश, दशाम और विज्ञान के लिबाग ना म्यानका ग्रह वा भावपनि अशुभप्रद होता है । अतएव मकुटनायन करनेसे और में मून्न होता है। विना ग्रहाका छटा, आठवां और बारहवा सन्बन्ध होनेने टी मटके अंग सन्न नहोला। मिदलग नमें जन्म फलकी न्यूनता काना नो होगा। इसमें विपना नया है. कहनेने फुटमाघन किया जाता है। इसमें यह है. कि जैसा ऊपर कह आये है, शुभ और स्वामिग्रह- मिहलगाके तिने अंग और शिननी राम जन्म हुआ के योगसे शुभफल हुआ करता है, लेस्नि छठे, याठवें है, लो मान्म होता है। चन दे । सौर बारहवें स्थानले मन्यन्धमे विष विधि यह है, लग्नान-यदि मेर, मिंद वा धनुलग न हो और उस कि उनका विपरीतक्रममे विचार करना होता है अर्थात् । स्थान में रवि रहे. नो जातक गृहस्थ, धर्मपालर, बन्धुओं- शुभप्रहले इस स्थानमें रहनेले अशुभ और अशुभग्रहक का हितकारी, उद्धत, बनवान, कतत्वाभिमानी, समा- रहनसे शुभ होता है। शील. मानी, उदारचिन, दाग्निक और उच्चामिलापो दादर लग्नरिष्टि । मेष लग्नमें यदि जन्न हो । होता है। किन्तु कर्कट अथवा नुलालगन होनेसे ढग्नमें चन्द्र, मङ्गल तथा मकर मिन्न अन्य किनी नागिमें तथा उस लगनके ८ अंजके मध्य रश्केि रहनेले वक्र गनि और रवि रहे तो जानवाल की तीन दिनकै नीतर नक्ष, नेत्ररोग और शिर.पीडा होती है न जातव्यक्ति मृत्यु होती है । यदि दृप लग्नमें जन्म हो तथा वह प्रायः आत्मश्लाघी, पारहित और पुत्रहीन होता है। ... लग्न बृहस्पति वा शनिले छठे म्यानमे रहे अर्थात् नि। उस रवि टोनों पार्क में अथवा उसके सातवे में शनि