पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१६४

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१६६ गौर मरके रहनेसे जातक अपायु होता और उसे | उसको स्त्रिया साग सुन्दरी होती हैं। जितु लग्नगत पितृरिष्टि होती है। यदि मेष, वृष अथवा कट लगन शुक्र पापयुक्त हो या पापसे देखा जाय, तो वह नाचत- हो और यहा पूर्ण वा बलवान चन्द्र रहे तो जातक रूप, प्रिय, नोचामोदरत, अपथ्ययो, क्रोडासत और परसोरत घान् प्रियदशन, गुणवान धनी गति और भागामान होता है। होता है। उप तो राशि डोड पर लगननात चद्रके यदि तुला, धनु बुम्म या मीनराशि लान हो और क्षीण होनेसे तथा उसके साथ अपघा उसके मातये मे लग्नमें शनि रहे, तो जातक दीर्घायु, ऐश्वयाशा की तथा क्सिा शुमप्रहये नही रहनेसे जातवाल मलिन, मसुस्थ, पहुलोकमतिपालक होता है। मतान्तरमें वृप मिथुन या भ्रमणशीठ और दुबला पतला होता है। उसकी अवस्था पण्यालग्नमें शनि रहनेसे उक्त प्रकारका फर हुआ करता पदलती रहती है अथात् कमी हास और कमी वृद्धि है। उस शनिके सप्तमम यदि गृहम्पति रहे, तो माघ होती है। उस चद्रके उभय पार्शमे अथवा उसके परम ऐश्वपाशाली होता है । शिन्तु लग्नगानिके अन्य सातये शनि और मङ्गरफे रहनेसे जातक अल्पायु होता| राशिमें रहनेसे मानय कातिहीन, अशोभन दस्मया, और उसका मातृरिष्टि होती है। सनदा प्याधिपीडित, नीचाशय और सुरतविहान होता शुमप्रहसे ए हो कर मनल्फा यदि लय रहे तो है। मेपसे क्या पर्वत इन छ राशिके मध्य कोई मानक तेनम्यो उग्र स्वभावयाला, साहसी, वयान, राशि लग्न होनेसे तथा यहा राहु के रहने से मानय काय टाम्भिा और धीर होता है। उस मङ्गलफे सहममें पृह । प्रहरिष्टिसे मुक्लिारा करता है। इस विपरीत होनेसे पतिफे रहनेसे यह ऐश्वर्यशाली और राजाके समान राहु अशुभ फल देता है। फतु लग्नमें रहने से गनाधीन छोता है। पितु पापदष्ट होनेसे इसका विपरीत फल फलका हास होता है । लग्नस्थित प्रद जिम प्रकार फल होता है। अर्थात् जातक कादप्रिय, क्षतशरीर मा स्वर । प्रद होता है उसी प्रकार नाधिपति द्वारा भी फल दोषयिलिए फूरचेष्टाचित, इद्रियासक्त, मोघी, मद्य । निर्णय किया जाता है। मासप्रिप, चञ्चल, निग्लास, मलिन, उदर वा दम्भरोगी। अग्नाधिएकम-लग्नाधिपनिके रानमें रहनेमे जातक और मशादि गुहारोगी हुआ करता है। मागानान् रिपुनयो पहु परिजनयुक्त तथा भपने वधु रानमें खास पर मिथुन और यारग्नमें युधके रहने वर्ग में श्रेष्ठ होता है। अलग्नाधिपके द्वितीय स्थानमें से ज्ञातव्यरि, मियघद, सुचनुर, मिष्टभापी यधुओंका रहनस मनुष्य गपने यत्न और परिश्चमसे धन कमाता है। हितकारी, कौतुरी धनी, सद्वक्ता, यणिक पा शास्त्रवेत्ता लग्नाधिपके तृतीय स्थान रद्दनेसे जातक दाम्भिक, होता है। बिनु लग्नस्थ बुध, शनि था मगलफे द्वारा अभिमानी, भ्राता, हाति या प्रतिमासीकी बशताप न दृष्ट हानेसे जातक वाचार, मिथ्यावादी मन्दमति मम्मान तथा प्रमापरत होता है। चतुर्थ स्थानमें रहनेसे यह पितृ 13, मविश्वासा, प्रपञ्चक, कपटी और चोर होता है। सम्पत्ति उत्तम यादन, उत्तम पासम्धान और भूमिलाम मकर भिन्न अन्य रिसा गर्म गृहरपतिफ रहनेसे | करता है। पिकायमें ही उसे सफलता प्राप्त होती है। जातक युद्धिमान स्वधमानुरत, रिविध शास्त्रमा सम्पम, लग्नाधिपके पञ्चम स्थान में रहनेसे मानर साततियुक्त, सदुपदेष्टा, रोषपूज्य रानसम्मारित, भागारान् और मलस पिलासप्रिय, क पनाशक्ति विशिष्ट और बुद्धि ऐश्वर्यशाला होता है। मान होता है। ६ठे स्थानमें रहनेसे पीडा, शसुरद्धि या लग्नमें शुमके रहनेसे जातक पिलासी, गुणवान वध पन्धन होता है। किन्तु शुभग्रहदष्ट होनेसे मामा या सुन्दरो स्त्री अथवा बहु ललनायुक, शिल्पशास्त्रविशारद, चाचासे सहायता पानेको सम्भावना है। स्नाधिपके मङ्गीत और वायगारप्रिय, सदालापी और प्रफुल्लचित्त | सप्तम स्थानमें रहनेसे यौवनावस्थामें एकसे अधिक स्त्री घाला होता है। यदि तुला उग्न हो तथा उसमें शुक्र और लाम, बासस्थानका परिवर्तन, विदेशयात्रा और मनु कुम्भराशिमें वृहस्पति रहे, तो पुरुष सुदर होता है या घृद्धि होती है तथा जातक अपना घुद्धिके दोषाम अपना ___Vol xY 43