पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१७०

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सङ्कटा-लङ्का लहरङ्कटा (स० सी०), सुकेर राक्षसका माता और । पनसे इम पुरीको बनाया है। राक्षम इम पुरीमें रह विद्युत्पेशरी पन्याका नाम । (रामायण ७४१२३)। पर अत्यात दुर्ग हो गये थे। पीछे विणुके भयसे २सन्ध्याको न्याका नाम। उन्होंने इस पुरोका परित्याग कर पाताल में माधय प्रहण लड्नाप (१००) १ रायण । २ विमीपर । किया। कुछ दिन यह पुरो विना राक्षसके रहो। रडूनायक (स.पु.) लक्ष्नाप देखा। पाडे कुवेर विश्रयाकी आमासे लङ्कापुरीक अधीश्वर रङ्का ( स० स्त्री०) रमऽम्यामिति रम् बाहुलशात् का हो पा रहनगे। इसके बाद जवरायण तपोवलसे बल रस्य लत्व ( उया २०४०) टाप। रक्ष पुरी रावणका घान हो उठा और उसे यह मालूम हुआ कि लडापुरी | हमारे पूर्वपितृपुरुषोत्री निवासभूमि है तष उमने रड्डा ज्योति शास्त्रके मतसे यह लडा पृथितीके घाममागमें | छोड देनेने लिपे कुघेरके पास एक दूत भेना। कुर अगस्थित है। रामपाके मयसे पुरीको छोड ले गपे । रापण लङ्काका "margमध्ये यमकाटिरस्या प्रारूपश्चिमे रोमकपतन ।। गधीश्वर हुमा । (रामायण उत्तरका०) रावण देखो। भधस्तता सिद्धपुर सुमसौम्यऽथ याम्य पहपानभरच" रामचन्द्र कपिसैयको साथ ले सीताफ उद्धार के लिये (सिद्धान्तशिरोमणि )| रडा गपे थे। वह लड्डा कहा है, उसका यत्तमान नाम अग्निपुराणमें लिखा है, किरदापुरी तीस योजन | क्या है उसको उत्पत्ति सि प्रकार हुह तथा उसका विस्तीर्ण होस पुरीक प्रकार लोने बने हैं। दक्षिण प्राचीन और आधुनिक इतिहास परा है, उसके कुछ समुद्रफे किनारे त्रिकुर नामक एक पर्वत है। उस प्रमाण चे दिये जाते हैं :- पर्वत शिखर पर मध्यम समुडके समीपटाने बहुत वर्तमान देशी और विदेशी भौगोलिकगण एक परिश्रम करके रदके रिपे यह पुरो पनया । इस पुरोमें | म्बरसे कहते हैं, कि अमी जिसको हम रोग सिहल या चिडिया भी नहीं ना सकती है। राक्षस सुनसे इस सिरोन कहते है उसीका प्राचीन नाम रहा है। किन्तु पुरोम वास करते थे। ये अमरावताके सदृश इसरडा। यह सिद्धान्त ठीक नही जचता, यहुत पहले होसे हम नगरोको पायानक दुगधर्व हो गये थे। लोगोंके पुरणानि शास्त्रकारगण रडा और सिहलको दो "भियोजनधीस्तीयो स्वर्ण प्राकारतोरणाम । स्वतन द्वीप जानने थे। महाभारत और पुराणादिमें दतियास्योदधसारे विकूगे नाम पर्वत ॥ वह विशेषभावमें वर्णित है। शिखरे तस्य शैलम्य मध्यमाम्बुधिसन्निधौ । 'सिमान वळारान् म्लेन्धान ये च भवानियासिन ।" पतत्रिमिष दुष्यापोटदिनां चतुर्दिम् ॥ (महाभारत, घन ५१ अ० २२ श्लो०) समाय मत्ता पूर्व प्रयत्नात् बहुवत्सरे । "सहा कामाजिनारचव शैक्षिका निक्टास्तथा 100 स तु तत्र दुद मुख रामसपुलवा । ऋषमा सिंहतारचव तथा काशीनिवासिन !" २७ महादुर्ग समासाद्य शत्र या शत्रु सदना। (मायडेयपुराण ५८०) दुराधर्षा भविष्यन्ति राक्षसवाहुभि वा ॥" फिर भागवत ५१६३०, पृहत्साहिता १४१५ मादि (मग्निपु० कपिलदान माध्याय) | प्राचान प्रपोम लड्डा और सिहलशे दोस्पतन द्वाप रामायण में लिखा है, दिक्षिण सागरक किनारे बताया है। त्रिकुट नामक एक पन है। उम शिखर पर अमरायती रामायणमें दक्षिणदेशाय स्थादिका उल्लेख करते सहारा लड्डा नामक पर विगार पुरी है। यह सुन्दर पुरी समय लिया है.-मलय पर्वतक वाद ताम्रपर्णी नदी। सोनेकी दीयार और बाइसे घिरी है। उसक सभी यह नदी समुदमें गिरी है। इस नदोशे पार परलेसे दरपाले सो और पैगामणिके हैं। समौ स्थान पत्रोंसे पानगर मिरता है। उस नगरका पुखार सोने सुसजित है। राक्षमोक रहीके रिपे विश्यमाने पर बना है। इसके । समुद्र पहता है। समुद्र पार करनेस