पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१७१

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सागरफे मध्य अगस्त्यनिवेशित महेन्द्र पर्वत देखने में , करनेसे ही सिंहल द्वीप जाया जाता था, इस कारण. आयेगा। उसके दूसरे किनारे सौ योजन विस्तृत अति- सिंदलद्वीपको पौराणिककाल में ताम्रपर्ण कहने थे। ग्रीकके शय प्रभायुक्त एक द्वीप है। उसी द्वीपमें रावण रहता था। प्राचीन पुगविदोका कहना है, कि पाण्डयनगर मुक्ता मिलने के कारण प्रसिद्ध था । किन्तु महाभारतके मतसे

  • * मनयस्य महौजसः।

लोग सिंहलद्वीपके निकटवी समुदसे मुक्ता निकालने द्रक्ष्यथादित्यसकाशमगस्त्यमृपिमत्तमम् ॥ थे। राजस्ययन के समय सिंहलद्वोएके लोगोंने ही गजा युधिष्टिरको मुक्ता उपहार में भेजी थी। ततस्तेनाभ्यनुजाताः प्रसन्नेन महात्मना । "समुद्रसार वैदूव्यं' मुक्तासशास्तथैव च । ताम्रपर्णी ग्राहजुष्टां तरिष्यथ मानदीम् । सा चन्दनवनश्चिनः प्रच्छन्नहीपघारिणी ॥ शाशश्च कुयास्तत्र सिंहताः समुगएरन् ॥" (सभापर्य ५२३६) कान्तेव युवती कान्त समुद्रमवगाहते। गमायणमें ही दूमरी जगह लिया है, कि हनुमानादि ततो हेममय दिव्यं मुनामणिविभूषितम् ॥ घानरगण सीताकी तलाश करते करते दक्षिणदेश पार यक्त कपाट पायच्याना गता द्रक्ष्यथ वानराः। फर एक अहानपूर्ण पतिगतग्में पहुंचे थे। उस स्थान- ततः समुद्रमासाथ सम्प्रधा निश्चयम् ॥ का नाम ऋक्षविल था । इसके चारों ओर दुर्गम पति- अगस्त्यनान्तरे तर सागरे विनिवेशितः। श्रेणी थी। यहां आ कर दानग्गण लान्त और पथ- चित्रसानुनगः श्रीमान् महेन्द्रः पर्वतीत्तमः ॥ भ्रान्त हो गये। उन्होंने पहले सुग्रीवसे सुना था, कि जातरूपमयः श्रीमान् अवगाढा महायर्यापम् । महेन्द्र पति के बाद समुद्र के दूसरे किनारे रावणनिवास द्वीपस्तस्यापरे पारे शतयाननविस्तृतः॥ लङ्काद्वीप है। किन्तु इस स्थानका नाम उन मयोंने पहले तत्र सर्वात्मना सीता मार्गिनव्या विशेषतः। कभी नहीं सुना था । बहुत प्रोज करने करने इस भयङ्कर ते हि देशास्तु ध्यस्य रावणस्य दुरात्मनः ।।" किष्किन्ध्याकाएड ४१ स०।१५२५ श्लोक) गहरके मध्य एक योजन जानेके बाद उन्हें एक रमणीय स्थान मिला। वह स्थान नील, वैदयांमणि और पद्मिनीसे मलय पर्वतका वर्तमान नाम पश्चिमघाट है। इस पर्वतके जिस स्थानसे ताम्रपणी उत्पन्न हुई है उस परिपूर्ण था। सोने और चांदीफे विमान यहां शोभा दे रहे थे। सभी घर चादी के बने थे, उनकी गिडकियां सोने- स्थानको अभी भी अगस्त्यादि कहते हैं । ( Cald | wil's Drastdian Grammar, Intro, P_18) तान्द्रः | की थी (इत्यादि ) । उन सवोंने थोड़ी ही दृर पर एक तपस्वितीको देपा। उमओ तपस्विनीसे उन्दै कुल वात पर्णी नदी तिनवेली प्रदेश होतो हुई समुद्रसे मिली है। मालूम हुई.- इस नदीके किनारे समुद्रके पास जो पाण्ड्यनगर "मयो नाम महातेजा मायावी वानरर्षभ । स्थापित था उसको प्राचीन अरबी और ग्रीक भौगोलिक तेनेद निर्मित सर्व मायया काचन वनम् ॥ 'कोलके और 'कोपल' तथा निकटस्थ सागरको 'कोल- पुरा दानामुख्याना विश्वकर्मा वभव ह। किकम'* कहते थे। समुद्रको पार करने से महेन्द्र पर्वत सतु वर्षमात्राणि तपस्तप्त्वा महावने ॥ मिलता है। यही सिंहलद्वीपका वर्तमान महिन्तल पर्वत पितामहावर लेभे सर्व मौशनस धनम् । होता है। जिस समयकी बात लिखी जाती है मालूम विधाय सर्व बलवान् सर्व कामेश्वरस्तदा। होता है, कि उस समय ताम्रपणी नदी-प्रवाहित भूमिखण्ड उवास सुखित कात कञ्चिदस्मिन् महावने । दक्षिणांशमें बहुत दूर तक विस्तृत था। इस नदीको पार तमप्सरमि हेमाया सक्त दानवपुङ्गवम् ।। विक्रम्यवाशनि.गृह्य जघानेशः पुरन्दरः।

  • "कानकिक्स समुद्रका वर्तमान नाम मन्नार-उपसागर है। इदश्च ब्रहाणा दत्त हेमायै वनमुत्तमम् ॥"

rcron) ( किष्किन्ध्या ५१ स. १०-१५ प्रयोक)