पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१७२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१७७ महा नेखो मायायो मयदानवने गायावल से इस ) सेतुका प्रस्तरखएड मानते हैं, वे समुद्र स्रोतसे फे के गपे काञ्चनमय यमभूमिको बनाया है। ये पहरे दानोंके । वाटू या रेतीले पत्थर (and stone) मात्र है। भूतस्य विश्यमा ये। जहोंने इस महायनर्म हसार पप तपस्या | विदोंने परोक्षा पर देखा है, कि ये मव लएड नितात करके पितामह ग्रहासे घर पाया था। उस परसे उन्हे | आधुनिक समयके हैं। (Ouden NCE Oost Ind 2n, मोशनस रचित सभी प्रकारका शिल्पशास्त्र प्राप्त हुआ। Ch xvp 218 ) इसके पास हो समुद्रफे निमल इस प्रकार सघशसि मम्पन और वसृष्ट भोग्य विषय | जरमें बहुतों प्रवार दखे जाते हैं। आगे चत्र पर माल में भोता हो कर कुछ समय सुखपूर्वक इस वनमें रहे। उन सब खण्डों में मिल र द्वीपापारमें परिणत होंगे। उस समय हेमा नाम्नी अप्सरामें घे मामर हो गपे इस । बहुतेरा कहना है, कि पहले सि हलद्वीप भारतके कारण देयराज रहने यन्त्र द्वारा उन्हें मार डाला था। साथ मिला था। विशेषतः वर्तमान रामेश्वर द्वीपसे “पोछे ग्रालाने हेमाको यह अनुत्तम वन प्रदान किया। सि हलका किनारा १०० योजन नहीं है। - महाय श नामक पालि प्रथफे मतसे सिंहलद्वीपके ५वीं सदी में पालि-प्राय महाप श पहले पहल रचा ए विभागका नाम मय है। वर्तमान आदमङ्गया गया। उस महाय शक मतसे सिहलका दूसरा नाम श्रीपादशैल और उसके निकटस्थ स्थानको पहुनेर मय लड़ा है। रितु उस समय (ों सदीमें ) प्रसिद्ध राज्य के अन्तगत मानते हैं। (Terent s Geylon tol वोनपरिवाजय यूएनचुवग सि हल्द्वाप गये थे। उहोंन 1 p 337 1 ) यद्यपि महार में सि हल, नागद्वाप सिहलद्वीपको रक्षा नहीं कहा है। वे लिख गये हैं, कि, मोर ताम्रपर्य को एक द्वीपका पर्याय बतलाया है पर यह "सि हरूद्वीपके दक्षिण पूर्व में एक पर्यत है। उसी पर्यंत बौद्धमत बहुत कुछ मसङ्गत सा प्रतीत होता है। पोंकि, को लोग लडा कहते हैं। वहा यक्ष आदि वास करते पहले हो मदाय शके प्रणेठाने सिहल नामको ले कर हैं। अतएव यह स्वीकार करना पड़ेगा, कि यूएनचुवग गोरमाल कर रखा है। उनका कहना है कि पहले इस के समयमें भो सि हलद्वीपको कोई भी ल्हाद्वीप नहीं स्थानका नाम सिहल नहीं था। पद-रानकुमार विजय कहता था । सि हलद्वीपसे बहुत दूर दक्षिण पूर्व में लड़ा सिंहने जप सोपो जोता, तब उन्होंके नामानुसार नामक एक सामान्य पर्वत रहने पर भी समस्त मिहर इस स्थानका नाम 'सि इल' हुआ। रितु उस समयसे को हम लोग रामायणोक्त ल्ट्रा नहीं कह सकते। बहुत पहले यह स्थान सिहर पाता था यह सिहलम लड्डा पहाड है यह सुन कर ही यदि कोई महामारतम कर जगह रिया है। इसके सिवा ताम्रपर्ण सिहलको रड्डी कहे, तो काश्मीरके मतगत जो लड्डा (सिइल ) और नागद्वीप, ये दोनों जो स्वतन है वह द्वीप है उसे तो बहुतेरे येधडक रावणकी । डा कद ममी पुराण पढनेसे मालूम होता है। सकते हैं। फेवल एक नामका मेल पानसे प्राचीन जन रामके कपि सैन्यको ले कर समुद्र तट पर पहुचनेके पदादिकी स्थिति नहीं जानी जा सस्ती। उस बाद भरने १०३ योजनका एक सेतु बनवाया था। इससे स्थानके भूत, चतु सोमा और उत्पन प्यादिके साथ जाना जाता है, जि समुद्र तटसे लड़ास किनारा १. वर्तमान निर्दिा स्थानादिक भूतस्यादिका सादृश्य होने योजन गर्यात् ४०० कोस था। सभरे ही उस प्राचीन पनपदाधिका बहुत कुछ पता कोइ को कहते हैं, कि रामेश्वर द्वीपसे सेतु भारम्म क सक्ता है। हुमा था। कोई कोर यर्शमान आदम्स् निमको ही नल निर्मिस सेतु बतलाते हैं। किन्तु यह माधुनिक रोगोंका लाके मम्बन्धमें पहले ही कहा जा चुश कल्पनामान है। रामेश्वर द्वीपम नल मेतु हो सकता है, हम लो!के प्राचीन शास्त्रीय मतानुमार हा मार पर घर्रामान आदम निजको हम रोग मरमेतु नहीं मान मिहल दो स्वतन्त्र होप थे। ममा घना चाहिये, कि सस्ते । सिन सब सदोर्ण स्थानों को बहुतेरे इस नल | किस स्पानको हम लोग रहा कह पाते हैं। rat x .