पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१७३

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१७८ लड़ा अग्निपुराण में लिखा है- शतयोजनविस्तीर्ण विमल चारदर्शनम "त्रिंशयोजनविस्तीर्णा स्वर्ण प्राकारतोरणाम् । निविष्टा तस्य गिर लक्षा रावयपालिवा ॥ दक्षिणस्योदधेस्तीरे त्रिकूटो नाम पर्वतः ॥! दशयोजनविस्तीग्रां त्रिंगट्योजनमायता। शिखरे तस्य शैलस्य मध्यम ऽम्बुधिसन्निधौ । सा पुरी गोपुर रुच: पायदुराम्बुदमन्निभैः ।। पतत्रिभिश्च दुष्प्रापा टवच्छिन्ना चतुर्दिशम् ।। सकाञ्चनेन शालेन राजतेन च शोभते । शक्रार्य मत्कृता पूर्व प्रयत्नाढ्यहुवत्सरैः। प्रासाद च विमानाच तवा परमभू पिता ॥" वसन्तु तत्र दुर्घाः मुख' राक्षसपुङ्गवाः ।" (लक्षाकापर ३६ सग ) दक्षिण-सागरके किनारे त्रिकुट नामक पर्वत है। उस जिसका महोच्च शिखर आकाशसे छूता है, वह पर्वतके मध्यशिखर पर समुद्रके समीप ३० योजन | त्रिकूट पर्वत पुष्पसमाच्छन्न होने के कारण सुवर्णमय-सा विस्तीर्ण स्वर्णप्राकार और तोरणादिसे परिशोभित लड्का माल म होता है। वह गिरि सो योजन विस्तृत है और पुरी है। इस पुरोमें पक्षिगण भी नहीं घुस सकते ।। देखने में बड़ा ही सुन्दर लगता है। उसीके शिखर पर पूर्वकालमें इन्द्रके लिये सैकड़ों वर्ष फठिन परिश्रम करके रावणपालिता लङ्कापुगे है। यह लकापुरी सो योजन हमने (विश्वकर्मा ) इस पुरीको बनाया है। हे दुर्द्ध लम्बी और धीस योजन चौडी है। यह नगरी पाण्ड. राक्षसगण उस स्थानमें सुखसे वास करो। वर्ण मेघसदृश, सुवर्ण और रजत प्रासादयुक तथा रामायणमें भी लिखा है, विमानोंसे विभूपित है। रामायणके मतसे लपमें निम्नलिखित उद्भिद उत्पन्न | "दक्षिणस्योदधेस्तीरे प्रिन्टो नाम पतः ॥ २२ होते हैं। सुवेल इति चाप्यन्यो द्वितीयो रासेश्वराः । "चम्पकाशाक्वकु लशालतानसमाकुला । शिखरे तस्य शैलस्य मध्यमेऽम्बुदसन्निभे ॥ २३ तमालपनसच छन्ना नागमालासमावृता ।। शकुनैरपि द प्रापे टट्कच्छिन्ने चतुर्दिशि । हिन्तालेरन् न नींपैः सप्तपण नुपुष्मितः । त्रिंशद्योजनविस्तीर्णा शतयोजनमायता ॥ २४ तिलक : कर्णिकार श्च पाटनैश्च समन्ततः ॥" सर्ण प्राकारसवीता हेमतोरणसंवृता। (महाकाण्ड ३६ सर्ग) गया लकति नगरी शकाशप्तन निर्मिता ॥ २५ चम्पक, अशोक, वकुल, शाल, तमाल, पनस, नाग- (उत्तरकापड ५म सर्ग) केशर, हिन्ताल, अर्जुन, कदम्ब, सप्तपर्ण, पिलक, कर्णि- हे राक्षसगण । दक्षिण-सागरके किनारे त्रिकुट नामक कार और पाटल। पर्यत है। उसके समान सुवेल नामका वहां एक और भास्कराचार्यने लिखा है,- पर्वत है। उस पर्वतका मध्यम शिखर मेघके जैसा है। "लंकापुरेऽस्य यदोदयः स्यात् उसके चारों ओर बडे बड़े चट्टान रहनेसे वहां पक्षी भी तदा दिनाई यमकाटिपुर्य्याम । नहीं जा सकते। मैंने (विश्वकर्मा ) उस शिखर पर | अधस्तदा सिद्धपुरेऽस्तकालः इन्द्रके आदेशसे लङ्कापुरी वनाई है। वह पुरी तीस | स्याद्रोमके रात्रिदल तद।। योजन लम्बी और एक सी योजन चौड़ी है। चारों ओर ययोज्जयिन्याः कु चतुर्थ भागे सोनेकी दीवार दौड़ गई है। सभी ददाजे सोनेके | प्राच या दिशि स्याट् [यमकाटिरेव । बने हैं। ततश्च पश्चान्न भवेदवन्ती फिर दूसरी जगह लिखा है। ल कैव तस्याः कक मि प्रतीच याम ॥" "शिखरन्तु त्रिकूटस्य प्राशु चैक दिविस्पृशम् । (गोमाध्याय ३४-४६) समन्तात् पुष्पसंच छन्न महारजतसन्निभम ॥ जब लङ्कसमें सूर्योदय होता है, तब ( उसके नम्बे मश