पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१७४

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लङ्का पूरवमें ) यमटिम मध्याह, सिद्धपुरमें सूयास्त और एव पडे ते कथिता अनुद्वीपा समन्तत ॥" रोमकपत्तनमें दोपहर रात्रिकार होता है। यमकोरि भारतद्वीपरेशो ये दक्षिणे बहुविस्तर ॥" उपिनीसे ठीक पूरय नरे अक्षाश दूरम अवस्थित है। (बहायदपुराण ४० भ०) फिर लड़ा यमकोटिक ठोक पश्चिममें है, उजयिनी | अतएव ब्रह्माण्डपुराणके मतानुसार मलयद्वीपके पश्चिममें नहीं है। अतर्गत लड्डापुरी कहनेसे पौराणिक मतम यह भारतवर्ष स्कन्दपुराणक कुमारिफास्त्रएडके मतसे रडा देशमें | मिन नहीं है । सतपय सूर्णसिद्धातके साथ मतभेद ३६००० प्राम है। नहीं होता है। "घर निशच सहसाणि लवादेश प्रकीर्चित ।" ___ यवद्वीपको अभी सब कोई 'जावा' कहते हैं। भारत (कुमारिकाग्वाड ३७ म.) महासागरमें इस द्वीपको अपस्थितिका विषय सबोंको सूपासिदातफे मतसे रहा भारतवर्षका एक नगर मालूम है, यह कहना अनावश्यक है। है।" (सप सिद्धात १२२३६) पर हा, यपद्धोपके पास ही लङ्का थो, इसका बहुत ब्रह्माण्डपुराणके मतसे-ययद्वीपके वाद मलयद्वीप कुछ आभास पाया जाता है। फिर ब्रह्माण्डपुराणसे है। इस मलय नामक द्वीपके अन्तर्गत पर्वतके ऊपर लडापुरोहै। मालूम होता है, कि लङ्कापुरी मलयद्वीपये अतर्गत थी। "तथाच मलयद्वीप मेरुमेव सुसंस्कृतम् । अभी पूा उपद्वीपके अतर्गत श्यामदेशफे दक्षिण में मापारबार सीतमाकर कमलस्य च ॥ विस्तीर्ण जिस भूमिखएडको मलय प्रायद्वीप कहते हैं, भनेकयाजनाविष्ट चित्रसानुदरीगई । यह ययद्वीपके पश्चिममें अवस्थित है। यहाका मलय तस्य करता रम्ये हमनाकारतोरणे । जातिका प्राचीन इतिहास पढनेसे मालूम होता है, कि निम्यूयविचित्रा हम्प्रासादमालिनी । ये लोग सुमात्रा द्वीपस्थ मेनट्टायु नामक स्थानम पहले शतयाजनविस्तीर्ण विशयोजनमायता ॥ रहते थे। यह उन लोगोंका आदियासस्थान था। उसे घे नित्यप्रमुदिता स्मीता का नाम महापुरी। लोग मलय कहते थे। सा कामरूपियो स्थान रामसानो महात्मनाम ॥ इस मलय जातिको भाषा आज भी सुमाता आदि मावासो वाहतानां वदिद्यावविदिपाम ॥' द्वीपोंसे लगायत अप्लेलिया तथा पश्चिममें मादागास्कर (प्रझायष्टपु० मनुषनपाद ५३ म.) तक प्रचलित है। भारतमहासागर द्वीपों में प्रायः एक जनसाधारण लड्डाको वर्णलड्डा कहते हैं। रामा | भाषा प्रचलित रहनेसे यह सहमें मालूम होता है, कि पण पर जगह लिखा है- यह मलयवासी मिन्न देशीय विभिन्न जातियां पहले एक "यस्नान्तो यवदीप सप्सराज्योपशोभितम । जातिको थीं । मे जाति असभ्यवस्था रह कर भी सुषप्यरूप्यकद्वीप सषणकरमपिटतम् ।।" (कि. ४०।३०)। कालफमसे सभ्य और कोई सभ्य हो कर भी पुन उक्त लोकसे भी जाना जाता है, कि ययापके पास अवस्थाभेदसे निता त सप्तम्य हो गई है। ही सुवर्ण मोर रूपक द्वीप है। असएप ग्रहाण्डपुराण इन मलयभायो जातियोंका रक्ष या राक्षस पानि नाम के साथ रामायण बहुत कुछ मिलता है। से रामायणादिमें उल्लेप है। भाज भी यवदीप पिर सूर्णसिदान्तमें रडाको मारतयका एक नगर कहा है, पूर्णकाल में भारतमहासागरीय द्वीप मी भारतवपमें दो गिना जाता था । ब्रह्माण्ड आदि पुराणों में लिखt •Craniurd s Indian Archipelago Vol 11 p 371) मीठ देशीय प्राचीन भौगोशिकगण इसी मलयको "मनदाप यमदीप मलयालमेर । Cher onesus Area अथात् खणदीप कहत ये। मदीप कुराप पराइद्वीपम्मच॥ १४ Bnglish trclopedia lol, Np 650,