पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१७५

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१८० लङ्का वत्तों फ्लोरिन द्वीपमें एक प्रकारको कुम्प भोयग कृष्ण- प्राकृतिक विष्ठबसे सुमात्राके दक्षिणम्य विस्तीर्ण भूमाग वर्णकी अमभ्य जाति वास करती है। उन सभीका समुद्रगर्भशायी हो गया है। प्राचीन द्वाराज्यका बही रको कहते है । उन लोगोंका स्वभाव भी राक्षसके जैसा शशायद 'लडाई मागर कलाता हो। है! इसी द्वीपके मध्य लरान्तक नामक एक नगर है। यद्यपि इस ग्नुमात्राद्वीपमे हिन्दू जाति आज मी नहीं यह नाम भी संस्कृत नरान्तका शब्दका अपभ्रंश-सा रहती और हिन्दृनिर्मित मन्दिगदिशा कुछ भी सा- मालूम होता है । इस द्वीपके पास ही बाज भी राम, वशेष नहीं दिखाई देना और न इतिहासमै ही लिया है लक्ष्मण, नील और नल आदि रामायणोक्त वीरोंके नामा- फिर भी ऐसे कितने प्रमाण हैं जिनसे हम लोग मुक्त. नुसार कई छोटे छोटे द्वीप मौजूद हैं। कण्ठसे स्वीकार कर सकते हैं, कि श्रीरामचन्द्र के भाग- जो हो, ब्रह्माण्डपुराणके मतानुसार यह साबित होता मनके यादसे भारतवामी हिन्दगण म्वर्णलाभको बाशामे है, कि मलयके मध्य हो लड्डूापुरी है। रामायणक मतसे यहां आया करते थे। सुमात्राके मध्यस्थलसे प्राचीन इस समयका नाम सुवर्णद्वाप है। आज क्ल उसको हिन्दु राज्यों की अनेक शिलालिपियां आविष्कृत हुई हैं, सुमात्रा कहते हैं। उनमें भी हिन्दु प्राधान्यके यथेष्ट निदर्शन हैं। वर्तमान मानचित्रमें देखा जाता है, कि मुमात्रा इम द्वीपमें आज भी मङ्गल, इन्द्रगिरि, इन्द्रपुर द्वोपके उत्तर पूर्वमे पर्वतकी चोटी पर और समुद्रके, इत्यादि हिन्दू-प्रदत्त नामक नगर और नदीविशेपमें मौजूद समीप 'सोनीलंखा' नामक एक नगर है। वह नगर है। अभी मलयजाति जिस स्थान को अपनी आदि 'वर्णलङ्का' गन्दका अपग-सा मालूम होता है। भूमि कह कर गौरव करती है, पृथियोके दूसरे दुसरे फिर इस द्वीपके अन्तर्वत्तों हीरक अन्तरीप ( Diamond | स्थानोंकी पेक्षा जहा बहुत कुछ सोना . पाया जाता Pt ) के समीप एक बन्दरको 'लङ्का' कहते हैं । आज था आज भी उस स्वर्णमयी भूमिके निकट हो कर इन्द्र भी इस द्वीपके उत्तर-पश्चिम काञ्चनगिरि (Golden Mt)| गिरि नामक नदी बहती है। उक्त नाम पढ़नेसे भी है।x इत्यादि प्रमाण द्वारा ज्ञात होता है, कि रामायणोक्त स्पष्ट मालूम होता है, कि एक समय हिन्दुओंने इस 'लड़ापुरी' अधवा 'सुवर्णद्वीप' वर्तमान सुमानाढीप | सुमात्रा द्वीपमें आ कर उपनिवेश बसाया था। समझा जाता था। सुमाला, यवद्वीप और फ्लोरिस इस द्वीपमें अलकेश्वर नामक शिवलिङ्ग विद्यमान द्वीपके दक्षिण-पश्चिममें प्रवाहित विस्तीर्ण है। (सह्याद्रिखण्ड १६।१४ ) आज भी यहांको बुगी जानिर्या लङ्काई' सागर कहती हैं। इससे भी लड्वाका बहुत कुछ स्थान निर्णय हो सकता • श्रीरामचन्द्रके बादमे इस लकाद्वीपमें बहुतेरे स्पा लाभकी है। अनेक वार भूमिकैम्प और आग्नेयगिरिक उत्पात आदि आशासे गाया जाया करते थे। स्कन्दपुरायके नागर-खपढोक निम्नलिखित वचनोंने वह बहुत कुछ प्रमाणित होता है- "भविष्यन्ति कला काले दरिद्रा नृपमानवः।

  • English Cyclopaedia (Geography), Vol 11

तेऽत्र स्वर्णस्य लोभन देवतादर्श नाय च ॥ ४० p 1045, 111 704, नित्यञ्च वागमिष्यन्ति त्यस्त्वा रझाकृत भयम "' + सस्कृत रतः गन्दका प्राकृत रूप । पानरान्तक शब्दका बर्थ भी राक्षस है। रावणाने एक सेना. (नागरमयड ६४ ०) रामचन्द्रफे स्वर्गारोहण करने के बाद उनके पुत्र कुश लका पतिका नाम भी नरान्तक था। आये थे, यह भी नागरखगडमे निखा है। (नागरखपड १८५ ब्रह्माण्डपुराणाम इसोको मल पद्वीपके मध्य "काञ्चनपाद" अ० ६०-६२ श्लोक देखों)। इस सुमाता की गनमे ही रूपत् कहा है "तथा काञ्चनयादस्य मसरस्यापरस्य हि।" नामक एक द्वीप है। वह रामायणक रूपक द्वीप-सा प्रतीत (ब्रह्मापट.५३५.) होता है।