पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१७७

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२८२ • लहर-लचक धारामे हो गई है। अनन्तर दक्षिण-पूरवकी ओर जयपुर। मोह, अग्निमान्द्य आदि नाना प्रकार के उपद्रव होते हैं। ' राज्यके वीच वहती हुई मन्द्राज-प्रेसिडेन्सीके विशास्त्र. उपयुक्त परिमाणमें यथारीति उपवास करनेसे ही मल. पत्तन और गञ्जाम जिलेके भीतर हो कर चिकाकोलकं मृत्र और वायुका निःसरण, गरीरकी लघता, धर्म दक्षिण समुद्र में आ गिरी है। यहां नदी पर एक सुन्दर निर्गम, मुग्न और पाठपरिकार, तन्द्रा और सान्तिका पुल है जिस हो कर ग्रेट ट्रांक रोड चली गई है। १८७६ / नाश, थाहाग्मे रुचि, एक ही समय क्ष धानृणाका ई०के तुफानसे पुल कुछ टूट फूट गया है। इस नदीके उदय, अन्तःकरणको प्रसन्नता तथा विशुन उद्दार आदि किनारे शिंगापुर, विरद, रायगड (रायगढ़ ), पावतीपुर, उपकार दिग्बाई देते है । (नुश्रत ) पालकोण्डा और चिकाकोल नगर अवस्थित है । सालुर २ प्लवन, लांघनेको किया। शास्त्र में लिखा है कि और मक्कुबा नामक दो शाखा इस नदीका कलेवर पुए। अग्निका ललन नहीं करना चाहिये। करती है। "न चाग्नि लायेद्धीमान नोपदध्यादयः कचित् । लङ्गर-युक्तप्रदेशके गढ़वाल जिलान्तर्गत एक गिरिदुर्ग। न चैन पादतं कुर्यात् मुग्वेन न धमेबुधः ॥" यह यक्षा० २६०५५'उ० तथा देशा० ७८ ४० पू०क (कम पु० उपवि० १५, १०) वीच पड़ता है । सभो यह भग्नावस्थामे पड़ा है। समुद्र ३ अतिक्रम, पार करने की क्रिया । ४ घोड़े की एक की तहसे इसकी ऊंचाई ६४०१ फुट है। यहां जलसर- चाल जिसमें वह बहुत तेज चलता है। ५ लावरकर घरोहको सुविधा न रहनेसे यह दुर्ग छोड़ दिया गया है। विधि, यह उपाय जिससे किसी काममें लाघव या लटक (संत्रि०) १ अतिक्रमणकारी, लांघनेवाला। सुभीता हो। ६ लघुभोजन, अल्प आहार । सियां टाप । २ नियम मनकारी, कायदा तोड़नेवाला । ३ सीमा वहि-७ अवमानना, उपेक्षा, लापरवाही । र्गामो, हदके बाहर जानेवाला। "अन्यस्यापि स्यवंशस्य लहना क्रियते दिया। लखन (स ० फलो०) लङ्घ ल्युट् । १ उपवास, अनाहार, तां नाल क्षत्रिय सोदू किं पुनः पितृमारणम् ॥" फाका। । (मार्क पडेययु० १३११३३) "बरे लइनमेवादायुपदिष्टमृते ज्वरात् । लट्नक (सं० त्रि० ) १ लांघनेवाला, जिसके द्वारा क्षयानिलमयक्रोधकामशोक श्रमोदवात् ॥" । लांघा जाय । (पु०)२ सेतु, पुल । ____(चक्रपाणि वराधि०) लड्ना (स' स्रो०) अवमानना, उपेक्षा, लापरवाही। नवज्यरमें पहले उपवास करना होता है । इमसे वात, ! लट्वनीय (सं० त्रि०) लड-अनीयर । १ लांघनेके योग्य । पित्त, कफका परिपाक, अग्निकी दीप्ति, शरीरकी लघुता, २ उलंघन करनेके योग्य । ज्यरका उपशम तथा भोजनकी इच्छा होती है। वातज लङ्गनीयता (स' स्त्री०) लडनीय तल -टाप् । लांघनेका ज्यरमें, भय, क्रोध, शोक, काम और परिश्रमजनित ज्वरम भाव या धर्म। धातुक्षयजनित घरमें तथा राजयक्ष्माजनित ज्वरमें लान लडित (सं० वि० लव-क्त । कृतलड्डन, जो लांच गया हो उचित नहीं है। जो वायु प्रधान, क्ष धार्च, तृष्णात, मुख- लड्डा ( स० त्रि०) लव यत् । लङ्घनीय, लायनेके शोपयुक्त, भ्रमयुक्त तथा वालक, वृद्ध, गर्भिणी वा दुर्बल योगा। हैं. उनके लिये भी लड़न कम्य नहीं। लच (हि.पु०) लचकनेको क्रिया. लचक। ___ लवनविहितज्वरम भी अधिक लवन द्वारा दुर्बल | लचक (हिं स्त्री०) १ लचकनेको क्रिया ण भाव, लचन । होना अच्छा नहीं। विशेषतः अधिक लड्चन द्वारा | २ वह गुण जिसके रहनेसे कोई वस्तु दवती या झुकती अस्थिसन्धिर्म वा सारे शरीरमें वेदना, काश, मुखशोप, हो। ३ एक प्रकारकी नाव । यह ६०७० हाथ लंबी घानाश, अरुचि, तृष्णा, श्रवणेन्द्रिय और दर्शनेन्द्रिय होती है और मकसूदाबादकी तरफ वनती है । इसे बहुत- को दुर्वलता, मनको चञ्चलता वा भ्रान्ति, अधिक उद्गार से लोग मिल कर खेते हैं।