पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१८८

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लदाख ___ गया और सुखे फल ही प्रधान हैं। ये सब द्रष्य यहाफे, पहा पसन्द करते हैं। चग नामा मद्यसाधारणका प्रिय रहनेराले परेकी पीठ पर लाद कर काश्मीर और, है। ये बडे हटे कट्टे और मेहनती होते हैं। आसानीसे गिटयत्तों हिन्दुस्तान, यारबन्द, खुसान तथा उत्ता। ये भारी शोमा ऊचे पहाड पर ले जो सकते हैं। और पूर्य तिव्वतीय प्रदेशमें येनेके लिये ले जाते हैं। औरतें भी मदो समान पलिष्ठ और यमपटु होती हैं। पेमय द्रष्य येचनेसे उहे काफी लाभ होता है। वे उस इनर्म परदा सिसम नहीं है। ये स्वेच्छासे घूमती फिरती मूलाके बदले भारतसे सूती कपडा, च्चा चमहा, साफ हैं। धानान व्यक्तिको छोड माधारणत त्रियों के पासे चमटा, अनेक तरह शस्य, यदृक और चाय अधिक स्वामी देपे जाते हैं। इसमें ये कोइ दोप मही मादि तथा चीनसाम्राज्यसे वारा और भेडेका रोमः। मानत । चाय, सोनेका कण, चादी, नाना तरहकी प्राचीन मुद्रा, परीष वरीय प्रत्येक गावमें हो एक एक योद्धमट या रेशम और चरस मादि द्रव्य लेते हैं। इस प्रदशक मध्य । विहार है। हर गायके पास एक निजा पर्वतकी मोटी यी रूपसु जिलेमें माने जानेके दो अच्छे पथ है । रूपसुमे, पर ये मठ स्थापित हैं। इन सबमें प्रायः हा एF या दो पहला गिरिसकट हो पर अगरेजाधिरत भारतमें लामा तथा कभी कभी बहुतसे बौद्धयति यासरत है। याना होता है तथा परग घाट हो र लाटुल और यहाये मठाधिकार उपाध्यायका कभी अभाव नहीं होता। सिमला शैत्यावासमें जाने मानेमें सुविधा पडती है इस | स्थानीय वामिन्दोमसे एक परिवारका वालक पर्याय लिये बहुरे घूमनेवाले चणि इसी पथ द्वारा भारतसे | क्रमस इस नतका अवलम्यन करते हैं। मठमें ब्रह्मचर्य रूपसु और सिमला आदि स्थानों में जाते हैं। रासा अवलम्बन करनेक पीछे ये विद्याभ्यास करते हैं। पर्वत मगरयासी चाय व्यवसायी ले प्रदेश रूपसुके वीर हो गालम सोदित दष्ठो वही पौद्धमृत्ति, प्रातरस्तुप, शिला कर जाते आते हैं। फ्लकोटकीर्ण प्राचीन तथा अन्याय पचित्र प्रतिरति यहाफे अधिनामी लादलो कहलाते हैं। ये बौद्धधर्मा | देखनेसे साफ जाहिर होता है, कि यहा धर्ममा पूरा परम्यो हैं। ये नाटे और मजबूत होते हैं इससे कदयं | प्रभाव है। तुराणीय जातिफे शास्त्रानुस् माने जाते हैं। ये लोग थी सदोमें चीत परिग्राजक फाहियान इस जन- आपसमें झगहा रडाह नहीं करते। दल वाध कर एक पदका विवरण लिख गये है। प्लिो Akhassn साथ गायम रहन हैं। येतीगरी ही उाको प्रधान उप Regio नाम यहाक अधियासियोकी बहुत सा कहानी जोधिका है। समुद्रपृष्ठसे १५०० पुटमे १३५०० पुर जिग्नी है। जो सदाम ची। परिवाना यूपनघुग पद ऊचे पर ये रोग रहत है। ये सर्वदा आनन्दमें स्थान परिदशा पर यहाक बौद्धमठादिशा उल्लेख कर विभोर रहते हैं और मदिरा मादि मादक्दा नहीं पीने। गपे हैं। इनकी यशभूपाको उनना परिपाटी नहीं है। ये पामोने पहले यह स्थान माहूर भोटराज्यर भरतभुत था। कुरता, पायनामा, कमरवन्द गौर पायम मोटा जूता पह उस समय एक राजकुमार स्वाधीनभारमे इस प्रदशका नते हैं। पुरुष तथा स्त्रिया घघरेकी तरहफे पर प्रकारफ। शामन करते थे और लासाफे प्रधान लामा यहाक वीसी अगरसे समूचा शरीर दा रेती हैं। पधे पर लोम म सर्वाश्रेष्ठ गुरु माने जात थे। १०वी मनीम जय वडा लगा हुमा चमहा मोर माथे पर पीटी द्वारा अलपत | तिटदत साम्राज्य घरके मगहोम बट गया, तद प्राताय दख मोदती हैं। निम तरह और सब देशर्मि मौसिमक, जनपद एक एक स्वाधीन रान्य हो गया था। उस समय मनुसार पहा पहना जाता है उस तरह पहा नहीं है। पालगोगोन यदाफ राजा थे। समाहादीको घोडा बहुत येत है। यहाजी ही अधि श्री सदोके म तम स्काडोके मरदार शेर अलाने फतासे उपजता है। वहीं पारी नीची जमानम गेहूं गौर| इस स्थान पर हमला कर मठ, मदिर गौर विहारादिक उरद मी बोया जाता है । दूधम सिद्ध पिया दुभा जो ये सभी दापके रिपे प्रयोछार पार कर दिया। तमासे Vol 149