पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२००

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लालतपुराण-ललिता उई रलितपुरसे वाणपुर शोर तालबहकी ओर | ररित यूह (स० पु०) १ यौद्धशास्त्र के अनुसार एक स्वदरा! राजाको पराजयस अघानस्थ सेनादने डरसमाधि। २ देवपुत्रभेद । ३ वोधिसत्यभेद । परशा तमोव धारण किया। इस समय ग्वालियरका तिता (सं० स्रो०) लरित टाप् । १ कस्तूरी । २ दारी, विद्रोह-दमन करनेक रिय महरेजी सेना र देरीसे चली येघाइ। ३ नदीविशेष । कालिकापुराणमें लिखा है, कि जानेको दाध्य हुई। इधर विद्रोहीन्दलने फिरसे चन्देरी पुराकार में ब्रह्मन दन वशिष्ठ निमिरा शापस तथा राशे हस्तगत रठिया। इसके पाद उसी सार| राजपि निमि भी वशिष्ठ शापसे देहहोम हो गये। फे परतूवर मासमें महरेजी सेनाने पुा ललितपुर पर वशिष्ठ ने ब्रह्माके उपदेशस कामरूपपीउमें सध्याचल पर चढाइ करदा। युन्द लागण माम विक्रमसे युद्ध करके घोर तपस्या की। विष्णुन तपस्पासे सतुष्ट हो कर उदे भी यात्मरक्षा न कर सक। माखिर उहोंने ललितपुर पर दिया। उस घरके प्रभावसे वशिष्ठने अमृतकुण्ड अहरेजोंफे हाय सौप दिया। इस विद्रोह समय बनाया। इसी कुएड पूर्व ललिता मामक मनोहारिणी और युदेल ठाकुर सरदारोंने आपसमें विद्वपभाव दिग्या कर' दक्षिण सागरगामिनो एक नदी है। महादेवजी उस नदीको अपना सर्वनाम कर डाला। सिपाही विद्रोहफे बाद । लाये थे। पेशाग्यमासको शुक्ला तृतीयाशे इस नदीम पहा शाति स्थापित हुइ । अशिक्षित सरदार म गरेज स्नान करनेस शिवलोकको प्राप्ति होता है। ललिता गयमे एटके कठोर शासनसे गिर्या अन हो शातिमय , नदोष पूर्वा किनारे भगवान नामक एक पर्वत है । उस जीयन वितानेको बाध्य हुए । तभोसे यहा और कोह, पर्वत पर भगवान् वि गु लिट्नरूपम विराजित है । जो उपद्रव न हुआ। शुक्ला द्वादशाको ललिनामें स्नान कर इस पर्वत पर शहरफ निकट ठाकुर सरदारों के निर्मित वामभनन भगवान् विष्णुको पूजा करते है उ ह इस लोकर्म नाना पौर दुग देखे जाते हैं। सभी दुर्गाका अधिकाश सुख और परलोक्में विष्णुलोकको गति होती है। ध्वंसावस्थामें पड़ा है। १८५८ १०में ललितपुर विजय (कालिकापु०८१०) के बाद सेनापति सर घुरोजन उनसे यहुतोंको तोड ___वृहन्नीलत त्रक २० अध्यायम इस तीथका हाल फोड़ डाला। विपशैलश्रेणीफे समुन्नत शिखर पर लिखा है। बहुनसे प्राचीन मदिरोंका ध्वसायशेष देखा जाता है। ४ पद्मपुराण, ब्रह्मवत्तपुराण बादिक अनुसार ये सब प्राचीन गोंड मधिशासियोंकी कोत्ति है। वर्तमान | राधिकाका प्रधान आठ सखियोमस एक । गालोक रास जैन अधिवासियोंके उद्योगसे यहा ए सुदर मन्दिर । मएडरम धामता राधिकाक रोमकूपस इन सब गापियों पनाया गया है। शहर में १८७० १०को म्युनिस्पलिटा की उत्पत्ति हुइ थो। (बाववपु०) स्थापित हुइ है। यहां से चमडा और धो दुसरे दूसरे देशों में भेजा पाता है। शहरमें चार स्थल है। । पद्मपुराणक पातालखण्डम लिखा है, कि जो ललिता ललितपुराण (स.ली.) बौदोका ललितविस्तारमा हपदा दुगा तथा राधिका हैं। इनम का भेद नहीं है। प्राय जिसम युद्धका चरित्र लिखा है। ___५पक रागिणा जो सङ्गोतदामोदर और हनुमत्के ललितप्रहार (सं० पु० ) अन्य महार। मतसे मेघरागको और सोमेश्वरक मतसे यस वरागकी ररिसलरित (स.को०) अत्यन्त सुन्दर । पक्षो है। इस स्वरमाम इस प्रकार है--स, ग, म,ध, स्तिलोचन (स.नि.) १सुन्दर पक्ष, उत्तम मन।। नि, स। मया स, पिग म, प, घ, नि, स (प्रथम) (स्रो०) २ विद्याधर पाणदत्तश कन्या। घ, नि स, ग, म, घ (द्वितीय)। इससध्यान- हलितयनिता (स.प्रा) मुग्दरी रखा। पुलसान्छदमाल्पायठा मुगौरकान्तियुपता सुधि । ललितविस्तर (स.पु.) वाशिजायनचरित विषयक मिनिरपसन्ती सहसा प्रभाव पिचारायणा मन्तिामदिया।" मुपादान एक बौद्धनग्य। गाया दयो। (सनातरवार) Vol, k 62