पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२०१

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लनिनानन्त्र-जनित्य ६ए, वर्षपत । इमरे प्रत्येक चरणमे तगण. दुगां के गर्भसे उत्पन्न हुए थे। ललितापीड बडे ही भगण, जगण और रगण होते है। । इन्द्रियपरायण थे। राजकार्यकी योर उनका कुछ भी लिनानन्य (०की प्रकारका मन्त्रा ध्यान न था। इनके राज्यकालमें दुराचारकी वृद्धि हुई ललितानुनीवावत ( संकली. ) एक प्रकारका योपियत थी और वेश्याओंकी प्रधानता हो गई थी। इनके नारकी लन्टिनादित्य--पामीर के एक गजा। कश्मीरगन नारा पिना जयोपोडने पापकों के द्वारा जो धन संचय किया पीटर परलोक सिधारने पर ये कामीरके सिंहासन पर था, इस ममय पुत्र ललितापोड उमा उचित व्यय करने बैठे। जिस समय गजा मारापीडका स्वर्गवास हुआ, लगे। धृत्त दुराचारियोंने राजाको वेश्या विद्यामें निपुण टस समय ललितादित्य काममीर के अन्तर्गत काश्मीरके कर दिया । वीर अथवा पण्डितोंका आदर करना बे एक- एक नामक थे। ललनादित्यको म्बप्नमें भी यह विश्वाम! दम भूल गये। मड ओं और मसम्बरों ही का आदर दर महीं था, कि मुझे ममम्त काश्मीर के शासनका मार । बारमें होता था। ललितापीड़ इतने दुवृत्त हो गये कि मिलेगा। एक क्षण मी स्त्रियोंको विना देवे उन्हें चैन नहीं पड़ता सामाग्य मिंहासन पर बैठने ही ललितादित्यने । था। जो राजा सवंढा दिग्विजयमें प्रवृत्त रह कर अपने समूत्रे जम्बूद्वीपको अपने नाम कर लिया। दिन्यि राज्य बढ़ाने में लगे रहने थे, ललितापीड उन्हें मूर्ख कहता जसके लिये जब ये युद्ध यात्रा इग्न थे, तद डर कर था। इन दुराचागेका फल यह निकला कि ललिनापीड़के मात्र दन्ट उनके अधीन हो जाता था। मन्त्री आदि सबोंने अपना अपना पद छोड़ दिया। इस ललितादिन्यने कान्यकुब्जगज यशोवर्मा पर हमला राजाने ब्राह्मणोंको दी हुई वृत्ति छीन ली थी। इस दुरा- किया था | अगणित मेना कट्ठा कर यगोवर्मा रण- चारी राजाका शासन काश्मीरमें १२ वर्ष तक रहा। भूमिमें उतरं । किन्तु यशोवर्माको अगणित सेना गजा'ललितापुर-पक प्राचीन नगर। यहां ललितादेवी विरा- लरिवादित्य प्रतापानलमें भस्म हो गई। अन्तमें यमो जित है । (वृहन्नील २२) लन्निनपुर देखो। पमा दसग कोई उपाय न देम्प रणक्षेत्रसे भाग गये। ललिनाव्रत (सं० क्ली० ) एक प्रकारका व्रत । इन्हीं नौजपति राजा यगोयमांशी समामें भवभूति ललितायष्टी (सं० स्त्री० ) भाद्रकृष्ण यष्ठी । जिस तिथिको मादि महाकावि थे । कनीज अधिकार करने के बाद स्त्रियां पुत्रकी कामनासे या पुत्रके हिताथ ललिता देवी राजा लन्निनादित्य पूर्व को बोर दिग्विज में आगे बढ़े। ( पार्वती का पूजन करती है और व्रत रहती हैं मा प्रकार इन्दोंने दिग्विजय यात्रा करके अपनी प्रभुना उसीका नाम ललितापष्ठी है। पूजा कुग और पलाशकी विस्तृन र दी । दिग्विजयमे उन्हें जो धन प्रान हुआ, टहनी पर सिंदर यादि चढ़ा दर होती है। पा, उसमें इन्होंने कई मन्दिर अग्रहार आदि बनवाये थे। ललितामममी ( मं० स्त्री०) ललिताच्या सतमो । भाद्र- महान परिहानपुर नामक एक नगर यमाया था और मामका शुक्लग्न ममी व्रतविशेष। उक्त सममी-तिथिम उममेन्द्र नामका एक फीत्तिस्तम्म प्रतिष्ठित किया' वनका अनुष्ठान क्यिा जाता है, इसलिये इस व्रतका नाम या । बर म्नम्न पत्थरका धा और ५४ फुट ऊंचा था। ललितासममीवत है । इमे फुड टीवन भी पहने हैं। इन्होंने य७ महीने २१ दिन राज्य किया था। ललितोपमा सं० बी०) एक अर्थालङ्कार । इसमें उपमेय दलितादित्य श-काश्मीरक एए राजा और उपमानी समता जताने के लिये सम, ममान, तुल्य नाटियपुर (मंकी) ललिनादित्व द्वारा प्रतिष्ठित, लौं, व यादिके वाचक पद न रन कर ऐसे पद लाये पानगा। जाने है जिनसे, यरावरी, मुकाबला, मित्रता, निरादर, रिमी (० रनी) आश्विन महीने की शुभार्या इत्यादि भाव प्रकट होने हैं। पज ! मलिनादेवी (पार्वती की पूजा होती है। ललित्य-पुराणानुसार एक प्राचीन जनपद । निना-पामारके पक रहा।ये जयापीडकी रानी (मार्क०५५३७)