पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२०६

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लैरण २११ साधित होता है। इन सब रसोश विरोधी उग्णगुण । देशनात पापत्य लवण ( Rock crit) समुद्र अर्थात् युक और मार्गयिोधक तथा शराराना कोमलता , सूर्यके उत्तापसे सुपाया हुमा समुद्रगलज लवण या साधा है। यह रस अधिक्ष माना सेवन करनेमे कररच, रोमक अथान् समानदो जलनात तथा शाकम्मरी शरीरमें प्रबुजरी होती, गोल गोल चात्तं पड नाते,! वा गाम्भर हुदनात लपण, पाशुज और ऊपासुत अर्थात् मुख मोर नेत्र में फोडे निमरते, रनपिन और यातरच लवणात मृत्तिकासे उत्पन्ना लपण, स्टिलवण, मी दोप होता, पुरुषत्वकी हानि होता तथा सट्टो द्वार; यच्चाल, या मोञ्चल अर्थात् काला नमक उद्भिदु अर्थात् माती है। । रेहा या कालर लवण तथा गुटिक आदि पोंका ___सैघालवण-घषको हितकर मुन्नप्रिय, मचिर, उल्लेख है, उसी प्रकार वर्तमान रसायन विज्ञानमें साधा लघु, अग्निद्धिकर, स्निग्ध,मधुररस, सभ्य, गोतल, दोप, रण ल्यणके भी ( Sodium chlonds ) दो विभाग हैं। नाक तथा उर सभा प्रकारके रपणसे उस्रष्ट और ये साधारणत Rock-Salt और Sen salt मामसे फरेंदायक होता है। प्रसिद्ध है। किन्तु मारतवर्गम इसके सिया Harsh Salt मामुद्रल्यण-परिपाको मधुर, अल्प उग्ण, मी ! और Earth Satt नामक और मी दो श्रणाभेद बताये दादी, मेदक, पन् म्निग्ध, शाशक और अपपित्त ' गपे हैं। पद्धक होता है। भारतवासी जनसाधारण खायथ्यके साथ प्रधानता मीवर सण-परिपाक में घु उग्णवीय, विशद, जितने प्रकार के स्वर्ण व्यवहार करते हैं। नीचे उम क् गुन्म, शूल और शिव धनाशमा मुखप्रिय, सुरभि । को एक तालिफा दी गइ है- और चिकर माना गया है। । १ पन्नावा मै घर (लाहोरा और सै घ ण )- रोम ( पाशुलवण ) तीक्ष्ण, अतिशय उण, यह सिधुनदफे दक्षिणमं पाया जाता है। कोदारा और स्त्रीससगतिका बद्ध न कर, पाको कटु वायुनाशक, निमा सज नामक दोनों प्रकार ल्वण सिन्धुनदरे लघु यिस्पन्दो, सूक्ष्म, मलमेदर और मूबर होता है। पश्चिमोत्तर भागमें पाये जात हैं। अलारा इसके हिमा मौद्धि लरण लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, हदय -और रम | ल्य प्रदेशफ मण्डिराया एक और प्रमारके नमकी सञ्चयकर, यायुका अनुलोमवारी, तिर और कटु माना आमदनी होती है। जाता है। गुटिकालपण कफ, वायु मोर मिशान्ति । २ दिल्लीत "मुलतानपुरी' लवण-यह दिलाकी १८ लेसनर, पित्तपद्धक, अग्निकर पाचक और भेदक लपणात मिट्टीकी खार ( rat hue Suit )स मिकाला होता है। उपक्षार (शारमृतिकासम्भूत स्पण)-यह नाता है। यानुफेय अर्थात् पाशनातके मूलदेशस्य भाकरसे ३माम्मर लपण-राजपनानाके शाम्मरहदके जलसे सत्पन्न होता तथा कटु मोर छेदनकर माना जाता है। प्रस्तुत होता है। इन सब लवणों से सन्धय, सौयश ल, विट सामुद्र ४ दिदलवण-राजपूतानाफ दिदुधना विभागको और साम्भर इन पाचोंको पञ्चलवण कहते हैं। एक ल्यण मिट्ट से तैयार होता है। पदमेसे सैन्यय, दिलयम कहनेसे सैघर और मचल, कौशिपा-लयण-राजपूताना पञ्चमदा नामक विरपणसे सचल मोर पिट् चतुलवणमे संघ सबल, स्थानक मिट्टीस उत्पन्न होता है। मध्यमारतम भी यह पिद् भोर सामुद्र तथा पञ्चलवण दहनसे पूर्योन पात्र लरण प्रवरित है। लवण नागना होगा। किन्तु चरम पर ठयणका जगह पलोडी एयण-राजपूतानाफे फरोधी प्रदेशको साम्मर स्यपके बदलेन मोबिद स्यण माना गया है। मिट्टाम उत्पन्न ! (नुभुत गुपया• ४६ म०), ७ परागडा-लय--पम्य सिसीक गुजरात संस्रत पाय जिस प्रकार मै घर अपान् सिधु विभाग प्रस्तुत होता है।