पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२२७

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छिलके में थोड़ी पिघली हुई लाह लेकर एक स्तम्भक शिर (Lac turncry ) है | कारखाने में प्रस्तुत लाहके दृष्य पर लगा देता है। गोल और चिकने उस दण्डकं ऊपर यूरोपमें Lacquer-s ork कहलाते हैं । दूसरे काट पर समान भाव में गर्मी लगनेसे लाह सरल और पतली हो लाह जमा कर उसे जिम किसी काठके आकारमें परिणत र फैल जाती है। पीछे एक आदमी अनारस, ताड़ वा कर सकते हैं। काशी में लाहसे तरह तरहके सुन्दर नारियलके पत्ते को दोनों हाथसे दो कोणे पकड कर नल- कम, फूलदानी आदि चीजें तैयार होती हैं। सोने के गिरसे उस तरल लाहको स्वीच बढ़ाता है। लाहकी आदिके गहनोंमे लाह भरनेका प्रचलन है। गर्मी और तरलता घटने पर जब वह वायुमें सूख जाती। भारतीय लाक्षाकारुस जापानी लाक्षाशिल्प स्वतन्त तव ऊपरके छोटे सशको तोड फोड कर बांकी चादरकी है। वे काठ के ऊपर लाहके बदले Rhus Yernicatera तरह पतले यशको एक डडे में लाया जाता है। वह नामक पेडके दृषकी पालिश देते है। लाहकी पालिग डंडा साधारणतः स्त्रियां ही पडती है। वे उस चादर । अलाहदा है । अलकोहलमें चांच लाह, ग्वुननरापी, की तरह पतली लाहको कपडे की तरह भला कर वहाँसे । लोवान् और तमुस्तकी मिलानेसे लाहकी पालिश एक दूसरे घरमें डंडेके साथ उठा ले जाती है और रैको । वनती है। साधारणतः वकस, अलमारी, दरवाजे, श्रेणीबद्ध करके रात्र देती हैं। इस म्धानको 'Diyan फरोसे आदिमे बूबसूरती बढ़ाने के लिये यह लगाई जाती है। shed' वा सुखानका घर कहते है । दूसरे दिन उस सूखी लाहके पत्तरको काट कर चकममें भर नाना स्थानों लाक्षा और लानारंगका वाणिज्य पहले एक-सा भेजा जाता है। । चलता था । १८६५ ई में चांच लाहकी अपेक्षा लाक्षावर्ण लाहका रंग चिरप्रसिद्ध है। पैरमै अलता या महावर । का दाम दुना बढ गरा। उम समय नीलकी खेती भी होती थी। नीलसे बढ़िया रग बननेके कारण लाक्षारंगके लगाना स्त्रियां वहुन पसन्द करती है। मुर्शिदाबाद, रघु- नाथपुर आदि स्थानों में रेशमी कपड़े के सून अलते गले बदले उसीका ध्यवहार होने लगा। नीलके कारण लाक्षा- रंगाये जाते है। यह अलता चर्मरोगमें भी विशेष उप- रगका आदर घट गया। १८७२ ई०में उसको दर एकदम कारी है । पैरमे पकोहो होने अथवा शरीरमें खुजली होने- घट गई । १८७४ ई०को २७वीं नवम्बरको मारत-सरकार- ने जो नोटिस निकाला उमसे इसकी रफ्तनी बंद हो गई। से उसके मुंह पर अलता रंग लगानेले बहुत लाम पहुं चता है। हिन्दूके आयुर्वेदशास्त्रमे लानादि तैलमें इसका यूरोपीय बाजारमै उसको खपत न थी, इस कारण उस भेषज गुण लिखा है। इसका रंग सबसे आदरणीय होता पर जो महसूल लगा था वह वसूल नही होने पाता था। है। कपडे छापनेके सिवा पहले इस रंगकी सहायतासे आज मी लाशाका वाणिज्य चलता है, किन्तु पहलेको दूसरे दूसरे रंग तैयार किये जाते थे। इसका रंग बहुन 'तरह नहीं। ब्रिटेनराज्य और अमेरिकाके युक्तराज्यमें पक्का होता है। लामाकी रफ्तनी होती है । फ्रान्स, अष्ट्रीया, जर्मनी, लाक्षासे वृद्धी छडी, तरह तरहके गर्ने और खिलौने इटली, अष्ट्रेलिया, वेलजियम, चीन, प्लेटसेटलमेण्ट आदि बनते हैं। कुसुमी लाहका बना हुआ गलेका हार स्पेन और हालैण्ड राज्यमे भी वङ्गालस लाक्षाकी रफ्- तनी होती है। ठोक गिन्नी-सोनेके जैसा दीराने में लगता है। एक फैल समुद्रगर्भमे जो ताडित वार्तावह तार परिचालित हुआ फूलसे परिशोभित उद्यान-वाटिका सजानकी यदि इच्छा । है उसके ऊपर लाक्षाका स्तर दिया जाता है। क्योंकि, हो, तो लाह द्वारा आसानीस सजा मस्ते हैं। यह पालिशकी तरह चिकनी और चमकीली हो सकती है।। जल और मिट्टीके मयोगसे लाक्षा नष्ट नहीं होती। अत- एव उसके मीतरका तार भी पराव नहीं होता। बलालके सोनामुखी और झालना आदि स्थानोंमें लाहके। इसका गुण-कटु, तिक्त. क्पाय, श्लेम. पित्तरोग. अलवार और पिलौने दनते है। पजाब, सिन्धु और शोफ. विपदोप, रक्तदोष और विषमज्वरनाशक तथा पाकपत्तनमें समिद्ध लामाके खिलौनेका कारखाना! वलकर माना गया है।