पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२३४

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लङ्गनीपा-लानशक्तु लालीपा (मस्त्री० ) (एदि पररूप । पा ६१६४) इति || लाजतर्पण ( स० की.) लाजशन तर्पण । लाजशत मत सूत्रस्य वार्तिकोफ्त्या साधु । हरिस, हलकालद्वार तर्पणविशेष । सोहका बना हुआ एक प्रकारका तर्पण। लागल (सप्लो०) लट्स (खजिपलादिम्य करानचौ । | दाइ और मिसे रोगीक अत्यन्त कातर होने पर गुड उण ४६०) इति ऊलन् बाहुलकात वृद्धिश्च । १ पूछ , और शहद मिला कर लानतर्पणका प्रयोग किया जा दुम। पर्याय-पुच्छ लूम, याल हस्त, बालधि, लङ्गल, सकता है। खोहको मूर चूर्ण कर यह तैयार करना लाइट, लुलाम, मापाल, अ, पिच्छ, वाल । गोपुच्छका होता है। नल मस्तक पर देनेसे पाप विनष्ट होता है। यह अल लाजपेया (१० स्त्री०) लाजेन ता पेया। यह माड जो तीर्थजलफे समान पवित है। (पराहपुराण) २ शेफ,, पोह या लावा उवालनेसे निफ्ले। इसका व्यवहार लिङ्ग।३ कुशूर, कोठला । रोगियोंगो पथ्य देने में होता है। लाइ रिन् ( स० पु०) प्रशस्त लाइ लमस्त्यस्येति लाजभर' (R० पु०) लाजस्य मतः। धिमक्त, बोई या लाइ ल इनि । १ वानर, यदर । २ अपम नामक मोरधि। लावाका पाया हुआ भात। यह रोगियोंको पथ्य ३पिडा। कौंछ फेचार। दिया जाता है। 'सका गुण-रधु शीतल, अग्निदीप्ति लाह लिपा-मध्यप्रदेश प्रमादित एक नदी । सम्भवतः कर, मधुर, वलकर, निदा मौर रुचिकर, कफ मोर पित्त यही पुराणानुसार लागलिनी नदा है। नाशक तथा प्रणशोधनकारी। (वैद्यकनि०) साइली (म.पु.) क्षान लिन् देखा। राजमएड (स.पु.) लाजस्य मएड । यद माड जो खोइ लाङ्ग लोका (स. स्त्रो०) लाङ्गलाकृतियम्यस्या इति या लाया उवालनसे निकले। हाल ठन् । पृश्निपणी पिठचन । राजयत (हि. वि०) जिसे ल्ला हो, शर्मदार । राइल (सलो०) १ दुम पूछ । २ शिश्न लिन। लाजवती (हि ० सी०) लजाल नामका पौधा, हुइ मुह। लाङ्ग ला (स. स्त्री०) १ यांच, पौंछ। २ पृनपणी, लाजघर्णा (स. स्त्री०) लाजस्य वर्ण इव वणों यस्या। पिटयन। असाध्य लताविशेष, फुसी ओ मकडोके मूतनेसे लाचार (फा०वि०) १ यिश, मजवर । (कि० वि०) निकरनी है। २ विवश हो पर, मजयूर हो पर। लापद (फा०पु०) १ एक प्रकारका प्रसिद्ध कीमती लाचारो (फास्त्रा०) लाचार होने का भाय, मजदूरी। पत्थर । इमे सरतमें 'रानवत्तक' कहते हैं। यह जगाली लाची (दि. स्रो०) इलायची देखा। रगका होता है और इसके ऊपर सुनहरे छोरे होते हैं। लाचीदाना (हि.पु.) खाली चीनीको एक प्रकारकी। यह यातज रोगोंक लिये गुणकारी मनको प्रसन्न करने मिठाई । यह छोटे छोटे गोल दानों के माकारफोहोतो है।घाला, हदयके लिये परफारी और उन्माद आदि रोगों में पभो कमी इसके सदर सौंफ या इलायचाका दाना मी | उपकारी माना जाता है। मानो सुरमा लगानेके लिये भरा होता है। इसे इलायचीदाना भो कहते हैं। इसको सलाह भी धनती है जो बहुत अधिक गुणकारी ला (स. क्लो. राज मच । १ उऔर, ससा२धानका | मानी जाती है। २ विलायती मोल जो गधकके मेलसे हया, ग्नोल। इसबा गुण-मधुररस शीतवीय, रघु, बनता और बहुत बढ़िया होता है। मग्निमन्दीपक मलमूत्रको कम करनेवाला, रुस, वर लानपदी (फा० वि०) लाजवर्दफे रगका, हलका नीला। पारक, पित्त, कफ, पमि, शतिसार, दाह, रक्दोप, प्रमेह, लाजवाब (फा०वि०) १जिसके जोरका और कोई न मेद और पिपासानाशक माना गया है। (भाषप्र०) (पु०)| हो, अनुपम, येनोड। २ओ कुछ जवाब न दे सके, राज मच्। ३ भाद्रतण्ठ, पानीमें भोंगा हुमा चायल निस्तर। लाज (हि.ना.) रजा, शर्म ,दया। | लाजशा (स.पु०) लाजम्प शतम्रोह या रावास लाप ( पु.) धानका भूना हुमा लाया, ला । सत्तू ।