पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२४६

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नीमा २५१ लिपशिष्य या निशानबीन और २ दोषित निष्य , रामा या माचा को तरह सम्मानित होते भा रहे है । रहने है। ऐलोग पुरोहिता पर पात हैं तथा ३मदा | अन्या र मठाधिकारीसे इसका पाधयनिदेश परनेके लिपे मम्प मागाय घा धर्म गुरु पदाधिकारा होनेकी व्यवस्था | घे श्रेष्ठ गामा (Grand Lama) नामसे भी पुकारे जाते है। भारतीय वौद्धसमाजमें धमण वा मिक्ष और स्थविर है। क्वर बडे बडे मर्म हो एक एक खान पो रहते है। या उपाध्याय आदि पद देखे जाते हैं। तिमती रामा | निकटस्थ छोटे छोटे लामास्थान और मन्दिरादिके परि सम्प्रदायमें भी उमी प्रकार सामान्य वालक्से महामार | दर्शकक रूपमें ये यहाके सभी कार्यादिक्षा देखरेख करते याचाय पद पान भी चार फम हैं। उन सबका शिक्षा है । उनका यह पद पहुत कुछ कालिक विशपों सा है। मवीराशाल दो मागों में विभक्त है। लामाकी दीक्षा प्रणाप्ता। लागेप्रेन्' वा उपासक । धर्मजायन वितानेकेदपुर सेरा, गा लदन और तपिलान्पो आदि भोट भभिप्रायसे जो मठमें प्राकर शिक्षाकाम व्रती होते | रानस्थ सुप्रसिद्ध सन्यामाश्रममें निस प्रणाली (गो है, यह उपामक दो प्रकारका है, पञ्चमहापातका टुग प)ले लामा तिष्य बनाया जाता है नाचे उसका परित्याग कर धर्म मतानुपर्तनकारी व्यक्तिमाव तथा| सक्षिप्त विवरण दिया जाता है। तितके अन्याय मठों सपामाश्रमावलम्या निध्य । शेपोन श्रेणी में जो १० उप में अधिकारीगों को माचरित प्रथाका अनुसरण कर देशका परिपान तथा साम्प्रदायिक परिच्छदादिशे पहन | कार्य करते हैं। परम धर्मपथका पधिक होनको तय्यार है ये 'रयुट' निस वालकको (यस्सन् छोड) पिता माताने कहलाते हैं। मङ्गोल ग ह स्काघि पन्दि यन्द वा | लामा वनाना स्थिर कर लिया है वह अपने घरमें गाठ घन्त और कारमाकगण माझी करते हैं। (उ से बारह पप तकनी) वप ता रहेगा। लेकिन उस रागे तपुर घा रिक्षानीका प्राथमिक पयाय । समय पद्द मठमें ना कर यिद्याभ्यास पर साता है। मठ इस ममय उजे ३६ धर्म यो पाए। परन्। होता। न ते समय उसके शिर पर लाल या हदी रगकी रोपी हैं। मटके दूसरे दूसरे लोगोंक तिर ये बहुत कुछ उप पहनाई जाती है। यहा पाठाभ्यामके समय शिक्षा धर्माध्यक्ष समझे नाते है । किन्तु वोक्षपतिको नरद उन भिलापा छातगाद निभानुरूपसे उत्तरोत्तर उप श्रेणी का सम्मान नहीं होता। पहुर पाते हैं। ये डाग, गो स्प उठ और गेलोड़ रागे लोट-घमाचार्य पार मिक्ष । २४ वपकी अधात् यथाक्रमसे शिक्षामविश शिष्य, दीक्षित शिष्य उमर नहीं होती तब तक काइ भी यह मर्यादा पानका तथा यति होते हैं और वे बौद्धयतिपदफे अधिकारी हो भधिकारी नहीं । म ममय घे रोग प्रश्न दीक्षितयति का शिक्षाविभागीय किसी एक विशप विधानको उन्नति समझ पाते हैं। ऐसा भयस्यामें है २५३ शियमोंका करनये पि कोनिरसकते है। पालन करना होता है। बहुत रे वाला दो प्रधान मठमें या सघाराममें लामा या पान पो-ठाध्यक्ष या उपाध्याय । यही लामा | पद और उसके ममान शिक्षा पास पिये प्रवेश करनेस सन्यासमतको चरममोमा है । पयोंकि 'पान पोइ परे गायक छोटे मठमें प्राथमिक पाठ शिक्षा समाप्त शिक्षित, दाक्षिन मोर पतियोंक प्रश्न गुप।इम ममय करते हैं तथा दाक्षा पानेरे समय मठमें होते उन्ह उपरोस साम्प्रदायिक तीनों विभाग शिक्षाना है। मिश्मिफे पेमिमोडछि मटमें तथा मिन्दोरिडाके कार्य में प्रतो रहमा होता है। यल तो पेशापति द्वारा निमा संघारामर्म निम प्रयास बालको शिक्षा दी मनुमाणित या बोधिसत्स्यायतार'तुन तया मानार्य जाती है, यह मोरे rat गई है। देव कहर रामम्मि भूषित है,ये दो लाम वान् पो । नव पोरवार को मटमें शिक्षा पाने के लिये आता के ऊपर रहते हैं। यथार्य में पे लाग मा पूर रथित है, तो पहले उसे उस पिताश माम, कुलमर्यादा और उपाध्याय या गुरुक सिमाधार पुछ नहीं है। बहुत पहले पदमपादा यादि वति पूरी नाता है। यदि पिता धनयान् दोसे ये राजदिसमन देयरुपा धर्म यासगण हो तो ये सहपको मठम रख सकते हैं। बालवश परिः