पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२५३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


२५८ लामा शीत और मच्छडसे वचनेके लिये जूना, मोजा और पह, है, तो वह दण्डका भागी होता है। प्राचीन वौद्धोंकी ननेका कपडा आदि शीतप्रधान देशका उपयोगी करके | संघाटी, अन्तर्वासक और उत्तरासंघाटोके साथ वनाते हैं। प्राचीन वौद्धोंश चीरवास और वर्तमान | तिव्वतीय लामाओंका जान, नम् जार और वल गोम् लामाओंको जपमाला, शिरस्त्रान, कमरवंद, छोटा कुरता, नामक शरीर परका वस्त्र मिलता जुलता है । इसके चोगा, इजार, पायजामा तथा जूता आदिका मिलान | अलावा शाक्त और वैष्णवोंकी भांति वे माला जपते हैं। करनेसे मालूम होता है, कि वर्तमान युगमें चौद्धधर्ममें | इस मालाने १०८ दाने रहते हैं और उसके दोनों छोरके कैसा विप्लव उपस्थित हुमा है। सूनेमें दश दश करके 'साक्षी' रखते हैं। १०८ वार माला तिव्यतीय लामागण शिरमें जो साफा बांधते हैं, | जपनेके बाद एक एक साक्षो ले कर वे मन्त्रसंख्या निश्चय वह ठीक भारतीयके समान है, थोड़ा चीन और करते हैं। इस हिसावले दोनों ओर १०४१० साक्षीमें महोलीयासे मिलता है । तिव्वतीय लामाओंका विश्वास उनकी १०८०० जपसंख्या होती है। ये दाने भी भिन्न है, कि लामाधर्मके प्रतिष्ठाता वौद्धमिक्ष पद्मसम्भव भिन्न प्रकारके होते है। सर्वप्रधान तषिलामाके पास है तथा उनके सहयोगी शान्तरक्षित ईस्वी सन् ८वी मुक्ता, चुन्नी, पन्ना, नीला, प्रवाल, स्कटिक आदि मूल्य- सदीमें भारतले जो पगडी पहन कर तिब्बत आये थे, वान पत्यरमें वनो माला देवी ज्ञाती है । एतद्भिन्न सम्म उसीकी तरह वर्तमान टोपी वनती है। पञ्चेन्ज्वे दमन | दायभेदसे और देवाराधनाविशेषसे मालाके दाने अलग लाल पगडी वाध शान्तरक्षित तिब्बतमे आये थे। गे लुगः। अलग होते हैं । गे लूग-प सम्प्रदाय हल्दी रंगके काटकी प-को छोड तिव्वतमे सभी जगह ऐसी पगडीका प्रचार | माला, तम दिन पूजा लालचन्दनको लकड़ीकी तथा छ। था। वह साफा या पगड़ी भारतके शीतप्रधान देशोंमें रशी उपासनामें सफेद शखकी, तान्त्रिक उपदेवताओंकी व्यवहत रूईकी कनझप्पा टोपी-सी है। त्सोड खापा पूजामे रुद्राक्ष (Elacoearpus Janitus), सांपकी हड्डो, उसी लाल टोपीके बदले पोली पगडी प्रचार कर गये | अवलोकितकी पूजामें रफटिकी, पद्मसम्भव और ताम्- हैं। वही गेलुग-प सम्प्रदायका पहनाया है। दिनकी पूजामे प्रवाल तथा वनभैरवको उपासनामें नर- ___ मठविहारिणी बौद्धभिखारिन पशमीने कपडे या मुण्डमाला व्यवहृत होती है। लोमले बने हुए एक प्रकारके शिरस्त्राणका व्यवहार ___ लामा जव माला जप..नही सकत, तव वे गले या करती हैं। सम्प्रदायके भेदसे वा शिरस्त्राण लाल या दाहिने हाथमें वांध रखते हैं। माला जपनेके समय काला होता है। सिकिम, भूटान और हिमालय प्रान्तके | प्रत्येक दाना पकड़नेके पहले चे ओम् प्रणव उच्चारण करते अनेक देशोंमें जहां वृष्टि नहीं होती, वहीं के अधिवासा हैं। पीछे दाना पकड कर मन ही मन पाठ किया करते वौद्धलामागण गरमीके दिनोंमे खड़की टोपी पहनते हैं। है। भिन्न भिन्न देवताका जपमन्त्र भिन्न भिन्न है। ये कोई मी पहलेकी टोपी नही पहनता । चीनवासीकी तरह सब लामा अकसर और भी कई एक द्रव्योंका व्यवहार वे टोपी खोल कर आगन्तुकको प्रणाम करते हैं । यही किया करते हैं। उनमेंसे भजनचक, वज्रदण्ड, घटा, कारण है, कि देवमन्दिरमे घुसते समय कोई भी शिर | करोटीनिर्मित ढका या ढाक, स्वञ्जनी, कवच, पोथी और पर टोपी नही रखते, सिर्फ कई धर्मकार्यमें रोपी पहननेकी अलंकार प्रधान है। तपिल हुन्पोके प्रधान लामा कभी विधि है। कभी जवाहिरातका बना कंठहार पहनते हैं। किसी ____ उनके शरीरके कपड़े भी दो रंगके होते हैं। गे लग् । किसीको भिक्षापान और स न्यासदण्ड है। प सम्प्रदायके आचार्यगण केसरसे रंगा हुया कपड़ो तिव्वतवासी लामाधम के लिये प्राण-विसर्जन करने पहनते हैं । जब कोई गे लुग-प आचार्यको उपढीकन पर भी कर्मकाण्डमें उनकी बड़ी आसक्ति देखी जाती है। देने यावे, तो उसी तरहका कपड़ा पहन सकता है। मठवासी यत, प्राम्य पुरोहित, गुहावासी तपःपरायण उसको छोड़ वह यदि कोई ऐसा वस्त्र पहन कर आता लामा भिक्षु अथवा कृषिवाणिज्यादि कम में लिप्त लामा-