पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२५४

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लोमा गण पृथक् पृथक कार्यम व्यापून रह कर जीवनयात्रा यह सब काय करनेमें करीव १५ मिनट लगता है। निर्वाह पर रहे हैं। इस विभिन्न प्रेणीव लामाकी उसफ याद दूसरी पार शखध्वनि होनेमे गेलोट यति नित्यवर्गपद्धति भी स्वतन्त्र है। गण मन्दिरके दबानेके सामने तथा गेत्पुल लोग मन्दिर लामानगरी पोत पतिस्थ श्रेष्ठ लामा सघाराममें के सामनेपाल आँगनमें पडे हो पर देवताको प्रणाम बौद्धयति सि प्रथाका अवलम्बन घर दैनिक कार्य करते है। पाछे मदिरफा दरवाजा खुलने पर एक एक करते है वही नीचे सक्षिप्तरूपस लिसी जाती है- परके सभी मदिर में प्रवेश करते हैं। इस समय हाथों ___ रात्रिकालमे जब नींद टूटतो है उसी समय यति | दण्ड र कर गेको दरवाजे पर खड़े रहते है । जव सव शय्यात्याग करते ह। पाछे विधान परसे उठ कर कोर आनी अपनी चटाइ पर मयादाके अनुसार बैठ परिच्छद पहन कर मयत हृदयसे गृहमध्यस्थ वेदाके जात, तव तोमरी बार शम्रध्वनि होती है। उस समय समय तीन बार देवोइनसे प्रणाम करते हैं। तदनगर सभी एक सरम कुछ निर्दिष्ट मन्त्र पाठरते हैं। पीछे जीवनयात्रा निर्वाहके उपायकी प्राथना पर युद्ध और चाय पीते हैं। चाय पाने के पहले अध्यक्ष लामा सोंके दोधिसत्योंके उद्देश्यसे स्तर तथा एकत्र हो कर कदमत्र स्तुतिवाक्य उच्च रण करने पर अपना अपना प्याला पठ करें। स्नर और मात्र पढनेके वाद ओं वे वरगणय य हर कर देते हैं । मठका शिक्षा या कोइ मृत्य ही हो स्वाहा" यह मत तीन चार पढ कर यतिगण अपने उसमें नाय ढार देता है। पोनक पहले यसिगण अपने पैरों थूके । उनका विश्वाम है, कि दिन घूमने अगलीसे दो वूद जमीन पर गिरा कर युद्ध, अपरापर से जा सब नीर कुचला जाता है, यह इमाम के बल्से देवता और पितरों को दे कर पीछे आप पीते है । मिठाई अमरावतीके इदपुरम देवरूपम जाम रेता है। और मास स्वानके समय भी इसी प्रकारको व्यवस्था है। इन सब देवाराधनाके बाद यदि राति अधिक रह | जनसाधारण कौतु ल दूर करनेके लिये नीचे फेघल नाय, तो ये पुनः शय्या पर जा सकते है। किंतु यदि मोका मावा दिया गया। दो या चार दण्ड दाका रहे तो उह और नहीं सोना ___ खाने पीने चाटने चूमने योग्य चष्य पेयादि स्वादिष्ट चाहिये। थोडे समय के लिये 'स्मोन नम्' भजनगोति भोन्यद्रष्य हम ध्यानी बुद्ध और स्वर्गके बोधिसत्वाशे पा मन्त्र पाठ कर रात्रि यापन करे तथा घराध्यनिसे भेट दत है । ये इस खाद्य पर कृपा करें। भोम् अ है।" सवमय कोह उठे, तो वे भी शय्या त्याग कर शव पनि तदनन्तर यथाक्रमस 'ओम् गुरु न नैविध गाव। और गिङ्गाधनि तक अपना वेशभूषा पही। शिक्षा ओम् सर्व वुद्ध बोधिमच बननेत्रिय थ है। थोर देव ध्वनि होते ही सभी अपने अपने मठको छोड कर दी हामिनि श्रीधर्मपार सपरिवार वजनैविध अ छामक प्रस्तरमण्डपम उपामा लिप जुटे । " भूश्वरके उद्देश्यसे- गोम अप्रपिएट अमिभ्य स्वाहा । प्रस्तर आसन पर पड हो कर के 'मोम् अर्घ चार्घ ओम हारिने महा वनपक्षिणि हर हर सर्वपापविमोक्षि विमासे! उत्सुम महाक्रोध हु फ्ट' मात्र पाठ र स्वाहा" 'त्यादि । नाचमास होनसे नीवहिंसा और मनका पाप और कलुप मादिका चिता करे। उससे उमका मास खाने से जो पाप होता है उस क्षय करने के उनका चित्तपातक दूर हो जाता है । तदन तर सुग पा लिये तथा पशुओ स्वगामनार लिप भोम् अविर माम सजा मिट्टी या साउनसे अपना हाथ पैर धो| पेर ह' मन्त्र पाठ किया जाता है। नदातर मठ साले । हाथ पैर धोते समय ये विशेष विशेष मन्त पढत भाएडार खाद्यद्रष्य देनेगालेको मगलकामनाक रिये यह है। मुख आदि धोनेक पाद गार हो कर वे हाथम माला मत पढा जाता - मो ! ममरतप्रभ रागाय तथागताय ले र जप करते करते तारादेयी और मधाक उद्देश्यसे मात्र पाठ परत ।। समय बचने पर काइ मयुने सम्यक् बुद्धाय नमो मम्जुप्रिये । पुमारभूपाय कोह मपनो अपना कुगविणता देवीकी स्तुति भी बोधिसत्त्वाय महासचाय! यथा| भोसरलम्भे किया करते है। निरमस जपे ये रन्धे ममतरक्षिणस्मै परिशोपाय