पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२५५

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लामा स्वाहा"। इसके बाद वे और भी कितनी स्तुति किया। सभी अपने अपने कमरे में आ कर जूता उतार अभीष्ट करते हैं। ये धर्म, निर्वाण, चिन्तामणि, कल्पतरु, मङ्गल देवताको पूजा कर मोग लगाते हैं। उसके बाद मठका और प्रवृत्ति निवृत्तिकी प्रार्थनामात्र है। भृत्य उन्हें खाने की चीज दे जाता है. अपने अपने भोजन चाय पीने के बाद धर्मानुवेदकोंकी अर्चना, स्थविरोंकी से घोडा निकाल कर वे पितरों तथा धारिती और अपने पूजा, मण्डलार्पण, मैरव तथा ताग, देम छोग और सटदु पुत्रों को दे कर पीछे आप खाते हैं। तब यनि लोग कुछ आदि कुलदेवताओकी पूजा यथाक्रममे अनुष्ठित होती है। समय के लिये अपने अपने कर्ममें प्यरत राते हैं। ३ बजेके इन सब पूजाओंके करने में अधिक समय लगता है म बाद वे चौथी वर मन्दिरमे इकटे होते हैं। इस समय मी लिये बीच वीचमें चाय पीनेकी भी विधि है । कुल : पहले की भाति तीन दफे शध्वनि होती है। इस दफे देवताको पूजा करने के समय मध्य मध्यमे मृत व्यक्तिकी , देवताओंको भोग चढाने समय तीन बार चाय पी कर प्रेतात्मा तथा पीडित व्यक्तिको रोगमुक्ति के लिये मनल-, घर लौट आते है। शिक्षानीश और 'पार-पा' यतिगण कामना की जाती है । पीडितकी रोगमुक्ति कामनाका , इस समय घर अ कर पाठा पास करते है। ७ पजे नाम "कुरिक" पूजा है। अनन्तर अवशिष्ट कुलदेवोंको । पाचवी वार सम्मिलन होता है। इस समय तीन बार पूजा समाप्त कर वे चाय पीते हैं। उसके बाद शेप-रा शड्सनादके बाद सभी पूजादि समाप्त कर तीन बार चाय सञ्चिड-पो गान कर सभा भंग करते और एक एक करके , पीत और तब घर लोटते हैं। रातमें दूसरी बार घंटा मन्दिरसे बाहर हो कर अपने अपने घर चले जाते हैं। बनने पर शिक्षानयोग और दीक्षित यति सम्प्रदाय अपने प्रधान लामा सबके पीछे वाहर होते हैं। अपने अध्यापकको अपना पाठ सुनाते और पीछे पाठ घर आ कर वे अपना अपना अभीष्ट मन्त्र जप और लेने है। तीसरी बार घण्टा बजने पर सभी सोने कुलदेवताकी पूजा करते हैं। उसके बाद उक्त देवोंको जाते हैं। भोग चढ़ाते है । पूजाके समय "भजनचक्र" घुमा कर | निट मा सम्प्रदायके सभी मठोंमें प्रायः ऐसी हो सभी समय ठीक कर लेते हैं। इस समय अगर सूर्यदेव | | प्रथा चलनी है। पृथक्नामे उस उस साम्प्रदायिक मठमें आकाशचक्रमें दिखाई दें, तो सभी अपने अपने कमरेसे सभी समय गट्वध्यान नहीं होती। ८ बजे नसघण्टा वाहर हो कर दोनों हाथ उठा कर "ओम् मरीचीनां यजने पर सब कोई मन्दिर में इकठे हो कर पूजादि किया स्वाहा" मन्त्र पढ़ कर स्तुति करते हैं। तदनन्तर सबेरे । करते है तथा वहा बैठ कर चाय और मूढो खाते है। करीव नौ बजे जब सूर्यको किरण कडी और शीतल वायु सवेरे १० बजे चोनदेशीय दुन्दुभि वनाई जाती है। इस गरम हो जाती है, तो फिर एक बार शवध्वनि होती है। समय सभी सङ्घारामके बड़े बरामदे में इकट्ठे हो कर तब मठवासी सभी संन्यासी मलत्यागार्थ निर्दिष्ट स्थान भोजन करते हैं । विना भोग लगाये कोई भी नहीं पाता। जात तथा शौक-कर्मादि कर वापस आते हैं। दूसरी सन्ध्या समय भी वे शङ्खध्वनि सुन कर इकठे होते शड्डध्वनि होने पर सभी पढ़नेवाले आँगनमें जमा होते और चाय पीते हैं। तदनन्तर चीनी ढाक वजने पर सभी है। इस समय अगर पानी पड़ता रहे, तो सभी एक वरा चड्न मद्य पीते हैं। इस समय महाकालकी पूजा तथा मदे पर आ कर पढ़त हैं। पन्द्रह मिनटके बाद फिर उसके बाद साधारणको मंगलकामनाके लिये देवपूजा तीसरी शङ्खध्वनि होती है। उस समय सभी वहासे होती है । सन्ध्या समय १०८ दीप जला कर वे स्कड पाग मन्दिरमे जा कर पुनः उपासनामे लग जाते हैं। दोप पूजा करते हैं। गुरु पद्मसम्भवकी पूजा हो भिड मा हरके वाद पुन, शङ्खनाद होनेसे वे उसी तरह पहले साम्प्रदायिक मठको प्रधान है । यहाके यति दिनमें नौ प्राङ्गणमें और पोछे मन्दिरमें इकट्ठे हो कर उपासना | वार चाय पीते और भोजन करते हैं। सन्ध्या समय किया करते हैं। इसके वीच वे तीन बार चाय पीने एकत्र होनेके वाद यतिगण फिर एक बार एकत्र होते हैं। पाते हैं। रातमें एकत्र हो कर वे अन्न और मांस खाते हैं।