पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२७७

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२८२ लाल मिर्च सम्भवतः इस शैलशिखर पर लालमाई नामक शनि- टस फलीका ६प मायके चुपके समान, पर देखने में मूर्ति और उनका मन्दिर प्रतिष्ठित था। लाकर उससे अधिक भानुदार होता है। मारे भारतमें दमा वह मन्दिर और देवमृति नष्ट हो गई है । रिन्तु जान फटाके लिये उमको ती होनी है। उसके पत्ते पीछेको भी देवीके नाम पर यह पर्वत पीठ घो पन होता हैं। ओ. चौडे और आगेगी और अनादार होते हैं। कालो कोई कोई कहते है, कि त्रिपुर-राजकुमारीने लालमार्ट चिनी मिट्टी में यह बहुतायत उप नो है। बलुई जमीन नामानुमार इस पर्व का नाम रखा होगा। अनुमान इसके लिये अच्छी नही होगी। इसी बीजापानसे होता है, कि उक्त राजकन्याने अपने नाम पर पत्रत कार्तिक तक होती है। जाई में इसमें पहले सफेद रंग के ऊपर देवमन्दिर और दुर्गादि बनाया होगा। उन्होंगी फर आते है और तक फलिश लाती है। ये फलिया कीर्शि निर्गन प्रस्तर प्रतिमूर्ति आज मी इधर उधर आकारमे छोटी बड़ो, लबी, गोट अनेक प्रकारको होनी है। ती हों इसका आकार नारंगाके समान गोल और लालमिर्चा (दि ० स्त्रो०) क प्रमिह निन्त फली। ना कहीं कही गाजर के समान होता है। परन्तु साधारणतः व्यवहार प्रायः सारे Fमार व्यजनोंमे मसाले न मे यह उंगली के बराबर लबी और उतनी ही मोटी होती है। होता है। इन फलियोका रंग हरा, पीला, काला, नारंगी या लाल भारतवर्गक समतलव में, काश्मीर की निम्ननर होता है और यह कई मरीनो तक लगातार फलती रहती शैलमाला पर तथा चन्द्रमागा-प्रवाहित उपत्यका-भूमे । है। जब यह कयौ रहती है, नदइसका रंग हरा भीर के६५०० फुरऊचा रवान पर मोहमका पेड उत्पन्न पकने पर लाद हो जाता है। होता है। पहाही मिन बहुत निक होती हैं। काश्मीर । इन्दिविनाश विश्वाग है, कि लालमिर्च पहले पहल, के पहाडी प्रदेशमे ७ प्रकारकी लाल मिर्च देनी जानी अमेरिकामे उन्न हुई थी। दक्षिण-अमेरिका के चिलि- है। लम्बाई, गठन और वर्ण द्वारा उसकी पृचकता जानी विभागां पहले यह मि देवी गई थी। तमोस इसका जातो है। अपरजी नाम निलि हुआ है। शायद इसका उत्तर ___ भारतवर्ष के विभिन्न स्थानों मे तथा यूरोपीय राज्योग ' टुत्य दारुण गीतकी तरतीब होने के कारण भी Chill लालमिर्च विभिन्न नागोरसे परिचित है। हिन्दो- मन्दले Cills नाम पड़ा है। किन्तु अधिक सम्भव है, मिरचा, मरिचा, लालमिचा , बङ्गाल-लालमरिच, लट्टा कि चिलिगने पहले पहल यह भारतीय होएपुसमे लाई मरिच, गाछमरिच , मोर-सुरफमशा, कुमायुन- गई है। यह द्वीपपुञ्ज प्राचीन काल में लड़ा और महालका मारिन्सा बनरु , कामोर-मिर्त्तज-पा-बङ्गन, मिर्च । नाम से प्रसिद्ध था। उस लडाहीयसे भारतवामि थाने के बाङ्ग म ; गुजर - लालमिरिच, मगच कच्छ-मिरचू. कारण इसका लङ्गा या लालमिर्च नाम पड़ा है। मराठी-मिरशिङ्गा तामिल-मिलगाई, मृगई, , १६ मे Bontusने चिलि और ब्रजिल देशजात मोल्ल-सघे, मोल्लागु , तेलगू-मिरपाकय, मेरपुरा, लाका उनालेय किया है। (Jac Bontil, Dtal , P. मलवार-पुमोलेगु, कप्पल-मेलक , कनाडी--मेन : 10 ) फगमी राज्यमें प्रचलित लड्डा नाम देखनेसे मालूम सिनाकायि ; सस्कृत-मरिचफलम् , अरब-फिटाफले, होना है, कि गिन, भारत और जिल ही एक समय अहमृग, पारस्य-फिलफिले-मुख, पिलपिले सुर्ग : लालमिर्चा पाई जानका प्रधान म्यान समझा जाता था। जिदपुर-मिरिश, तिमिरिज, ब्रह्म-नायु गि, ना- १७८७ मे मिहोमने बम्बई प्रदेश लालमिर्गको योप, अङ्गजी-Chilly , फगसी-Pos re tle Guince !! उत्पन्न होने देखा था। विदेशजात इस वस्तुको भारतके posre du Bresil, d' Inde तथा अन्यान्य गज्योग पश्चिमप्रान्तमें अधिक उत्पन्न होते देख वे बड़े विस्मित Red pepper और chilly वा Chilevsis नामोसे हुए थे। उस समय गोआ प्रदेशमें जो मिर्च उत्पन्न होती . प्रसिद्ध है। थी उसे लोग गोआई-मिर्च कहते थे।