पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२८१

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लालाभत-जाला लाजपत राय चाहती हैं। उन्होंने यह समझ लिया, कि धोविन उन्हें लालायित (स० वि०) लाला "नमस्नयो वरिवः कण्डया विश्व-मदमें मत्त देख कर ध्यङ्गने कद रही है, "समय बीत विभ्यः क्यनी' इति पय, लालायक। १ दाला चला, बासनामोशे जला दो।" उनके हत्यमे दावाग्नि में विशिष्ट जिम मुह बहुत अधिक लालन के कारण जले हप वृक्षक मातरम कीडॉकी पीटानी नरह विपर पानी भर आया हो. ललचाया हुआ। जिनका बहुत ज्याला धरु उठी। उन्होंने वेगग्य का अवलम्बन किया। अधिक चालन किया गया हो, टुटारा । वैगम्योदय होनेमे वे विषय-मोगलाल मामा परि लाला लाजपत राय-पजायके एक चिस्यान नेता। आप याग कर पश्चिमाञ्चलय तीर्थयात्राको निकले । प्रत्येक जनसाधारणमे पञ्जाब नेशरी नामले परिचित थे। आप नीर्थ में आ कर वे अपनी दानशीलनाना चयष्ट परिचय का जन्म पञ्जावके लुधियाना जिलेने अनर्गन जा ग्राम में दे गये है । वृन्दावनगे आर उन्होंने मर्मर पत्यका एक १८३५ ई० में अग्रवाल श्रेणीके पक चैध बंगमें हुआ था। बदा मन्दिर बना दिया। यह मन्दिर आज मी 'लोना आपको पितो काठ राधाकिसन गवगट कृमें उर्दु बाबका कुत' नागने प्रमिव ।। राजगृतान में जब वे भाषाके अध्यापक थे। १८७७ ई० मे लाला लाजानपने मर्मपत्या गरीढने गये, तब कई राजकीय कारों में म्यगामी दयानन्द सरस्वतीकी मतानुपायी शिक्षा ग्रहण की फोन गरे। पीछे उससे छुटकारा पार ये किम्मे बन्दा- लाला राधाकिशन एक पके कांग्रेमके अदमी थे। बनयामी हो ऐ झान्तिक-विनमे भगवान नारायणके। उन्होंने मर सैयद अहमदका मत अबलम्बन किया था, गनमे निग्न प । वृन्दाबन-धामीमा विश्वास है, कि किन्तु उन्होंने छान् अाना मत परिवर्तन कर जन माम उन्हें श्रीकृष्ण के दर्शन गर। कभी कभी प्रमोन्मादमें : का विरुद्राचार आरम्भ किया. नव लाला राधाकिशनने उनकी मोहन मुरली ध्वनि सुन बर ने यमुनाके किनारे। उनके आचौरका घोर प्रतिवाद कर 'कोहिना पदिकामे दौद डरे थे। उर्दू भाषामे एक प्रबन्ध लिम्बा था । लाला लाजपत गपने वृन्दावन में रहने समग उन्होंने मथुग जिले के अन्तर्गत एक ओर पिनास खदेश प्रेम नधा दूसरी ओर माना 'गधाकुण्ड' नामक तीर्थको चारों ओर सफेट ममर । सरलता और प्रिनययिता शिक्षा पाई थी। आपके चरित्र में पत्याची नाडी चंबया निया था। श्रीकृष्णका चरण- माताका आदर्ग विशेष परिम्फुट होते देखा गया था। ध्यान करने करने वृन्दावन धाममें ही उनका देहान्न हुआ। लाला राधाकिशन स्वयं शिक्षक ये इमलिये सन्तानकी जहां उनकी ममाधि हुई थी, वनवासी उसे तीर्थ शिक्षा के प्रति उनका विशेष लप था। आपने वृत्तिलाम बतला कर घानियोको दिग्बलाने हैं। कर लाहोर गवर्मेण्ट कालेजने दो वर्णनक आईन अध्य- मृत्युके बाद उनके बालकपुत्र श्रीनागणसिंह उस यन किया तथा १८८3 ई० में आईनकी प्रथा परीया नया सम्पत्तिके अधिकारी हुए। १८८५ ईमे पाय-विश्वविद्यालयको लाइमेन्सियेट इन- लालामक्ष (20 वि०) १लाला-भोजनकारी, लार खाने- ला ( Licentiate in L13 ) परीक्षा उत्तीर्ण हुए थे। वादा । (पु.)२ नर कभेद, पुराणानुसार कनकम अन्नको परीक्षा तीस परीक्षार्थियों के बीच आपने नाम । कहते है, कि जो लोग चिना बनाओ आदिको द्वितीय स्थान पाया था। इसके बाद अप हिसार नगर गोग लगाने टायमा विना अतिथियों को भोजन ऋगये में वकालत करने लगे। आप नीजन कर लेने हे. वेडमी नरकम जान है। इस समय पञ्जावमे एक नया आन्दोलन बड़ा हुआ लालामिक ( स० वि०) लालामग्राही, सौन्दन लेने वा। १८४६ ० जब लाई डलहौसीके समय पक्षाव वाटा। अगरेज गवर्मेण्टकब्जेमे आया था तबसे पसाबमे गालामेट (सपु० ) लालायन् मेहनी न मि-अन् । देश, धर्म या अपने लिये किसी प्रकारका आन्दोलन नहीं पत्रकारका प्रमेह । हममें महको लारकी तरह नार बंध हुआ था। स्वामी दयानन्द सरस्वतीश और धर्मकी प्रापेमाद होना। यवस्था, पादरियोंका जुलम, शिक्षा, राजनीति आदिके