पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३०५

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लिन ३१० और वालिद्वीपसे सुप्रतिष्टिन हुआ। वहाले प्रम्यनन । भारतवर्षमै नहीं, सुप्राचीन चीन, ग्रीक और रोमकजानि नामक स्थानमें दो सास अधिक देवमन्दिर तथा शिव. में मो लिटोपासना प्रचलित थोर । रोमकों के मध्य दुर्गा, गणेश, सूर्य आदिकी पत्थर और पीतलजी प्रति- प्रियापम' और प्रोकों के मध्य 'फालाम' नाम लिदमूर्ति मूर्ति थाज भी विद्यमान है ।। जावा और वास्नि देगा। परिचित गो। निवतीयों की उपास्य लिगमत्तिको चीन ग्रीक भौगोलिक सारियन्ने कन्याकुमारीके वर्णना भापाने हलि फुर फदने हैं। इसराएलगण भी पहले म्बलमें लिया है, कि कुमारीनाम्नी देवी के नाम पर उस दिपूना करते थे। मकामें जो मयर लिगमूर्ति है स्थानका नामकरण हुआ है। दुर्गाशा एक नाम कुमारी ! यह पक समय इसरापलोंको उपास्य थी। भविपपुगण है। आग्यिनके समय (२री सदी में ) वहा उस देवीसी के ब्राह्मपर्व में इम मश्वर लिगका उल्लेख पाया है। एक प्रतिमूर्ति थी। शायद दाक्षिणात्य-प्रसिद्ध किसी वाइबिल पढ़नेसे मालूम होता है, कि रेहोवोयमके शिवलिङ्गकी हो वह शक्ति होगी। पुत्र आशाने अपनी माता मायाकाको लिहके सामने जगत्सृष्टिको आदिभूता प्रकृतिपुख्यात्मिका उत्पादिका बलि देनेनि मना किया था। पीछे उन्होंने ऋद हो उस शक्तिको हो स प्रतत्त्वका मूल उपादान जान पर शैव लिदमूत्ति हो तोडफोड डाला (Kingexx. 13)। यहदी गण हर पार्वती की लिइयक्तिको ही जीवोत्पत्तिका मुर गण बडे उत्साहले लिगुरूरी देवता वेर फेगोके गुप्त कारण बतलाते हैं। योनि और रिद्ध अर्थान् प्रकृति और मन्त्रमे दीक्षित होते थे। मोयावीय और मरिनावामि- पुरुपके सङ्गमसे ही सृष्टि हुआ करती है, इस कारण उसी गण फेगो पर्वत पर स्थित इस लिइसी ही उपासना कं चिह्रस्वरूप लिदमूर्ति संगठित हुई है। एक मङलमय करने थे। उनको उपासनापद्धति सर्वतोभायम मिन इच्छाग्ने प्रणोदित हो परमपिताने जगत्को मलाई क लिधे वासियों के घेल फेगोकी उपासनापद्धतिको जैनो श्री। प्रतिपुरुषके सट्नमसे सृष्टि कार्य आरम्म किया। सम्भ जुदा ( Judi]1 ) वासिगण पर्चत ट्वस्थ वनमागमे तथा चतः प्रकृतिके उपासक्गण उस लिङ्गरूपमें ही शिवत्वरी बडे वृक्ष के नीचे देवमन्दिर और देवमूर्तिको प्रतिष्ठा का आरोपना करते होगे। तभीसे वसम्प्रदाय उस लिड परम पिताके शप्रियभाजन हुए थे । वाल (Raal ) उन रूपी युग्ममूर्तिकी दो शिव नामसे उपामना करते आ का उपास्य था तथा लिगाकार प्रस्तरस्तम्भ हो उनकी मका चिह्रखरूप माना गया था। लोग इस देवता. प्राचीन भारत पासी उस सृष्टिस्थिनिलयकारी अध्य। को वेदोके सामने धृष धना जलाने थे तथा प्रति यमा- यात्माका निराकारत्व अपनोदन कर क्रमशः लिडरूपा । वस्याको उस लिगमर्तिके सम्मुग्वस्थ वृपके सामने उग साकारत्वकी कल्पना करने भा रहे हैं तथा बहो। पूजोपहार देते थे। इसराएल लिगमूर्ति सामनेको यह धोरे धोरे जगदासोका उपाय माना गया है। कंवल वृषभमूर्ति हिन्दू के सत्त्वगुणप्रधान वालेश्वर शिवलिङ्ग सामुग्वस्थ धर्मरूपी वृपमूर्तिकी जैसी है। मिस्र मोसि- ग्मि मूर्ति के पिमके साथ भी इसका ययेट सादृश्य है । or the hgurc 14presenting the inile member of पाश्चात्य लेग्वकगण भूलसे उस वृपत्तिको शिवानुवर Alys, the well-beloved of Gy bele, and the Bac नन्दो वतलाते हैं। कोई कोई उसे शिवका वाहन chus which they worshipped at Helhopolis कहते है। The Egyptians, Greeksand Romans had tcmples dedicated to Priapus, under the same form as TV Taytor's Ex &Analy of lacr. Manue, that of the lingam. The Israelites worshippedi and Jour Roy As. Soc rol. II. 202-218 the same figure and erected statues to t" दाक्षिणात्य शिववाहन वृषको नन्दी भी कहते है। T Vide Journal of the Indian Archipelego, | "उलूक वृषभ देवि नाम्ना नन्दी प्रकीर्तित." (लिङ्गार्चनतन्त्र २य पटल) vol, um.