पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३०७

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लिङ्ग रब्य लिङ्गपूजाकी चिरन्तनपद्धति, उत्पत्ति और इन सबझी आलोचना करनेसे यह निःसन्देह कहा जा विस्तारका सम्यक इतिहास विलुन हो कर मित्रबासीकी सकता है, कि जगत्के आदिकारणस्वरूप प्रकृतिपुरुषात्मक तरह क्रमशः किवदन्तीमूल हो रहा है। परवर्शिकालमे लिग और योनि हो जीवोत्पत्तिका अवान्तर कारण है लिङ्गादि महापुगणमे तथा तन्नादि शास्त्रमे लिङ्गार्चन- और यही ज्ञान कर जगहासी जातिमात्र ही परमपिता विधि स्वतःलभावमे और उस समयको रीतिके अनुसार महान् ईश्वरको उस मुख्य शक्तिको उपासना किया लिपिवद्ध हुई है, ऐसा अनुमान किया जाता है। उस करती है। प्राचीन आर्यसमाज में समादृत और पूजित आदिम उपासनापद्धतिका कुछ अश अर्थात् लौकिक उस महेश्वरको लिंगमूर्तिका आर्यजातिके प्रतीच्य और और फौलिक आवारादि उसमे नहीं शामिल किया गया प्राच्य उपनिवेशमें क्रमशः प्रचार हो गया था । शायद है, ऐसा सोचना गलत है। राजा काम्बिशने पौत्तलिक इसी कारण भारतीय और रोमीय लिगमूर्ति में इतनी धर्म विरोधी हो पुगेदिनोंको दण्ड दिया तथा पवित्र सदृशता देखी जाती है । प्राचीन त्रुि गण जिन 'वाल' पसिसको तहस नहस कर डाला। ऐसे कठोरोचारका देवताके उपासक थे वे भारतीय वालेश्वर लिङ्गके सिवा अलम्बन करके भी वे लिङ्ग-उपासनाका उच्छेद न कर और कुछ नहीं हैं। वाइबिल ग्रन्थ में भी इस लिङ्गमूर्ति सके। परवर्शिज्ञालमें ग्रोक और रोमक ज्ञातिने नील को Chun वा शिउन कहा है। भारतवासी हिन्दूमात नदका अववाहिका प्रदेश जीत कर मिस्र देवमण्डलीकी ही इस मूत्तिको शिव, शिउ आदि नामोसे पुकारने है । रक्षा की थी। उन लोगोंने भक्तिवित्तसे उन उन देव. इससे स्पष्ट मालूम होना है कि ईसाधर्मसे बहुत पहले ताओंका मन्दिर बनवा कर उसे स्थापत्यशिल्पसे परि | जम्बू और शाकहोपके आर्यसमाजमें शिवलिङ्गकी उपा- शोभित किया । सना प्रचलित थी। प्राचीन भारतीय आर्यजाति जिस ईसाधर्मके अभ्युदय पर पाश्चात्य जनपदवासियोंने | समय शिवलिङ्गकी उपासना-पद्धतिसे जानकार थी, धीरे धोरे पौत्तलिक उत्सव और आडम्बर छोड़ दिया। उस समय हिब्रु गण भी वालदेवको लिङ्गरूप आसना नीलनदका देवसङ्क, रोमका देवलोक और आथेन्स नगरी किया करते थे। किन्तु किस समय तथा किससे यह का देव-समाज साधर्म के गौरवको विलकुल दवा न लिंगोपासना भारतवर्पमें अथवा- सुदूर पश्चिम-यूरोप- सका । पारिपाट्यहोन और आडम्बरशून्य उपासनामें | खएडमें प्रचारित हुई थो, मालूम नहीं। पाश्चात्य प्रल लिप्त हो कर उस देशके लोगोंने मूर्तिपूजाका अनादर तत्त्वविदों की धारणा है, कि जर दिव जाति अथवा ग्रीक किया । देवता और भन्दिरादि अनादरसे तहस नहस और रोमकोंके मध्य पहले लिंगोपासनाका प्रभाव देखा र डाले गये । थियोफिलसने अलेकसन्द्रियाके कहनेसे जाता है, तब यह अवश्य स्त्री हार करना पड़ेगा, कि क्तिने प्रन्दिरोंको ढाह दिया। पीछे मेस्फिसका ओसि भारतवासीने वह प्रतापले ग्रहण किया है। किन्तु यह रिस मन्दिर भी लिगम्रष्ट हो कर गिरजाघरमें परिणत वात कहां तक सच है सहजमें इसका पता लग सकता हुआ था। है। शव रोम साम्राज्यका उत्थान नहीं हुआ, जब ईसा- मसीहने जन्मग्रहण नहीं किया था, ताइविल ग्रन्थको सूचना हुई थी या नहीं संदेह है, तभीसे भारतवर्ष में आर्य

  • "Isis and Osiris, Serapis and Canopus,

Apis and Ibis adopted by the Romans, whose सभ्यताका स्रोत पूर्णशक्तिसे वह रहा था। बुद्ध-निर्वाण- temples and images yct preserred, will allow के एक सदी बाद बुद्धकी प्रतिकृति वौद्धोंके यत्नसे सारे full scope to the Hindu antiquary for analysis of both systems The temple of Serapis at FEzekiel XVI 17 Amos, v. 25 27, पढ़नेसे मालूम Porroult is quite Jindu in its ground plan" | होता है, कि ई. सन्के ६५५ वर्ष पहले भी वर्तमान शिवलिङ्ग- Tod's Rajasthan, vol. 1, p. Goon1 मूर्तिमें निझोपासना और कपालमें तिनकधारण प्रचलित था।