पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३०८

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लिङ्ग ३१३ जम्बूद्वीपमें तथा उत्तर पश्चिम एशियाखएडके नाना , नाता है। उसका निचला भाग कुछ मोटा होता और स्थानोंमें प्रतिष्ठित और पूजित हुई। रहित विस्तारसे, मासा कहलाता है। स्तम्भके मध्यस्थरमें योनिपट्ट वा नाना जाता है, कि युद्धक पहले होसे शिर विष्णु और गौरोपट्ट रहता है । कहो कहा उस प्रणालिका मानते हैं। सूर्यपूजा प्रचलित थी। शैव, वैष्णव और सौसे बौद्धोंने | यह गौरीप ही पार्यताको योनि वा मूलप्रकृतिको स्त्रो मूतिका धमाना सीखा होगा। शिव देखो। चिह्न है। इस योनिपट्टके ऊपर जो पुचिह्न है यही शिर ____अमेरिका महादेशके पेभिया नामक म्यानमें राम | लिग कहलाता है। यही कारण है कि प्रधान प्रधान सीतोया' महोत्मा तथा यहाके राजवशके सूय यशो | शेव पीठमें आसन न बना कर हो योनिपट्टक ऊपर लिंग द्भवताका प्रसाद प्रचलित है। उस स्थानका मध्यरत्ती | स्थापित देखे जाते हैं। कुछ जातियों को भापाम इश्वरका नाम सिन हे । मासिया| भारत पपमें कमसे कम आठ करोड मनुष्य शिवलिंगकी के अन्तगत फ्रिजिया नामक देश के लोग सवा या सेवा | पूजा करते हैं। हिमालयक अत्युश्च ग बदरिका प्रम जियस नामक देवताको उपासना परत है। ये देयो , मार पशुपतिनाथसे लगायत बहुत दूर दक्षिण रागेवर पासकगण दोक्षाकालमें सपघटित कुछ अनुष्ठान किया सेतुवध तक पर्यवेक्षण करनेसे असख्य शिवलिंग नपर करते हैं। मिनासाके वाइस (प्याने श)के सिवा एक बात है। गगाके दोनों किनारे खास कर वाराणसनिमें दूसरे देवताका पाम सेय, सेघवा वा सोया देखा नाता | और व गालमें मन्दिर प्रतिष्ठाके साय माय रिगमूत्ति है। इस पामकी सदृशता तथा सपंगत प्रक्रियादिया | स्थापTET याहुल्य देखा जाता है । “याराणसीके विश्ने अनुधायन करनेस हम लोगोंक व्यालमाल विभूषित और श्वरादि मन्दिर उडिसामा भुवनेश्वर, सेतुब धमें रामे घ्याधाम्बरपरिहित शियकी वात याद आ जाती है। भ्वर मन्दिप सोमनाथका सोमनाथ मन्दिर तथा वैद्यनाथ पाश्चात्य पण्डितोंका विश्वास है, कि विष्णुकी| और कालना नगरमें वर्तमानराजके प्रतिष्ठित १०८ उपासनापद्धति प्राचीन तातार राज्य ( शाकद्वीप से मन्दिर शैवकीर्तिके निदर्शन है। इनके सिवा काचापुर, भारतवपमें लाद गइ है। पितु सामाग्यका विषय है, कि जम्बूकेश्वर, तिरुमलय, चिदम्बरम और कालहस्ती आदि वे रोग शियपूजा सम्बध ऐसो किसी एक अद्भुत स्थान में प्रसिद्ध और सुपाचान शैवकोर्तिया देखनमें मोमासा पर नहीं पहुंचे हैं। उन लोगों का कहना है, कि | मातो हैं। इसा जमके पहले हीसे यह शिवोपासना पद्धति सिधु | शिवपुराण (३८ अध्याय) तथा नन्दि उपपुराणम सैकतसे रानपूनानेके मध्य होतो हु आयावतभूममें | शियजी कहते हैं, कि 'मैं सर्वथ्याशीह, जितु मोराद्र- पी। कालिदासके वर्णनसे मालूम होता है कि इसा | सोमनाथ, कृष्णातीरस्थ नीशैल पर-मलिशाजुन, उज ज-मसे पहले पहला सदोमं उज्जयिनी नगरमें महाकाल यिनी नगरम---महाकाल, मोङ्कार और अमरेश्वर, पिता तथा ओडारेश्वरका महोत्सर होता था। मुसलमानी भूममें-वैद्यनाथ दक्षिण सतुबन्ध-रामे वर, वाराणसी भारमणक पहले भी हिंदू-रानोंके अधिकारमें वहा | क्षेत्रमें-विश्वेश्वर, गोमती तट पर-वाम्बा, हिमा ग्य लिगोपासना प्रबल थी। यहाका विदुम्वर्ण नामक TिR | क पृष्ठ पर-केदारनाथ, दायकवनम-नागेश शिरालय लिग अत्यन्त प्रसिद्ध है। में-धूश्मेश, डाकिनीमें-मोमशटर आदि विशेष विशेष ___हम रोगोंके देशमै एक एड लम्वे गोल या कोणा मूत्ति में विद्यमान है। कार प्रस्तरस्टम्म ले कर साधारणत शिलिग बनाया| १०२४ ३० या ४१५ हिजरीमें सुलतान महमूदने गजनी आ घर सोमनाथ मन्दिरको तोडा। १९५८ शकमें सुरु । Serpent and Ssa norship and Mythology तान अलतमस उन यनीकी महाकारमूत्ति तोड पर in Central Amenes Africa and Asia by Ide ] दिल्ली ले गया।हिमाल गस्थ क्दारतीयमें आज भी हि । Clarke.p 10 11 तीर्थयात्री जाते हैं। दक्षिणम राजमदे दीके मतगत ___Vol x 79