पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३०९

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३१४ लिन द्राक्षाराम-ती में भीमेश्वर मूर्ति विद्यमान है। वह पुरा- ( Bacchus ) देवकी चक्रपीटस्थ जो सब लिगमूर्ति है, णोक्त डाकिनीस्थित भीमशङ्कर नामसे प्रसिद्ध है। उनके साथ कोटीश्वरका सादृश्य देया जाता है। वैकस. नर्मदाके किनारे बोडार मान्धाता नामक स्थानों को व्याश शव्दमा अपभ्रंश माननेसे हिन्द्रकी प्याश- ओडार शिव विद्यमान हैं। काशी में विश्वेश्वर, वैद्यनाथमें | शिवमूर्त्तिके अनुकरण पर वैकसकी लिंगमूर्ति स्थापना- तथा सेतुबन्धमे रामेश्वर आज मो पृजित होते हैं। की कल्पना की जा सकती है। क्योंकि दोनों ही मूर्ति ताम्बक, घश्मेश और नागेश लिंग कहा किस प्रकार है एक-सी हैं तथा व्याघ्राम्बरधारी हैं। प्राचीन ढोलपुरमें उसरा कोई निदर्शन नहीं मिलता। (वत्तेमान वगेली नामक स्थानमें ) योनिचक्र पर घूमती प्रीक ऐतिहासिक भारियनके वर्णनसे जाना जाता है, हुई एक लिंगमूर्ति स्थापित है। वह मूर्ति घाटेश्वर कि माफिदन-वीर अलेकसन्दर पक्षावप्रान्तमे शिवपूजा महादेव नामसे प्रसिद्ध है। ती यात्री निर्जन अरण्य- और शैवोत्सव देख गये थे। उसके बहुत पहले हीसे मध्यस्थित यह घाटेश्वरतीर्थस्थ लिंगमूर्ति देख कर बडे उत्तर-पश्चिम भारतमें शैवसम्प्रदायका प्रादुर्भाव हुआ | हो विसित होते हैं। था। ३री सदोमें बहुत दूर पूरव आनम् और कम्बोजमे प्राचीनकालमे लिगोपासना केवल भारतवर्ष में ही शैवप्रभाव विस्तृत हुआ था। १०वीं या ११ची सदोमें आवद्ध थी सो नहीं, यहांसे १८ सौ कोस पश्चिम मित्र दाक्षिणात्यमें लिग वा रुद्रोपासक शैवसम्प्रदायका पुनः देशमे मोसीरिस देवको लिगपूजा विशेषरूपसे प्रचलित प्रार्भाव हा । उन लोगोंने बौद्धोंको उत्पन्न कर भारत | थो। योसोरिस बहाके एक देवता समझे जाते हैं ! वपमे हिन्दू प्राधान्य स्थापन करने के लिये शेवधर्मको । इस मोसीरिस और उनको स्त्री माइसोस देवीके साथ प्रतिष्ठा की । यह वादशाक्त-विरोध भारतीय हिन्द इनि शिव और शक्तिको अनेक विषयों में एकता देखी जातो हासनी एक प्रसिद्ध घटना है। है। भगवतो जिस प्रकार विश्वरूपा है, आइमीस देवो दाक्षिणात्य तैलिंग राज्यमे बिलिंग वा त्रिमूर्ति, भी उसी प्रकार पृथियोरूपा हैं। तन्त्रोक्त शक्तियन्त जिस इलोराको गुहामें तथा अन्यान्य स्थानों में चीमांत वा प्रकार त्रिकोणाकार होता है, माइमीसदेवीका परिचायक चतुर्मुख, मथुरा-सन्निहित स्थानमे पञ्चमुग्न तथा उदय । उमी प्रकार एक त्रिकोणयन्त्र या | शिव जिस प्रकार पुरके उत्तरमें अवरियत इतिहासप्रसिद्ध एकलिङ्गनाथ संहारकर्ता है, ओसोरिन उसी प्रकार प्राणसंहारक यम- मूर्ति भारत के विभिन्न साम्प्रदायिक शिलिगका निद. स्वरूप हैं। शिवका वाहन धर्मरूगी वृप जिस प्रकार शन है। पूजनीय है, मोसोरिसदेवका एपित नामक प भी उमी ____एकलिग सूत्ति एक खण्ड नल कार अथवा कोणा प्रकार उनका अंशम्वरूप समझा जाता है। कार पत्थर पर बना होता है। इसी प्रकार किसी किसी पाश्चात्य जगत्में प्रचलित एक उपास्यानसे जाना लिगके चारों ओर तथा ऊपरमे चार या पाच मुख खोद | जाता है, कि वैकस देव भारतवर्षसे दो वृपको मिस्रदेश कर चतुर्मुख वा पञ्चमुग शिवमूत्ति कलिरत हुई है । इम ले गये । उसीका एक नाम एपिस है। गिव और ओसी- के सिवा अगणित मूर्तिविशिष्ट और भी कितने प्रकार रिस दोनों देवताका ही शिरोभूपण सर्प है। शिवके के शिवलिंग दृष्टिगोचर होते हैं। उनमें से शैपलिंग, कोटो हाथमे जिस प्रकार त्रिशूल शोभता है, भोलीरिस देवके श्वर आदि उल्लेखनीय हैं। एक बड़े पत्थरके खभेमें | हाथमें उसी प्रकार एक तीन फलवाला दण्ड लटक लाखसे अधिक छोटे छोटे लिग खोद कर उक्त दनों रहा है। मिस्रदेशके ओसीरिस देवकी अनेक पापाण- मूर्ति बनाई गई है। सिन्धुनदकं पूर्वी किनारे इसी 'मय प्रतिमूर्ति के साथ व्याघ्र वर्म परिहित शिवमूर्तिका प्रकार एक कोटीश्वर लिगका सुप्राचीन मन्दिर तथा । सादृश्य देखा जाता है । मि० विलफिन्सकन प्राचीन सौराष्ट्रदेशमें शेप लिंगको कई मूर्तियां तथा मन्दिर 'मिस्रवासीके इतिहासमें ठोसीरिस देवका चर्मपरिधृत विद्यमान है । ग्रीस और मित्र राज्यमें वैकस- प्रतिरूप विद्यमान है। शिवप्रिय विल्वमकी तरह उन्हें