पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३१४

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लिग ३18 घरना होता है। इसके अतिरिक्त नर्मदा नदीमें ए| याम्यलिङ्ग, नैतलिङ्ग पारुणलिड, यायुलिडपुर प्रकारका लिग पाया जाता है जिसे पाणलि ग कहते हैं। रिङ्ग, रौद्रलिङ्ग, वैष्णवलिङ्ग स्वयम्भूलिद, मृत्युजयलिड यह लि ग भुचिमुक्ति प्रदायक है। नर्मदा, देविका, गगा, ! नोलकण्ठलिङ्ग, महादेवलिग, ज्यलिग, त्रिपुरारिलिङ्ग, यमुना आदि पुष्य नदियों में वाणलि ग पापे ज्ञात है। अर्द्धनारीश्वरलिग और महाकाललिङ्ग आदि । इनमेसे हिदि देवताओं ने इस लिगकी पूजा की थी। स्यय | प्रत्येकका पृथक् पृथक् लक्षण शास्त्रम लिखा है। उप सब शिनी इस लि गमें अवस्थित हैं। लक्षणों द्वारा उन लिङ्ग स्थिर करना होता है । घाण याणलिगका पूजा करने पहले उसको वेदिका लिट्के शुमाशुभ लक्षणको तरह परीक्षा करनी होता है! बनाये। पोछे उस पर यह लिग स्थापन कर पूजा करे। निन्ध लिग वाणलि गपश होनेसे पुलदाराद ताम्र स्फटिक, स्वर्ण, पापाण, रनत या रौप्यकी चेदा| क्षय, चिपटा होनेसे गृहम ग एक पार्शस्थित होनेसे . धन ने विधान है। पुत्रदारादि घनशय, शिरोदश स्फुरित होनेसे प्याधि लिग नर्मदादि पुण्य नदियोंसे वाणलिग निकाल कर छिद्र होनेसे दिशगमन तथा लि गमें कर्णिका रहनेस पहले परीक्षा करे। पीछे सरकार परोक्षाका नियम-पहले, प्याधि होती है। इसलिये उन सब दोपयुक्त पाणलिग तराजूके पर पलटे पर धापलि ग और दूसरे पर उसीके | को पूजा नहीं करनी चाहिये। इसके सिवा तोदणाम समाचारल रख कर एक वार वजन करे। पीछे उस चक्रशीप तथा वान (त्रिकोण) लिग वर्जनोय हैफिर चावलस दूसरा वार पजन करने पर यदि यह चावर | गति स्थूल, अति श स्वल्प और भूषणयुक्त लिगको भधिक हो जाय, तो यह लिन गृास्थोंका पूजनीय है | गृहस्थ लोग पूना परे। यह लि ग जो मोक्षार्थी है ऐसा जानना होगा। पजन ३,५ घा७ चार वरना | उहोंके लिये हितर है। होता है। यदि प्रत्येक वारकी तौल समान निकले, तो उस शुभलि ग-घनाभ और कपिल वा लिगरिशेष लिहको जन्में फेक देना होगा। चावलसे यदि लिङ्ग शुम है । इस लिगकी पूना करनेस शुम होता है। लप भारा हो तो यह लिङ्ग उदासोनोंक लिपे दितर है। पा स्थल कपिल वणके लि गरी गृहम्यगण पगी भी (सूनसहित ) । पूजा न परे। भ्रमरको तरह पणनणश लिग सपीठ घाणलिड है या नहीं इसी प्रणालीसे परीक्षा करनेके | अपीठ वा मात्र सस्कार रहित होने पर भी गृहस्थ उस बाद उसका संस्कार फरफ पूजन को। की पूजा पर सकते हैं। रिद्धपूजाविधि-पाणलिङ्गका पूजामें पहले सामान्य वाणलि गामाकार पद्मयोजक असा होता है। पूजापद्धतिक्रमसे गणेगादि देवताको पूजा करके याण | यह पालि ग मुक्ति मोर भुकिप्रदायर है। पर जम्यु लामो स्नान कराना होगा। पाछे निम्नोर ध्यान पर की तरह तथा कुपकुटाएड भारतिका लिग भी मात्र पद पर मासोपचारसे पूजा तथा फिरसे ध्यान ! वाणलिग पहाता है। यह लि ग मी पूनामें विशप कर पूजा करनी होती है। पूजा यथाशक्ति पोडशादि प्रशस्त है। मधुषण, शुक नील, मरफ्त मणि के तथा उपचारसे की जा सकती है। ध्यान मात्र- दमहिम्यक जैसे रि गकी प्रतिष्ठा करना उत्तम है। यह “ो प्रमत्त शक्सिपुर वायारन्यय महाप्रभम् । लिग नर्गदादि नदीके जल में पगतस आपे आप उत्पन्न कामयान्वित देव संसारदहनक्षमम्। होते हैं। इस कारण नदीसे ला कर सस्कार करके उस गारादि सालास वायाज्यं परमेश्वरम् ॥" की पूजा की जा सकती है। पहले वाण तपस्या परफे इस ध्यानसे पूजा और जपादि करक स्तयपाठ करना महादरस यही यर पाया था, कि ये मर्मदा पति पर होता है। पाणलिन पूजामे मावाहन और यिसनन नहीं । लिगमपर्म आरिभूत रहे । इसीसे जगतीतल में यह होता। रिग याणरि ग नामसे प्रसिद्ध हुए । एक वाणलिग पारिन मोर प्रशारफ है, वैसे-माग्नेपलिङ्ग ! को पूजा करनेसे बहुलि ग पताका फलाम होता