पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३१८

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लिङ्गति-लिङ्गायत १२३ रित्ति (म. पु०) लिड़मेर वृत्ति जोंग्नोपाणे यम्य ।। जाती । येरे और प्राह्मणम इनरी कोइ श्रद्धा नही है। भोयिसारा जटादि शिधारण पद जो फेवर पाहरी पहले वह भाये है, कि दक्षिण भारतमं शिवलि गरी चिद या येापना परमपनो जीवित करता है हकीमले| उपासना प्रचलित थी। पदाके वर्तमान ठिगोपाम वान! सम्मदाय लिगायत कहलाते हैं। पल्याणपत्तनके पधि लिवेदी (स. स्रो० ) या चौकी या पीढा जिस पर पतिशिल राजाके समय इस अवलमें सैनयमका बहुत देयमूर्ति स्थापित होती है। कुछ प्रादुर्भाव था। १९६० इन्फे बाद वामय नामापक लिङ्गार (सी०) सून्म राम, पद पर जिसको नाहाणकुमारो जेनधर्म निरसन पर शिवपूजाका प्रचार म मृत्यु द्वारा न हो। प्रति देखो। करनेके त्रिगे दाक्षिणात्यमें अगम सम्प्रदाय प्रतित हिङ्गा (मलो०) १ च्यारणोक्त शब्दममूहोंको शिया। महाराष्ट्रय अन्तर्गत घेलगाम जिले के मध्यपत्ती रिङ्गादिनिर्णायक नियमायली। एक व्याश्रण प्रय भागोयान प्रामम पा शेषनाहागयशमें SIT जाम हुमा लिङ्गमदूना (स. खी० ) लताविर लिगिनी । था। ये अपना मत विस्तार और उसके नाना कार्यों को लिङ्गस्थ (स.पु०) सिझे प्रावय तिष्ठति स्थाका र ११६८ ६०में परलोमिधारे। पामयपुरोणम उनका प्रहर रो। चरित्न विशेषरुपसे यर्णित है। जनम लोग उक्त पुराण लिङ्गहना (सी .) मूर्या। और साम्प्रदायिक अन्यान्य प्रग्धों के अनुसार उग्दे शिय रिहाण (सो०) मेदाप्रमाग, लि गगग भाग। के अनुचर नन्दीक यातार मानते हैं। रिक्षावित ( स • पु० ) एक शैरसम्पदाय । उक्त पुगणमें लिया है, कि उपनयनफे समय सूर्णको निनायत नगा। | उपासना करनी होता है इसलिये यासपने बचपनमें यहो रिहानासन (मो .) पलि गव्ययहारको प्रणालो।। | पनौत नहीं पहना था। उहोंने कहा था, 'मैं पियको २यद शियम नो व्याकरणमें शादादिफे लिगनिरूपणार्य छोड अन्य गुरुका उपदेश प्रक्षण नदो करूगा। पीछे रदा गया। उन्होंने अपना मतानिपोपा पर अभिनय उपासक मम्म लिहायत-दक्षिण भारतका विएयात शैय सम्प्रदाय । दाय प्रारित पिया। लिगको उपासना उनका धर्म है। ये लोग सोया चादी क्यच सोने या पत्थरकी नियलि गति बना ___पासपने हिन्दु धर्ममें या अग्नि मोर गम्यान्य देय पर धातु या गरम पहनन हैं। इनमें पिचाइ मत्येष्टि देपोकी पूजा जातिमेद मरणान्तर योनिभ्रमण, मालण मादि विषय मानामा प्रारसा यिमिन्न माचारपद्धति लोग प्रहामन्तान और शुद्धारमा, उनके स्तन्त ममान प्रालित है। और अमिसम्पाती माशा, प्रायश्चित्त, तीर्थमुमण, दाक्षिणात्य रिगायत सम्पदाप मारतके नाना | स्थानविशेषका माहास्य, नियोंको मप्रधााता और थप स्थानाने जगम, लि गघारी लिगधर, लि गयन्त रिग दम्थना निकट सम्पीय याशा पाणिग्रहण प्रतिषेध, मत महिनामोंसे परिचित है। पेरोग योरापारी शैव गगादि तोजल सेयन, ब्राह्मणभोजन और उपास है। गले या पादम सि गधारण और उसी उपासना शौचाशीच सुरक्षण, पुरूक्षण, मत्येटिमियाको आयश्य माविणे सिपा पे लोग विशेष पिसा धर्मपद्धति अतु पता भादि विषय मारमा समझ कर मना किपे सरफ नहीं करते। इनमें नारिमेद नहीं है। प्रायोशेप सपा उसे छोड दनको अनुमति दी। जानिष्ठ महा मान । ती वारी और थाणिज्य पगा उन्होंने छोटो छोटा सिगमर्सि प्रस्तुत कर रो और टोरमा एमाल जारिश है। पेशोग साम्प्रदायिक | पुरष नियोरे दाध धौर गरे पहननेका उप दिया परतितावादी मिसाएर पडीधना मारा करते हैं। था। उमक मठम माम् गुर लिग भौर जगम पदो चार सदो, पर मोतिर्म इतकी उतनी हरता दो नहीं | परमेश्वर धनापे पवित्र पदार्ग है। लिगायतगण इस