पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३२२

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लिङ्गानलिच्छविराजवंश रखकर उसके गलेसे लिंग खोल कर हथेली पर रखते । लिचेन (हि.पु.) एक प्रकारको घाम। यह पानी में तथा उस लिग पर येलपत्र देकर मृत व्यक्केि नजदीकी होती है। समाधी यथासाध्य शरदेव नमकसे ढक देते हैं। पीछे लिच्छनिराजश-भारतका एक प्राचीन राज नेपाल उपस्थित श्यकि पुनः उस गश्तेको मिट्टोसे भर देते हैं। से आविष्कृत लिच्छविराज जयदेवको शिलालिपिमें मिट्टी भरमेके बाद एक पत्यका टुकडा कर पर एसलिखा है-- दिया जाता है। शङ्गम उस पत्थर पर खडे हो कर | "श्रीमत् गुरयस्तबो दशरथ पुतैश्च पोले समं । । मतको मगलकामना के लिये मन्त्र पढ़ते हैं। मन्त्र खतम राशोऽधारपरान रिहाय परत: भीमानमलिच्छवि ॥" होने पर अगम उस पत्थर निर्दिष्ट स्थान पर येल्पत्र दे| उद्धत प्रमाणसे जाना जाता है, कि सुप्रमिड सूर्य पर पूजा करते हैं। तमें सभी मृतकके घर लौट आत । घशोय दशरथसे नीचे पाठवीं पीढोमें लिच्छयिने नन्म और जहा उसकी मृत्यु हुए थी वहाके जलते हुए दीपेका प्रण लिया। उहोंसे लिच्छरिवश उत्पन हुआ है। दर्शन पर सवये सर अपने अपने घर चले जाते हैं। यह लिच्छवि शब्द प्राचीन सस्तमें निच्छवि, सोंचले आनेके बाद दीया पुमा दिया जाता है। निच्छिवि तथा पारिमापा रिच्छपि नामसे अपहत इसके अलावा इनके शोक करने और कोई कारण हुआ। मनुसहिताके मतसे- नहीं देखा जाता । अच्छी समस्या होनसे ये मृतके माम लो मन्ध रानन्पात् प्रात्यानि छविरेव च । परे पर लिङ्क और नन्दी समेत पr ममाघिस्तम्म निर्माण नटय करणाश्व खशो द्रवित एव च ॥" (१२२२) करते हैं। तीसरे दिन ये मात्मीय स्वजनको पक भोज | अर्थात् मात्य क्षत्रिय और सवर्णा भार्यासे झलमल, देते हैं। वानिक श्राद्ध के दिन मा इसी प्रकारका एक भोज निच्छिवि, 7ट कण और द्रवित जातिको उत्पत्ति हुई होता है। इसके अतिरिक्त ये प्रेतात्मा उद्देशसे और कोई है। रितु पालिप्रथमें यह उत्पत्ति कुछ और प्रकारसे कर्म नहीं करा सामानिक किसी तरहका गोलमाल होने वताह है। पलिय मनसे काशीरानके पूजायली पर पचायत उसका निबटेरा पिये देती है। नामक एक मदिपो पी। उसने एक मांस पिण्ड प्रसार लिलाच न (स० लो०) लिंगकी पूजा। किया । उस मासपिण्डका कोई प्रयोजन न समझ पर लिनार्थतन्त्र (१० को०) पर तत। इसमें शिम धात्रीने उसे गगानलम फेक दिया । गगाके प्रबल स्रोतमें लिगको उपासनापद्धति लिखी है। बहते यहते यह पिण्ड दो भागों में यट गया। एक भाग में लिङ्गापिका ( स० ग्रो०) भुद मूपित छोटो चूहिया। वारक और दूममें बालिका दिखाई दी। कोई भूपि उन लिङ्गिन (म० पु०) रिङ्गमस्त्यम्येति इनि। १ हस्ती, दोनोंको जलसे निकाल पर लालन पारन करने लगे। हामी। (नि.)२ धर्मध्वनी, बाहरी रूपरग या घे7 दोनों शिशु देखने में एक से लगते थे, जरा भी प्रभेद न पना कर काम निकाल्नेगा।। ३बियाला, निशान था। इस कारण उनका निच्छरिनाम रखा गया याला। लिहिनी (सरसो०) लिन इनि, डीप् । १ लताविशेष इस दाम लोग की जगह ल का उचारण करते हैं, पंचगुरिया । पर्याय-बहुपत्री इश्वरी, सिलिका, जैसे 'नवीन' को जगह 'लयीन' 'नोका' की जगह ' ' स्वयम्भू लिङ्गसम्भूता रेडी चित्रफी, चाएडाली, इसा | इसी प्रकार निच्छविको जगह पालि रिच्छपि हुआ है। लिङ्गमा यो चएडा मापस्तम्मिनी, शियता, शिवपल्लो - मति कालम कोशल गौर मिथिलाम लिच्छयि वैधा सा गुण कटु, उ, दुर्गम रसापन सर्य क्षत्रियगण अत्यन्त प्रबल हो उठे थे। इसी पश जैनों के सिद्धियर पोर रसनियाम माना गया है।(रानfro) | अन्तिम तीयहर महानोर और युद्ध शाक्यसिंह शापित र धर्मध्वजो पा माइभ्यर परनवाली खो। हुए। मिगग अञ्चलमें लिच्छरिगण पक समय सन लिहित (सं०१०) जिन एट और पोका बरतन प्रवळ दो गये थे, मि मिथिला राज्य मी लिच्छयि यह भादि सन्यासाघमाचारोगा सिंह। | लाने लगा था। लिच्छविवश वैदिक कर्म पी थे।