पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३२४

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लिच्छविराजवश ३२६ पुल बातें कह सुनाइ । उत्तर देनेसे पहले भगवान्ने । उनके इस पिदारुण आदेशका क्सिीने भो पाटन न मानन्दसे रहा "तुम नाति हो, कि जि (रिच्छति । किया। यह दाक्षणस्थाया है, समीको भरना ही पडेगा गण) साधारण समामें मादा हो पर पक्ताफ इस प्रकार समझा कर चुदने उह रीट जानेके न्येि माय सभी विषयको मोमासा करते हैं। ये वयोवृद्धके । फिरसे कहा। मितु मक लिच्छवियोंन उनका माध प्रति उपयुन सम्मान दिपलाते हैं। ये प्राचीन प्रधामों छोडा नहीं । सामने पर गहरा नदी मिला। नदीको पार पो नष्ट करनमें विमुख तथा प्राचीन प्रथाको सामानके करनेमें असमर्थ देख लिच्छविगण आर्तनाद करने लगे। साथ प्रहण करते हैं। खियों के प्रति वे कभी मा भत्या । घुद्धदेयने मधुर यापासे उह सान्त्वना कर अपन नीवन चार नहा करते! ये लोग चैत्यका सम्माा और पूजन, वा एकमात्र सम्बल भिक्षापात दे दिया। वह भिक्षापात्र करते हैं। विशेषत अई तोके प्रति विशेष भक्ति ले कर लिच्छविगण वैशाली लौट माप तथा पक वा श्रद्धा दिखाते हैं।' आनन्दन उत्तरमें कहा 'भगवान् । मन्दिर बना कर उसीम वह पचित भिक्षापात रया। यह सब अच्छी तरह जाता ह। चुद्धव फिरसे वोले युद्धदवर्ष परिनिर्वाण के बाद उनका देहायशप ले कर “इस कारण कोई भी उनका विनाश नहीं पर सत्ता" मुलयुद्ध होने पर था। इसी समय कुशीनगर पापाके पीछे पुन्होंने राममनाकी देख कर कहा, 'हे प्रामण ! मलक्षत्रिय राजोंके अधिकारमुक हुआ। उन्होंने घोषणा कर वैशालीनगरी स्थित सारदर चैत्यमें रहते समय मैंने दी, कि भगवान्ने जब हम रोगोंके अधिकार में शरार लिच्छविर्याको जो सात उपदेश दिये थे, जब तक घेउन विसजन किया है तब हम ही रोग देहायशेष पानेके एक सब पद गोमा पारन करेंगे तब तक कोई मा मात्र अधिकारी है। इधर शाला लिच्छपिराजगण लिच्छथियांक ध्वस न कर सकेगा तब तक डारी, मगधपति अजातशत्रु अलकापुरके वालेय क्षत्रियगण तथा उत्तरोनर श्रापृद्धि भी होगा। राजमतीने लीट कर उपदोपके ब्राह्मणगण देहायशेप पानेक लिये मल्लराझोंक मगधपतिको युद्धदेवने जो कुछ कहा था, कद्द सुनाया। ह मनाया।| विरुद्ध खड़े हुए। माखिर द्रोण नामक एक बौद्ध प्रामणके मगरपति कुछ समय चुप दो वैठे। उक्त घटनाके कुछ कहनेसे भगरानका देहायशेष ८ भागों में विमत्त हुआ। दिन याद बुद्धदेवने पेशालोको यात्रा की। उदोंने गहा ] लिच्छविगणको उसका पफ भाग मिला। उन लोगोंने तीरस्य पाठा प्रामने आ कर देना, तिलिस्छवियों को उस अपाविध पदाधाको वडो धूमधामसे वैशाला ठा कर उडन करने के अभिप्रायसे विश्वाशर और सिंधु नामक उसके ऊपर एक वडा स्तूप पडा कर दिया। अधक्या नामक पालि बौद्ध धमें लिखा है, कि जब मगधरानके प्रधान मन्त्री र दुर्ग बना रहे हैं। वुद्रदेव पैशाली में भावर आम्रपालोक उद्यान में कुछ समय ठहरे। ता भगवान् धराधाममें थे तब तक बजातशत्रु लिभ3 वियोंका वार पाशा भी कर सके । मगधराजमाता लिच्छविगण यहा उनके दर्शनार कृतार्ण हुए। उन रोगों के सामने दो युद्धदेव ने कहा था, दिघे तीन मासके विश्वाकर युद्धसे लिच्छपियों का साधारणतन जान वर पाद कुसीनगरमें महानिर्वाण परेंगे। पोछे घुद्ध धैशालीका उन लोगों में फूट पैदा करनेका मीका टूट रहे थे, परि निवाणक ३ वर्ष पाद बहुत चेष्टा करोसे ये एतकार्गहुए। परित्याग कर कुशीनगरकी ओर बढे । लिच्छवि क्षनिय गण अपने माणस भी प्रियतम युद्धको सदाफ रिप किस उनफ फूटनीतिगुणसे लिपियोंक मध्य भात्मान प्रकार विदा कर सकते। उपस्थित हुआ। अजातशत्र ने लिच्छविराज्यमें जा पर ___चे मयक सब फूट फूट कर रोने लगे गौर युद्धदरके | पैशाली नगरको ध्वस पर । ये तो सौ रिच्छ साप हो लिय। पुददेवने उन्हे लोट जाने कहा, किन्तु पियाँको सपरिवार कैद र राजगृह लौटे थे। मनातशत्रु के निर्यातनसे लिच्छवियोंने अमभूमिमा परित्याग कर क्सिान नपाल में, विसोने निम्वनमें, किसा कमी पाली दुगर पीछे विश्व विग्यात पाटलीपुष नगर मेरदाफमे भाधिय लिया। पोछे उन सव स्थानों पर को यी है। एलिन्धविराजयशमी प्रतिष्ठा । lot \\ 63