पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३२५

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लिच्छविराजवश दौद्धग्रन्यके मतसे मगधाति नागागोरके औरससे जयदेव नामक एक राजा आविर्भून हुए। ये हो नेपाल लिच्छवि-अन्याके गर्मले सुसुनाग (पुगणोज शिशुनाग) लिच्छवि-इतिहासमें प्रथम जयदेव नामसे प्रसिद्ध है। राजाका जन्म हुआ। वे मातामहकुलने कुछ पक्षपाती जयदेवके वाद ग्यारह जोंने राजसिंहासनको अलंकृत थे, उन्हींके यत्नसे विरयात वैशाली नगरो पुनर्निर्मित हुई। दिया। पोछे नृप नामक एक पराकान्त राजा अभिपिक थी। उनके लडके कालाशोकके समयमे ही वैशाली हुए थे। वे बौद्धधर्मानुरागी थे। उनके वंशधर मानदेवको नगरमें द्वितीय बौद्ध महासमिति स्थापित हुई। जो हो, ; गिलालिपिमें वे अद्वितीय वौर और सत्यापति कह कर मगव-सम्राटोंके प्रतापसे लिच्छविगण फिर कभी भी कीर्शित हुए हैं। उनके पुत्र शङ्करदेव संग्राममें अजेय, एकतासूत्री सम्मिलित न हो सके। उनमें जो कुछ अति तेजस्वी, यनुगतप्रिय और सिंहके समान वीर्यवान् प्रधान हो जाने थे, मगधपति उन्हें चैवाहिकसूत्रमे थे। शङ्करके पुत्र राजा धर्मदेव परम धार्मिक, अति नम्र आवद कर अपनेमें मिला लेने थे। और तो क्या, इस प्रकृतिक और पूर्वापुत्याचरित धर्मानुरागी थे। राजनीतिको मगधपतिगण पुरपपरम्पराकाने रक्षा करने धर्मदेवके औरससे महिषी राज्यवतीके गर्मसे निक आये हैं। मगवराजके साथ सम्बन्धसूत्रस लिच्छविराज लक्ष शारदीय चन्द्रमाके सहरा सुन्दर राजा मानदेवने गण पाटलीपुतकी सभामें विशेष सम्मानित थे। इसी जन्मत्रण दिया। नेपाल के चंगुनारायण मन्दिर-द्वार कारण मालूम होता है, कि पाटलिपुत्रमें अधिष्टित गुप्त, पर. इन मानदेवका ३८६ संवन्में उत्कीर्ण एक शिला- सम्राट समुद्रगुतने जो लिच्छविराजकन्याके गर्भसे जन्म लिपि है। प्रतनत्त्वविद् क्लिट साहबने इस अङ्कगे गुप्त लिया था इसी कारण वे अपनेको गौरवान्वित समझ संबज्ञापक बिर किया है। किंतु मानदेवको लेख कर हो अपनी मुद्रामे 'लिच्छयय." इत्यादि स्मृति छोड। मलाकी आलोचना करनेसे उसे किसी तग्इ उनना गये है। आधुनिक नहीं मान सकते। उन्होंने अपने प्रथम नेपालम निच्छविराजय। समुद्रगुप्त मादि प्रथम गुप्तसम्राट को जिन सव पहले लिखा जा चुका है, कि सजानान के तंग लिपियोंको थी वा ५यों सटीकी लिपि बताया है, उन करनेसे कुछ लिच्छवियोंने नेपालमे याश्रय लिया था। सब आदिगुप्त लिपियोंके वर्षावन्यासके साथ उक्त मान- नेपालमें भी दे अपना आधिपत्य फैलाने में समर्शदए थे। देवको लिपिका कोई विशप पार्थक्य नहीं है। दान यहाँसे लिच्छवि-गजोकी अनेक गिलालिपि विकृत लिपिको एक समयको कहने में कोई अत्युक्ति न होगी। टुडे हैं। उनमें सुप्रसिद्ध 'शुपतिनाथके दरवाजे पर उत्तर भारतमे गुप्त सम्राटों के पहले जो सब 'संवन्' उत्कीर्ण २य जयदेव या परचक्रकामको शिलालिपिसे नामक लिपि प्रचलित थी, उसे पुराविदों ने 'शक संवत्' जाना जाता है, कि सुप्रसिद्ध रघुवंशमें यहाँके लिच्छवि मापक स्वीकार पिया । इस हिसावसे हमने भी मान- गजोंका जन्म हुआ । लिच्छविकं बंगमें सुपुष्प नामक देवकी उक्त लिपिको ३८६ शकसंवत् ज्ञपक अर्थात् एक राजा पुगपुर (पीछे पाटलिपुत्र ) में रहते थे। वे ही ४६४ ई०की लिपि ग्रहण किया। लिपिके वर्णविन्यास नेपाल आये थे । महापरिनिर्वाणसूत्र में भी लिखा है, कि द्वारा ही मानदेवको ५वी सटोबा आदमी वह भगवान् बुद्धदेव जब पाटलिपुत्रके निकट हो कर जा रहे । सकते है। थे, उम समय मगधगज मन्त्री विश्वाकर लिच्छवियोंको नेपालको पार्वतीय वंशावलीमें लिखा है, कि उत्पीडन करने के लिये यहां एक दुर्ग बनवा रहा था । इस भारतसे विक्रमादित्य नेपाल जीतनेके लिये गये थे। दुर्ग निर्माणके बाद लिच्छविपति सुपुप विताडित हुप समुद्रगुप्तके पिता रम चन्द्रगुप्त भी विक्रमादित्य थे इसमें सन्देह नही। उक्त जयदेवकी शिलालिपिमें लिखा है, कि सुपुष्पक - Flcet's Corpus Inscriptionum Indicaruni, वाद २३ राजाने क्रमशः राज्य किया। पीछे सुप्रसिद्ध | Pol, 1 p. 182