पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३२७

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३३२ लिच्छविराजबन __नक महात्माकं बशमे भगदत्त, दत्त, पुष्पदत्त उक्त लोकरा दो अर्थ रहने पर भी उससे यह भी आदि भनेक राजाओने राज्य किया। पीछे उसी जाना जाता है, कि २य जयदेव यद, कामरूप, काञ्ची और बाम मदीगज भूतियांक प्रपोद, चन्द्रमुखवकि पौल सुराद्रदेशकं गजाओंको जीत कर राजचक्रवती हुए थे। तथा कैलासवामो देव श्रीम्बलय के पुत्र नुरवा आमरूप जयकालमे ही उन्होंने शायद कामरूपपति हर्पश्य नाम महाराजाधिराज उत्पन्न हुए। इन ग्वाक की कन्याका पाणिग्रहण किया होगा । २य जयदेयके वाट औरस म्हादेवी ध्यामादेवीके गर्भले शान्तनुके पुत्र लिच्छविधीय चौर किन गजाने नेपालमा सिंहासन भीष्म सदृश भास्करले समान तेजस्वी भास्करवा अलरत किया था, उसे जाननका कोई उपाय नहीं । गाळ कुमारने जन्म ग्रहण किया ! तोय चशावलीमें कुछ नाम रहने पर भी सायिक चीनपरिव्राजक यूपनचुवंग इन भास्करवर्माको ब्राह्मण लिपिके साथ उनका मेल न खानले वे नहीं लिये गये। बंगीय लिखकर भूल कर गये है। आश्चर्याचा विषय है, अधिक सम्भव है, कि २५ जयदेवके वाद लिच्छवि- कि पाश्चात्य अनेक पुगविहोंने भी बोनपरिव्राजक्का वंशधरोंका प्रभाव द्वास हुया तथा उनके अधीन ठाकुरी- अनुसरण किया है। महामारनमें भगदत्तहो अविय- वंशीय सामन्तगण नेपालके सिंहासन पर बैठे। बोर. बताया है। वर्मा उपाधि भी क्षत्रिय निर्देशक है । इम | लिच्छवि-संत्। हिनावसे बाणभट्टले अनुवत्ती हो कर हम निःसन्देह । नेपालसे महासामन्त अशुवर्मा, लिच्छविपति श्य प्रागज्योतिय-राजवंशको अत्रिय रह सकने है। शवदेव और २य जयदेवकी जो सब शिलालिपियां पाई भास्करबर्मा एक अति पराक्रान्त और धार्मिक राज ! गई है, उनमें यशवर्मा नामादित्त शिलाफलको ३४, थे। सम्राट हर्षवहनकी मृत्युके बाद उनके बंधुपुर ३६, ४५ और ४८ संवत्, २य शिवदेवके शिलाफलको आदिवलेनने मगधर्म महाराजाधिराजकी उपाधि ग्रहण १४३और १४५सयत तयारय जयदेव गिला. की । इसी नुअवसरमें मास्करबर्माके वंशधर भी गौड़, फलकमें १५३ संवत् उत्कीर्ण है। थोड़, कलिङ्ग और दक्षिण कोशलको जीत कर एक राज- पण्डित भगवान लाल इन्द्रजीने, प्रसिद्ध प्रत्नतत्त्व- चक्रवों हो गये थे। इसी समय भगदत्तवंगीय काम- विद् बुद्धर और फिटसाहबने अधों श्रीदर्प संवत् ज्ञापक रुपपतियोने "गौडाइ कलिङ्गकोशलपति" को प्रसिद्धि ! बताया है। किन्तु हम उसे स्वीकार नहीं करते । क्योंकि, लास की होगी । लिच्छविपति २य जयदेवके श्वशुर भग- नेपाल में सम्राट हर्षदेवसरा प्रभाव कब फैला था, उसका दत्त वंशीय हर्षदेव उक्त भास्करवौके पुत्र अधवा पीव कोई प्रमाण नहीं मिलता। नेपालपनियोंका उनके साथ थे। उन्होने गौड़ोड़कलिन जीता हो, असम्भव नहीं। : कभी मी सम्बन्ध न था। इस हिसावसे नेपालपति हप भासामके तेजपुरसे याविन भगदत्तवंशीय वनमाल संवत्का व्यवहार करते होंगे, सम्भव नहीं। उत्तर-भारतमें वर्मदेवके नाम्रशासनमें उक्त श्रीहर्षदेव 'श्रीहरिण" नाम- काधिपत्य विस्तारके साथ तमाम संवत् प्रचलित ने प्रसिद्ध हुए हैं। श्य जयदेवके साण श्रीहर्षदेव दृआ था। इस प्रकार गुप्तसम्राट् द्वारा नेपालविजय ग्नि प्रकार सन्वन्यसव आवद्ध हप? २य जयदेवकी और लिच्छवि-राजोंके साथ सम्बन्च होनेके कारण यहाँ शिलालिपिमें लिखा है- गुप्तसंवत् प्रचारित हुआ है, कोई याश्चय नहीं। किन्तु 'अनामिण परिगतो जितकामत्पः कन्नोजपति हादेवका प्रवर्तित संवत् नेपालमें प्रचलित काञ्चीतृणाव्यनितामित्यात्यमानः। होनेके पक्षने वैसी कोई मुविधा नहीं हुई। कुर्वनन् नुराष्टपरियाजनाचिंता ६०६ ई० मे हर्पसंवत्का आरम्भ हुआ ! इस हिसाबसे यामार्वभौमचरित प्रक्टीरािति ॥" संशुवर्माकी शिलालिपि माननेसे ६०६+ ४८ = ६५४ Journal of the Asiatic Society of Bengal, ई०मे संशुवर्माका अस्तित्व स्वीकार करना पड़ता है। vil,1X, P, 168, । ६३७ ई०में चीनपरिव्राजक यूएनचुबंगने नेपालकी यात्रा