पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३४३

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३४८ ललाई पर्वतमाला राज्यों में कभी इसी दल धि कर उतर आते हैं और नर | ल माईदलका दो दिन तक युद्ध धा। शातम ल माई- रतले पृथ्वीको प्लावित कर देते हैं। मन् १७७७ ई०में | गण रणजयी हो कर धनरत्न, बन्दूक, पामान टूट पर भारतके सर्वप्रथम गवर्नर जेनरल वारेन देष्टि सके तथा बहुसंख्यक कुलियोंको बन्दी करके चले गये। गजत्वकालमें कृकी लोगोंके इस नरहके प्रथम उपद्रवकी इस संवादको पा कर मारत-प्रतिनिधि लाई मेव बात सुनी जाती है। उस समय बनामक ए. सरिने अत्यन्त उत्तेजित हो उठे। उन्होंने ल मार्टकं उपद्रवाने कृपो लोगोंके अत्याचारसे अपनी प्रजाकी रक्षा करनेमें अगरेजी सीमान्तप्रदेशमा नि एटक परनेश अभिनायसे असमर्थ हो कर अंगरेज-प्रतिनिधिसे एक दल मिपाहो युद्धयाताका आयोजन किया । तदनुसार प्रधान सेना के लिये प्रार्थना की थी। सन मे कमा सेनापति लाई नेपियरकं अबीन एक सेनादल सीमान्तमे आ कर एक दल ल साई अव खाधीन जाति गठित हुयी। उसमे दो दल गोगों, दो दल पात्रा वर्ग से आक्रान्त हुए, तब वे 'वराक' नदीको पार कर तथा दो दल थंगटेशीय पदातिक स्न्य, दो दल उत्तरमे जा कर दस गये। इन ल साइयोंने अभी शान्त | सना तथा एक दल पनभेदी पेशायरी सत्य मजित भाव धारण कर लिया है और वे अंगरेजी-प्रजा गिने टुप | सैना दो भागों में विभक्त की गई। जेनरल जाने हैं। वे लोग आज भी 'पुगतन कृषी' नाम से पुकारे चुचियार कछादपथसे एवं जेनरल वाटमलो चट्टग्राम पय- जाते है। से एक एक दलके साथ आगे बढ़े। पछाड-सेनादलने १८५० ई० में वे पुन. त्रिपुरा जिलेमे आये और १८६ / उन्नत वर्ष के नवम्बर महीने में शिलचरसे अग्रसर हो दर बंगाली प्रामवानियोंको मार कर नधा प्रायः सौसे अविर निपाई मुग्न नामक स्थानमे प्रवेश किया। उन्होंने ११० लोगोंको बन्दी कर ले गये। अगरेज गवर्मेण्ट दन उप मोल पर्यन्त वनमागमें असर हो र लु साई जातिको वाका दमन करनेमे लिये समय समय पर सिपाही पुनः पुनः युद्धमे विपर्यास्त कर डाला। चनामकी सेनाने सेनादल भेजनी तो थी, पर ध्यर्थ । क्योंकि पहाड़ी रास्ता भी इसी तरह ८३ मील अग्रसर हो फर ल साई सर्दारको दुरारोह पा और उन्हें पहाडी गुफाओंके अन्दर छिपने वशीभूत फिया ।। ल साई सरगणक अगरेजोंका का अभ्यास था। इस कारण सिपाहीसेना उनका पीछा आनुगत्य स्वीकार करने पर, सेनाविभागके अधिकारियर्ग करके नी कोई विशेष फल प्राप्त न कर सका। ने प्रायः ३००० वर्मनील भूमि त्रिकोणमिति प्रथासे अय. सोमान्त प्रदेशमें लु साई जातिका उपद्रव जव शान्त धारित कर लिया था। इस समयसे चट्टग्राम तथा नहुया तब भारत-गवर्मेण्ट बड़ी उत्मण्ठित हुई । १८६६ | क्छाड़फा संयोगपथ परिशन हो गया। 'चा-कर' का ई० मे उन लोगोंके विरुद्ध एक अगक्रमण करने पर भी कन्या 'मेरी चिनवेष्टर' तथा प्रायः साँसे अधिक अगरेजो कार्यतः कोई फल नहीं हुआ । पार्नत्य प्रदेश शत्रुके प्रजा वन्धनमुक हुई । इस युद्ध में अगरेजी पक्षमें विशेष लिये अगम्य समझ कर एवं अडरेजी-लेना उन लोगोंका क्षति हुई। पति में रहते समय बहुसंख्यक सेनाओंने विसू. पीछा करके भी कुछ कर नहीं पाती है, ऐसा देख कर चिकारोगसे प्राणत्याग किया। इस युद्धके वाढसे ल साई ल साईटल क्रमशः पद्धित हो उठे। १८७२ ई०के जनवरी जातिने शान्ति धारण कर लिया । तभीसे वे लोग महीने में उन्होंने अनेक दलोंमें विभक्त हो कर पछाड, समतल भूमिवासा लोगोंके साथ व्यापार करते आ रहे श्रीहट्ट तथा त्रिपुरा जिलेके एव स्वाधीन मणिपुर राज्यके हैं। इस व्यापार के विस्तारसे तिपाई-मुख हुलाई-हाट कई नामों पर आक्रमण किया। पछाड़में उनके एक तथा झा याचारा नामक स्थानाम तीन प्रसिद्ध बाजार दलने हीलोंग आलेकजान्द्रापुरका चायवागान लूट लिया। स्थापित हो गये हैं। ये तीनों नगर पर्वतगात्रवाही दोनों पक्षके विरोधसे अंगरेज अध्यक्ष 'चा-कर' निहत नदियोंके तट पर अवस्थित हैं। इसी तरह ग्राम ए तथा उनकी कन्या मेरी विनचेष्टर बन्दी हो गई। सीमान्त तथा देमागिरि, कसलंग, रागामाटी आदि नणियारखाल थानाके प्रहरीगणके साथ -एक दृमरे स्थानोंमे वाजार लगाया गया है। लु साई सरंगणके