पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३५५

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३६० लेप्छा द्विधा नहीं करते। यदि कन्या गर्भवती हो जाती है, तय कन्यापण आदाय कर लेत हैं। विधवा विवाहको समय वह पुरष विवाह अरने को बाध्य हो जाता है। पितु मी पद्धनिके अनुसार विवाह-क्रिया सम्पादित हो सकती यदि किसी कारणसे वह कन्या का पाणिग्रहण न करे नो है, किन्तु अधिकतर लामाके घोषणा कर देने पर ही उसे कन्याके पिताको क्षतिपूरण-ग्वरूप मुछ अर्थादगड विवाह हो जाता है । दम्पनी फिमी तरहमा मनमुटाय देना पड़ता है। उस कन्याके साथ दूसरेका विवाह होने | हो जाने पर घटकों को बुला कर उन्हें समझाते हैं। यदि पर दन्या पिताको और कन्यापण पानेकी आमा नहीं दो तीन बार चेष्टा करने पर भी उनका मनमुटाव रहता। दूर नही होता है, तो विवाह कगनेवाला पुरोदिन लामा- साधारण विवाहमें माना पिता 'वर' के पास एक तो बुला कर उनका विवाह बन्धन भिन्न पर दिया जाता घटक मेजता है। विवाह प्रस्ताव पावके पिता अश्या है। उम ममय वह न्त्री स्वामिगृह त्याग करके पित्रालय म्य पानके अनुमोदित होने पर घटक कन्याले रिताक चलो आती है एवं उनके स्वामीको फिर अपनी लोके पासले ५ रुपये १० सर नपकी जगव नथा प उत्त पिताके अतिपूरण स्वरूप कुछ अावण्ड देना पडना है। रीय वस्त्र ले कर पानको दे आता है, उससे हो उनका स्त्री के व्यभिचारिणी होने पर पंच उन दिनार करके विवाह-सम्बन्ध निश्चित हो जाता है । इसके बाद लामा- उपपतिको अर्थदण्ड देते है। यदि चौके विचारले ले निर्दिष्ट शुभदिनमे प्रथम कन्याके घर नया उसके बाद उस स्त्री सतीत्वानि प्रमाणित हो नो उमश पति पान के घर जा कर विवादा अंगविप सम्पादिन होता उसे त्याग कर सकता है। ऐसी लोका त्याग करने है। विवाहके मन्त्र तन्त्र कुछ भी नहीं होते। जो कुछ पतिको अतिपूरण-म्वरूप उसके पिताको कुछ देना नहीं होते भी हैं वे दिलकुल सामान्य। पात्र तथा स्न्याको एडना, बरं वह अपने दिये हुए अलवागदि उस स्त्रीके एक साथ बैठा कर लामा उन दोनोंके गलेमें एक एक | शरीरसे उतार कर उसे घर के बाहर कर देता है। इस रेशमी उत्तरीय वांध देते हैं। उसके बाद उनके मस्तकों तरहको व्यभिचारिणो स्त्री भी वालिया कन्या विवाह- पर चावल छींट देते हैं। इसके बाद पान और कन्या पद्धति अनुसार विवाहित हो सकती है। एक ही वर्तनमें भोजन तथा मद्यपान करते हैं। विवाह | विवाह सम्बन्धक अनुसार इन लोगों में उत्तराधिकार- के वाट जाति कुटुम्ब यदि भोजन कर सानल-चित्तसे के कोई विशेष नियम नहीं हैं। पच लोग जातोय प्रधा- अपने अपने घरको जाने है । कन्या सिर्फ तीन दिन के अनुसार मृत व्यक्तिके पुत्र या न्याओंको पैतृक ससुराल मे रह कर मान दिनके लिये पितागृह चलो 'सम्पत्तिका जिस तरह विभाग करके देते हैं, उन्हें उसे । आती है। ही पा र सन्तोष करते हैं। कोई भी उसके लिये राजाके जो व्यक्ति कन्धोपण नहीं है सकते हैं, वे भी विवाह | यहां नहीं जाते। यदि किसीको एकसे ज्यादा पुत हो कर सकते है, किन्तु जब तक. कन्याण्णका ऋण नहीं तो ये सब बरावर दरावर भाग पाते है। यदि कहीं चुक जाता है तब तक उन्हें ससुराल में रह कर श्वशुरफ | विधवा माता यथवा अविवाहिता दो एक बहन हों, तो यादिएकर्म करना पड़ता है। इस समय वे आपनो विवा | उनके पालन पोषणका भार बडे लडको ही लेना हिता स्त्रीको अपने घर नहीं ले जा सकते। पड़ता है, इस तरहसे बड़े लडकेको कुछ विशेष माग बहुविवाह तथा बहु-स्वामित्रवृत्ति भी इन लोगोंमें | | मिलता है तथा जो पुत्र राजाके यहां नौकरी करते हैं, देखी जाती है। विधवा रमणीगण स्वेच्छामत पुनर्विवाह उन्हें और दूसरोंकी अपेक्षा कुछ विशेष यश दिया जाता कर सकती है, किन्तु जब वह रमणो अपने देवरको छोड़ | है। निष्ट माई ज्येष्ठ भाइयोंकी सम्पत्तिका राधिकारी कर किसी दूसरे व्यक्ति के साथ विवाह कर लेती है, तव | नहीं हो सकता, नव यदि पंच लोग अनुप्रह करके कुछ उसके देवर अपनी मौजाईकी सन्तानका पालन-पोषण | अंश दिला दे तो पा सकता है । इन लोगों की मृत्युके करते हैं एवं भौजाई के द्वितीय पतिसे पूर्व दिये हुए' समय दानपत लिख देनेला नियम नहीं है। नब मृत्यु.