पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३६४

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मोकनाथ ब्रह्मचारी -मोकनाथरस ३६६ हुआ था। इनके दीसा और शिक्षा-गुरुका नाम भगवान् । में योगसाधनार्य चले गये। वहां बहुत दिनों तक योग चढ़ गागूला था। मगरानचट पड दशनके यद्वितीय साधन कर ये सिद्ध हो गये। दोनों महापुरत पर्वत पण्डित थे। शृङ्गस चन्द्रनाथ और येणोमाघर च दनापसे फामारया ___ यज्ञोपवीत होने के कई वपा क नगद लोमनाथने गुरु- को ओर चले गये। लोकनाथ पारदी गावमें उतरे । के साथ यपनी जमभूमिश त्याग किया। येणीमाधव ढावा जिले के नारायणगञ्जके अन्तगत मेघना नदीके बन्योपाध्याय नामक एक और उनके साथी हो गये थे। किनारे वारदी गाव है। चारदो भा पर ये रहे थे, इस भगवान् दोनों नियों को साथ ले पर कालीघाट पहुचे। कारण लोक उई वारदीर ब्रह्मचारोजी" कहते हैं। उस समय कालाबाट जल था। थोक माधु-सन्यासी पहले ही कहा गया है, कि लोकाय ब्रह्म पारो जाति उम वन में योगसाधन करत थे। कालीघाटमें रह कर स्मर थे और इसके यतिरिक्त घे अपो गरीरसे जीवात्मा- भगवान्चद्र अपने दोनों शिष्यों द्वारा कठिन ब्रह्मचर्य को बाहर निकाल सकत थे। प्राणियों के मनके भाव चे व्रतका अनुष्ठान कराने लगे। समझ जाते थे। अता क्षयरोगसे इनकी मृत्यु हुई। कहते हैं, कि रोक्नाथ हायकी आस्था यानो | लोकनाथमट्ट-कृयाम्युदय नामक प्रेक्षणकके प्रणेता। क्सिो सहचरीको स्मरण करके ब्रह्मचयका फल नष्ट रोप्न थरम (स.पु०)२प्लीहा रोगाधिकार, गापत्र करता था। यह मान पर भगवान् चद्र दोनों शिष्योंको विशेष । लोकनाथरस और हल्लोक्नाथरस मेदसे सायल कर घर लौट आये और जहा लोकनाथ सह। यह दो प्रकारका है। प्रस्तुत प्रणाली-वारा गधक चरी रहती थी, यहा रहने लगे। भगवान ने पता लगा अयरक, प्रत्येक एक भाग, लोहा दो माग, ताबा दो भाग, लिया और कोहीको मस्म छ: भाग इन सब द्वयों को पकल कर पान उसने अपना चरित कलडित कर दिया है। भगवानचट पे रसमें पीस कर गजपुट पार करे। ठढा होने पर ने उस पाल विधवासे गोकनायका मनोरथ पूर्ण करने । दो रत्ती भर सेवन करके पीपलचूर्ण और मधु या गुह पहा। उसने भगान्पद्रका कहना मान लिया। जव और हरोतको अथवा गोमूत्र और गुदके साथ जीरा रोषनाथको त्रास तृप्ति हो गई, तब उन दोनों शिष्यको सेवन करे । इस ओपना सयन करनेसे यटन प्लाहा, उदरा, गुलर गौर शोथ नाश होता है। ले पर मगमान्चन्द्र बहास चले गये। गृहलोकनायरम-पारा एक भाग और गध दो गुस्ने मने प्रकारके बत करके अनेक शिष्योंश मन सयम कराया था। बहुत दिनों तक इस प्रकार व्रत करने मा मिला कर काजल बना। एक भाग अवर उप्तके स दोनों ब्रह्मचारी जातिस्मर हा गये थे। उहोंने कहा साथ मिला कर घृतकुमारीके रसमें पोछे दूना तावा और था, कि मैं पूजा ममें यमानि के येडु नामक गाय लोहा मिला कर पामाचीक रममें बार बार मदन पर गोल बनाये। इसके बाद गग्ध २ माग भौर कोडीको में "सीतानाय वन्द्योपाध्याय" नामका मनुष्य था। पता भस्म २ भाग ज वोरी नीयूके रसमें घोट पर दो मूगक रगाने पर उनको पात सत्य मालूम हुईवी) मध्य यह औषध गोठक रख दे। अनन्तर उक्त दोनों मूगे मगयान्वद लोकनाथ और वेणीमाधयो साराम को ढकनसे ढक पर साधर्मे जल मिट्टी, उयण और र पर अनेक स्थानों घूमते हुए अतर्म काशी याये।। जरमा रेप चढाये इसके बाद गजपुर पाक करे। उदा पागोन मणिकर्णिका घाट पर भगवान्च इन योगसाधन होने पर छ रत्तीको गोली यानी होगी। इसका अनु द्वारा शरीर त्याग दिया। शरार त्याग करनेसे पहल भगवान्च ने अपने दोनों शिष्यांको तेलहस्सामोफे हाथ ) पान पापलचूर्ण, मधु हरीतकीच ण, गुड, अनवायन ग गोमूत्र है। इसका सेवन करनेसे यरत् , प्रोदा, उदगी, सीप दिया था। शेषनाथ और येणीमाधर स्थामोजीक निार र भगन्दर धग्निमान्य और फास आदि प्रशमित होते हैं। गोध वात, अष्ठोला, पामठी, प्रत्यष्टीला, सप्रमाम हाल, दिनों तक योग सीप र दिमाल्यके किसी निभृत स्थाj (मे द्रसारमा प्लीहयाधि०) Vol 1 93