पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३७८

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लोम-लोपडी पशुओंके घाल, रोम अथवा केगक ही नामसे पुकारे | लोमक (० लि. ) लेोमयुर, जिसे रामा हो। जाते है। लोमारणी ( स० स्त्रो०) १ जटामासो। २मासदा, द्विपद तथा घेचर, पक्षियों आदिके मण्डेसे तत्काल मासी नाम घास। हो क्लेि हुए घोंय रीरमें छोटे छोटे रोए देखे जाते | लोमकर्करा (स. सी.) अजमादा। हैं। पोछे उन बचाके परों के बढ जाने पर ये रोए । रोमण ( स०पू०) लोमयुक्ती कणों यस्य । १ शशक उनत ढगाते है इसलिये दृष्टिगोचर नहीं होते। किन्तु परगोश ! (लि.)२ लोमयुक्त कणचिनिए, जिसके इस नातिक पक्षियों में वादुटोंके शरारमें पर पैदा हो कर कान पर वाला हो। पाछे रोमक रूपमें परिणत हो जाते हैं। | लोमागृह (सको०) पर स्थानका नाम । ____उभचर मयात् स्थलयर और जलचर जीरजातिम (पा ६।३।६३) विर, जल्चूहे, उदविलाय आदि चौपाये जतुके शरीरमें लोमक्न् ि ( स० पु० ) पक्षो, विडिया । गेम देगे जाते हैं। उनके लोम बहुत चिकने होते है। लोमीट (सपु०) जूं। पद्मातीरवासी माझी उददिलावको पोसत हैं । चे नदी लोमकूप (म0पु0) त्यरध्र, भरारममा वध छिद्र जो में घुस पर मछली पकड राते हैं। रोए को जडमें होता है। ____ मनु पके केश, सिहक केशर और घोड की गरदनक | लोमगर्त ( स० पु.) लोमकूप, शरीरमका पद छिद्र जो वाल मोटे होत ., इसलिये थे सूदमरायके उपयोगी नहीं] रोए की जन्में होता है। हैं। उनसे रस्ता, चेन, चटाइ आदि प्रस्तुत की जा लोगन ( स० को० ) लेोमानि ह तोति इन टक। १५द्र साती हैं। रितु तिवा, कागुल, कधार, समरकन्द तक गज नामक राग। (नि०)२ लामघातक लाम मिरमान, योसारा आदि शीतप्रधान देशोंके पकरेके लोम नाशक । बहुत यारीक होते हैं। उनसे शाल, रामपुरा चादर, लोमडी (दि स्त्री० )कुत्ते या गोदढको जातिका एक पर, नामदा, लुइ, मलीदा, कम्बल आदि जाडे के कपड़े| जन्तु ! यह ऊ चाइम कुत्तेसे छोरा होता है पर विस्तारमें तय्यार हात है । इसा कारण बहाके पणिक करे आदि । लवा। भारतरपालोमडीका रग गोदष्ट सा होता है। को पोसते और प्रतिवर्ष पराम घाट लेते हैं। चाहयान, पर यह उससे बहुत छोटी होती है। इसकी नाय तुफान और रिमानके सफेद पशम सबसे अच्छे होते । नुकाली, पूछ मदरी और सारी बहुन तेज होती है और है। इनसे पषमाल कश्मीरी शाल तैयार होता है। कर | यह बहुत तज मागनेयाला होती है। अच्छे अच्छे कुत्त लोमस मी एक प्रकारका चोगा या स्वादा तैयार | इसका पीछा नहीं कर सम्त । चालाको लिए यह होते देखा जाता है। बहुत प्राचीन काल स काश्मोर, पहुत प्रसिद्ध है। ऋतुपे अनुसार इसका रोग मद्धता पजाद, सिधु आगरा मिजापुर, जम्बरपुर परङ्गल, और रग पदरता है। यह पोडे मकाडो मार छोटे छोट ममीपत्तन यार मलवार यादि स्थानोंम रोममिभित | पक्षियोंको पक्ड पर खातो है। दूसरे देशों में इसको पार चुनने कारया और वाणि या गतिष्ठिन | अने जातिया मिलता है। अमेरिकामें लाल रगशे था। अभी बात सी जगहों उस प्राधीन पशमी | एफ लोमही होती है और शीतकटियध प्रदेशोंम पाने निको याति हो गई है। पाराणसासतों आज | रंगको लोगडी होती है जिसके रोप जाडे में सफेद ग मा मधमलबा गरीचा और मुर्शिदाबादम सामी गलोचा के हो जाने हैं। कहाँ कहो विरपुर पाली हामहो भी तैयार होता है। होती है। उन सबफे पार या रोप यात मामल होने विस्तृत विवरण पराम और शान में देयो। है। उनका शिकार उनकी मालप लिये किया जाता लागूर पूछ। है जिसे समर या पास्तीत पद हैं। शोतरी लाम (दि. पु.) सोमही। पर प्रदेशशी मरिया विल बना कर मुण्ड में रहती हैं।