पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३९६

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लोग उपे Tatanilerous iron ही है। इन। मालूम पड़ता है, मि आय हिंदू लोग जिस समय ममा यौगिक पटायों में लोहे माना सर्वत्र समान | स सारी समी जानिया लोहे प्रयोगसे अनमिन य, नहीं है। उस समयमे ही इसका व्यवहार करते आ रहे हैं, पर उस भूगभके मध्य अति प्राचान युगीय तहमें लौह धातु | समयम हा उन रोगोंने इस धातुमे प्राय देवदेशमा पासस्थान देय पर अनुमान दिया जाता है, कि मति | प्रतिमा निमाण कर तिल्पनेपुण्यका परामाया दिवाइ प्राचीन काल में भी इस धातुका प्रचार था रितु विस थी। उस प्राचीन शिल्पकोत्तिकी रेखामान हम लोगों हरि समय तथा क्सि महान् पण्डितन इसका भाविकार | गोचर होने पर भा हम लोग बाज भोपाकास्त पिया पयसो इसको व्यवहारोपयागिठा निर्देश दिया म्भादि देख कर गौरवान्वित होते हैं। भाज मा दिल्लीका रसायन इतिहासोंमें पाया नहीं आता। आर्य सुप्रसिद्ध हस्तम्भ (सूरास्तम्भ) हमारे प्रधान शि-प हिन्दुओंके सय प्राचीन महिना प्रत्यय पढनेसे जाना नैपुण्यका परिचय दे रहा है। १५०० ६०के उम भयकर जाता है कि आय ऋषिगण वैदिक् युगमें भी लोहेको | नत्प्रवाहस भी यह स्तम्भ नष्ट नहीं हुआ। दिशा दया। निम्मल परणविधि ( भृक् १२१७) उनको पठिनता किसी विमोका विश्वास है कि लोहे के हुने (मृ १६६) पप तोश्णधारत्त ( ६।३.५)स जान भी कमा माशशसे पृथ्या पर पतिन होते हैं पयारि, कार थे। शुक्लयजुर्वेदका 'मे यश्च मे श्यामश्च मे लोहच में प्रस्तावस्था लौह निम तरह यौगिररूपमें पा जाता सीमशमेनपत्रमेयन करपताम् ॥' (८1१३)मनोश उल्का भी प्राय उसीतरह मिश्रित रहता। इसमे पाठ करनेस स्पट जान पहता है, कि उस समयके मार्ग स्थत ही अनुमान होता है कि २० पधारत जान लेग समा तरह लोहेसे परिचित थे । अविदफ ( Meteorc orgin पदा सिपाय और कुछ दसरा ५।२८१ तथा १११.४१ म त्रों में लोहेषा ठल्ले सरिया नहीं है। विशेषरूरसे गालोना परके देयनेसे माम गया है। होता है, कि उसमें वह मनुजन (acids) क्षार (50d 1) वैदिर सहितायुगमे वाद दाह्मण तथा सूवयुगौ मा रूपर्म पयाप्त परिमाणस गधा तथा गाक्सिजन मिर रोहेका पूर्व प्रारन था। शतपथ ब्राह्मण ६१३५ हुए हैं। इसके बगये उममें मयान्य धातु तथा विगि पात्यायन धोतराव ७४३४ २०७१। २०७४, आश्व | मिट्टियोका समावेश रहनेके कारण उनका रोह-संस्थान रायग-गृपमूत्र र प्रभृति पाठ करनेसे पता चलता) निपाय पण अत्यन्त कठिन हो जाता है। उल्का देना। है, कि तपारस रादिका व्यवहार उस समय भी था। चिर प्रसिद्ध यह लौहपातु भारतवर्ष मिन जिा मनुस हिताफे ५११४११६ श्लोषको पढनेसे पट ही स्थानोंमें यौगिकरूपसे अवस्थित है, सर्वसाधारणको हात होता है, कि उस समय यसपासादि भो हके जानकागेके रिये उना समिप्त परिचय नाचे दिया पने होत ५। भस्म तथा मालसे उन राहेक पानों की आता है। मार्शना परफे जल में धो देनस दो ये शुद्ध समझे जाने | मान्द्राज विभाग। थे। उक्त प्र ०१६ लोमें हिलातका अपहरण | म्यानों के नाम मोरगद गनr1 पसा अत्यत निषेध दिया गया, ममे जान पडता विवाहोर प्राकमानटाइट तथा लाटेराइट स्पेनकोरा ६. प्राचीन रोग म धातुको बहुत मूल्यवान समझते तिनलो माग्नेटिर मायरन सैगड बारम् थे। इस बाद याउपत्यय स दिवा (A७) सौर गदुरा गटेराइट इम समय दुपाप्य पिएड, महामारतये पनप में लौभाजन, रामायण पुदुकोइ माग्नसार (१६६०१२)लदमय भाभरण, Bधुनमें (१९२०)| निगा फेरनिनाम नरियर पुम्भ पर प्रामद्भागवत (१९२२) लोहो (सूपणादि पोयम्यातोर पर हैण्ड मरधामयो) मतिमा निर्माण पयस्या देपनेसे पेमा! मागिरि हिमाटार तया माग्नेगर Vol . 101