पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४०३

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लौह-लोहनिरुत्यीकरणमिनपञ्चक फेरिड सायानाइड आव पोटासियमके सयोगसे मिली। नामक पुरत का नया चिन धानग विमान प्रकारका परिवर्तन नही होता। इसी तरह फेरस ( uttallurgy, Irol and cri) धर्म "युनुन" एवं योगिक-समूह अलग किये जाने हैं। सल्फा साया | नाम स्वामी विशेष प्रामारि गये नाइडके साथ गाढा रक्तवर्ण निकल पाता है। फेरसम | फि माग्नासको रिपात तलवारर, कनक भारतीय वह नहीं दिखाई देता। युन्ज इस्पातसे ही बनाये जान थे। विाणिज्य ___उटीमा सिभूग पिकानगंन जोदपुरता इस धातुके आविष्कार और व्यवहारोपयोगिताके सिर ताता-पायान टोलमा कामना हिने मी साथ साथ इसका वाणिज्य जनसमाजमे विस्तृत हु- छिपा नहीं ।। उसमें ८० हजार मनु'य करने । था। भारतवासी लोहपात्र का व्यवहार बहुत दिनों । ऐमा यड़ा लोका साना नया नाम नहीं है। जानते थे। उस समय भारतीय लौहपावादि देशान्तरमै । इस प्रतिष्टाना यदी-निगमी मा दोरारजी जारी भेजे और येचे जाते थे वा नही उसका कोई प्रमाण नहीं ताता है। मिलता। परन्तु वहुत प्राचीन काल से वैदेशिक के साय वर्तमान समय में भारतीय लोदशीकाक्षा रोगीय भारतवासीका जो वाणिज्य संस्रव था इससे अनुमान लोहका दहा अधिक दर है। इमामो नि होता है, कि प्राचीन सभ्यनाके आदर्शद भारतवर्षसे । काम जाने वाले हन्ये, मेसी तरे, गमगे, मो, लाहानसित पात्रादि अथवा इम्पात आदिको यूरोपखण्ड । नसले, नीम, दरगे, पाल ने आदि बनाये जाने है। रेल- मे भी रफ्तना होती थी। लादन, पुल मादि बहुतने यसमसादसिक काय मी लो- महिसुर, सलेम आदि दाक्षिणात्य प्रदेशमि बहुत ! ई. द्वारा किये जान। लार रातसे जिन बनाई प्राचीन कालसे इस्पात प्रस्तुत होता था। वहाके लोग जाता है। खनिज magnetitc लोहको गला कर चोट सहनेवाला छानविशंप, एक प्रकारका बरा। (Malleable) एक प्रकारका नरम लोहा ढालते थे। (भारत १३८८।१३) आज भी यह प्रथा जारी है। लोहचूर्ण-विपित्ता-सारोक्त वृणीपघमेट । परिप्लसके वर्णनसे मालूम होता है, कि उस समय लौहान्तक (सं० लो०) कानला। भारतीय इतिहासको वहुत राति थी। प्राचीन अरवी | लाहकार (सं० सी०) लोहार । कविताओं में सुप्रसिद्ध भारतीय इस्पातकी वनो तलवारों-लीहषि (सलो० ) मण्डर, लोदेशी मेल । का उत्लेख है। प्राचीन स्पेनवासीके निकट यह अल-लौहचारक (सपु०) लोहेन लोह निगड़े न चारः प्रचारो हिन्दे नामले परिचित था। पारसिक वणिकगण उसे यत । नरकभेद । लौहदारक देयो। 'हुन्द्वानी' कहते थे। मार्कोपोलके विवरणमें वह 'ओन्दानी लौइज ( स० को०) लोहात् जायते इति जन-ड। ( Ondanique ) नामसे लिखा गया है। १६वी सदीमें । १ मण्दूर, लाहेकी मेल । २ वलिद, एक प्रकारका पुर्तगीज-बणिक कनाड़ा उपकुलस्थित भाटल आदि | लोहा। स्थानोंसे लोहा ला कर यूरोप भेजते थे। १५६१ ईमे लौहदाह (सं० पु० ) अश्व-विकित्साभेट । गाजने गोआ गवर्नरको लिख भेजा था, कि वे लौहनिरुत्थीकरण ( स० को नको तीन प्रचुर लौह और इस्पात चेउल वन्दरसे अफ्रिकाके उप भस्म करना। कलमें तथा लोहितसागर तीरवत्तों तर्फ जातिके मध्य लोहनिरुत्थीकरणमित्रचक (स' को पता वेचनेके लिये भेजें। कुच, सोहागा सौर गुग्गुल । ये पांच पदार्थके मिले (Archhro Port Orient, fasc. 3, 318) रहनेके कारण इसका मित्रपञ्चक नाम पड़ा है। मित्र- • Tilkinson-कृत Engines of war (१८४१ ई०) पञ्चकके साथ विपक्ष और मृत लोह सयत नही होने पर