पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४०५

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४१० लौहविशुद्धिद-लौहित्य मात्रा ४ माशेसे धीरे धीरे बढानी होगी। अनुपान दूध लीदान्मा ( सं० पी०) लोद धान्मा यापाः। गहभ. और जंगली वकरेके मासका जूस है। उसने मेटोरोग | माह। मादि अनेक प्रकारके रोग शान्त होते है । काली, कन्द-लीलामृतलाद (२० पु. बावधनोप, पर प्रकारको दया। मृल, कांजी, करीर और बरेला यह सब खाना मना है। लौहान (म० पु० ) या गोनापत्य । (भैपन्यरत्ना० मेदोऽधिकार) लौटायम (सं० वि०) धानुनिर्मित, लोरे या तायेका यना लोहविशुद्विद (स० पु० ) टणक्षार, सोहागो। एमा। लौहशकु ( स० पु०) लौहस्य शंकु यत्र । १ नरक- लोहामव (मं० पु०) आरोगनाशक भोप रविशेष । विशेष। यहां प पियोंको न्यूईसे विद्ध, किया जाता है। प्रातुन प्रणालो-टोनूगं. दिन्टु, विकला, यमानी, २ लौहनिर्मित फीलकमात्र, लोहकी फील । विका माथा, चिताम्र प्रत्येकमा चर्ग ४ पट, मधु ८ लोहशास्त्र ( स० क्ली० ) स्वर्णादि अष्टधातुका व्यवहार और नेर, गुदा सेर और जव:२८ मेर, दन्दै एक साथ उपयोगिता निर्देशक प्रन्यमेट । मिला कर घृतकुम्मी पक माम मरे नगी औषध लोहशोधन (सं० क्ली०) लोहस्य भावनं । लौद नामक | शन्नन्मक्त हो कर मामयम्पो परिणत होतो।। धातुको विशुद्धावस्थामें लानेकी रासायनिक प्रक्रिण इसका संवन परनेसे अग्निद्धि तथा जीर्णचर और विशेष । लोहेको साच तपा कर सात बार कालीमूल- बीदा शादि अनेक रोगोंकी जान होती है। के रसमें डुबो देने अथवा अठगुने जहमें विपक करने (गन्नाननी अधिगर । तथा चतुर्थ मागावशिष्ट २ सर त्रिफलाके काढ़े मे सप्त- लीहि (सं० पु. ) हरिवंश, अनुमान अष्टक एक पुत्रा पत्नविभक्त १० सेर लोहेको आच, लाल का सात | नामा वार निक्षेप करनेसे लौह विशुद्ध होता है। लोहित ( स० पु०) लोधिनः इति लोदिनमान्दान् म्याधे कान्ति आदि लोहेका पत्चर बना पर स्वर्णमाक्षिक, पण ( अण) प्रत्ययेन निपन्न। शिवका विचाट। त्रिफलाचूर्ण और शालिञ्च सागका रस उसमें लगा दे। (त्रिकालोदिनसम्बन्धीय। पीछे पागमे जला कर लाल कर ले। इसके बाद उसे लोहिनध्वज ( स० पु०) लोदिनध्वज के मतानुत्ती मम्प्र- जलमें डुबा कर हस्तिकर्ण, पलाश, विपाला, वृद्धदारक, दायभेद । (पा ५३१११२) मानकच्च, मोल, हड़जोडा. सोंठ. दशमूली नामक द्रथ्य, लोहिना { दि. पु०) वैशाको एक जाति जो लोहेका प्रत्येकके काढे वा रसमें अच्छी तरह पुट देनेसे लोहा विशुद्ध व्यापार करती है। होता है। गजपीपल, श्येतबहेडा, गुरुच, अपामार्ग और लोहितायन (मं० पु. ) एक गोत्रका नाम । पुनर्नवा इन्हें पुराने मण्डूरके ऊपर और नीचे रख गोमूत्र | लोहिताश्च (सं० पु०) लोहिताश्च के बगधर । द्वारा तीन दिन पाक करके ढक दे। इस प्रकार तीन लोहिनीक (सं० वि०) लोदिन इव, लोहित ( टिता. दिन रस देनेसे जब वह भीतरके वापसे सूप जाय, नव दीकक । पा ५३१११०) दति ईका। १ लोहितवर्णतुल्य, उसे बाहर के धो डाले और फिर मुग्वा ले। । लाल रंगके जैना । (पु० ) २ म्फटिक। लौहसार ( स० पु०) एक प्रकारका लवण जो लोहेसे लौहिन्य (सं० पु० ) लोहितस्य भावः, लोहित-प्यञ् । ? बनाया जाता है। यह रासायनिक परिक्रिया द्वारा बनता लोहिन। लोहित इच. म्याथै ग्यज । २सागर भेद । और बोपोंमे काम आता है। शायद यह हो अरब और अफ्रिकाके मध्यवत्तों लोहितोप- लोहा (सं० स्त्री० ) लौह, कडाही नाहा देग्यो। सागर ( Red ca) है। इसका जल घोर लाल लोहाचार्य (सं० पु०) धातुविज्ञान शिक्षादाता, धातुओं तथा जलका आभ्यन्तरिक ताप भो उतना कम नहीं है। के तत्त्वको जाननेवाला आचार्य । २ लौहशिल्पज, लोहे- आचार्य। २ लौहशिल्पज, लोहे- | खेज नहर काटी जानके बाद लोहित सागर मार . को कारीगरी जाननेवाला। भूमध्य सागरका मयोग हुआ है। रोज देखो।