पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४१३

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वंश का निणंग किया जाता है, दासको नाउ देख कर उस सेनके चावल की दर रुपयेमे १० सर थी। दुर्भिक्षके मारे प्रकार समयका पता नहीं लगाया जा साता। उसका वहा के लोग यास काही चावल गा कर रहने थे, किन्तु पुष्पोद्गम वा वीजाधान देख कर लोग उसको अवस्थाका चारल मुकार नही था। Dr Bdie का कहना है, निर्णय करते हैं। मध्यमारतकी पहाड़ी प्रदेशवामी कि उसने अजोण और उदारामय गेग उत्पन्न होता है। जातियां पहाडी वासना वीजाधान देख कर अपनी उमर यांसके भीतर सो कभी जल रहता है। यह अल तककी गणना करती हैं । जो व्यक्ति गसका दो "कार" । यहुत ठंडा रोना है। वायुरोगग्रस्त व्यक्तिको बद जल अर्थात् दो वार बोजाधान देखता है, उसकी उम्र ६० | पिलानेले बहुत लाभ पहुंचता है। बासकी उपकारिताके वर्षसे कम नहीं होती। सम्बन्ध मे पानाका जो यचन प्रचलित है उसका भावार्थ ___ साधारणतः २५ से ३५ वर्षके भीतर वासमै फन्ट ! इस प्रकार है, पूर्वदिशाम अमुदकदार परिशोमिन इंस. निकलने हैं। अनेक समय ४४ वर्पके बाद फूल निकलते | विराजिन पुरिणो नया पश्चिममें वंशवन-समान्छादित देखे गये हैं। कभी कभी वांसके वोजसे चावल पाण गृहवाटिमा गृारयोंके लिये विशेष मङ्गलाद है। जाता है। वह चावल बहुतेरे लोग खाते हैं। वरनाशा वांससे जितने प्रकारकी चीजें बनती है, उसका उन्लेन विश्वास है, कि अकालके समय दाँसमे अधिकताले पहले किया जा चुना है। इसके मित्रा वांससे उत्कृष्ट चावल उत्पन होता है, किन्तु यह सत्य प्रतीत नहीं होता। वाद्ययन्त्र बनते हैं। श्रीकृष्णको मोदन यानुरी तथा प्रसिद्ध १८३६ ईके Trans, Agri Horti Soc of India, गायक तानसेनका सहनाई नामक वाद्ययन्त्र घेणु नामक Val III p. 189-43 प्रन्थमे लिपाद, कि उस समय कई | वांसका ही बना हुआ था। आज कल भी तलदा यांस. जगह वाँसोंमें चावल तो देखा गया था, पर दुर्भिक्ष से विभिन्न प्रकार की वांसुरी बनाई जाती है। उसके कहीं भी न था। खेतोंमें भी काफी फसल लगी थी। तार कच्चे बासो रेशे होते है मलयवामी मारलोट उस समय खेतका चावल रुपये में १६ सेर और बांसका नामक वाद्ययन्त्र आवश्यकतानुसार छोटे वा पडे एक चावल २० सेर मिलता था। प्रत्येक बाँसमें ४से २० / एक गांठदार यांसके चांगेसे बनाये जाने हैं। वह जल सेर तक चावल पाया जाता है। जो बाँस जितने हो । तरंगकी तरह वजाया जाता है। उसमें सुरका भी तार- विच्छिन्न भावमे और जितनी उर्वर भूमिमें रहता . उस | तम्य साफ साफ मालूम होता है। गोपीयन्त, सितार में उतना हो अधिक चावल मिलता है। चावल निकलने और एक तारा आदि यन्त्रोंका पृष्टदएड भी वामका के बाद बाँस भाप ही आप सूखने लगता है । विन्तु उस वनाया जाता है। को जडसे पुनः कोपल निकलता है। कभी कभी वोजसे ___उपरोक्त नित्यव्यवहार्य वस्तुओं के अलावा वंशदण्ड- भी वृक्ष उत्पन्न होता है। से मनुष्यजगत्में एक और सदुपकार होता है। वह मनुष्य ___ पहले ही लिखा जा चुका है, फि मनुष्य वाँसका समाजकी नानोन्नतिको सौकळसाधक लिपिविद्याके एक ! कोपल तरकारी बना कर अथवा उसका अचार बना कर अङ्ग के सिवा और कुछ भी नहीं है। मानवजातिका खाते है। गाय आदि जन्तु बड़े चावसे वासकी पत्तो मनोभाव वा प्रन्यादि लिखने के लिये रागनका याविष्कार खाते हैं । गायवे एसो रोगमें सकी पत्ती वहुत उपकारी हुया है । इस यशदएडसे एक दूसरे प्रकारका तैयार होता है। १८९२ ई० के उडीसा-दुर्भिक्ष लाखों आदमीने वास- है। यह कागज अपेक्षाकृत दृढ होने के कारण लिपिकार्य- का चावल खा कर अपने प्राण वचाये थे । १८६५ ई०को । में उतना व्यवहत नहीं होता। न्यादिको रखने में उसका महामारीमें धारवाड और वेलगाम जिलावासी प्रायः अधिक प्रचलन देखा जाता है। ५० हजार आदमियोंने कनाड़ामें आ कर वासके तण्डुल Indiau forester नामक पत्रिकाके M भागमें चीन- से जीवन धारण किये थे। १८६० ई०को मालदह जिलेमें देशीय वांमका कागन बनाने की प्रथा दी गई है । वह इतना रुपये में १३ सेर वासना चावल मिलता था। उस समय सहज है, कि सभी लोग आसानोसे उस प्रकारका अब.