पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४२३

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४२ वंशास्थि-वभोवदन वनास्थि (सं० क्लो०) मर्कटकी अस्थि । मानद ऋषिके मतानुसार नलीका छेद फनिष्टा वंशाह (सं० पु०) वेणुया, बाँसका चावल । उंगली मूल के बराबर होना चाहिये। जो छोर मुइ- वशिक (सं० क्लो०) यशोऽस्त्यस्येति टन् । १ अगुरुकाष्ठ, मे रस घर प्रकते है उसका नाम 'फुकारिन्द्र' और अगरकी लकड़ी। २ कृष्णवर्ण इक्षभेद, काला गन्ना । सुर निकलनेवाले सात छेदोका नाम 'ताररन्ध्र' है। (वि०) ३ वंशसम्बन्धोय। ४ व शोद्भव, वशम उत्पन्न । | इस मोके सिवा मातसे अनुमार चार प्रकारको वंशिका (सं० स्त्रो०) शिक-टाप् । १ अगुरु, अगर । मुरलिया और होती हैं। उनके गम मदानंदा, नंदा, २वांगी, वासरो। ३पिप्पली। विजया और जया ह। मदानन्दाम ताररन्द्र फुत्कार चशिन् (स० त्रि०) नाग हनि । वशसम्बन्धीय, वंशजान ।। रन्ध्रसे दम बंगुल पर, नन्दामें ग्यारद अंगुल पर, वशिवाद्य ( को०) वंशीवाद्य, वांसुरी। विजया दारह गुल पर गौर जयाम चौदह गुल वंशी (सं० स्त्री० ) वजकारणत्वेनास्त्यस्याः अच, गौरा- पर होते हैं। दित्वात् डीम् । १ मुरली, बांसुरी।। २ वार कर्षमा एक मान जो आठ तोले बराबर वशी बजाने में पटु काठचूडामणि श्रीकृष्णने गोपाङ्गनायों होता है। ३ गलोचन। ४ संग्रहणी-चिकित्मामें के मनोरञ्जनके लिये वृन्दावनमें बांसुरी बजाई थी। जातीफलादि चूर्ण। पृन्दावनमें "वशीध्वनि" इस अर्थसे मनप्राणहरणकारी वशीदास-भेटाभेद्याद नामवेदान्तिक ग्रन्थ प्रणेता। कृष्णका बांसुरी निनाद ही समझा जाता है। इसी कारण वशीधर (सं० पु०) १ यह जो चंगी बनाता हो । २ श्री. कविगण बंशीमे कवित्व प्रभाव आरोप कर गये हैं। काण । वशी श्रीकृष्णको अद्भूपण थी यह प्रेमरसास्वादी, बंशीधर-पक प्रसिद्ध वैयक अन्य प्रणेता। इन्ट्रोने वैद्य- वैष्णववियोकी भक्तिगाथासे रपट मालम होता है।। - कुतूहल और वैद्यमहोत्सब नामक दो प्रचलिरो । इनके सङ्गीतशास्त्रमे इस वंशीवाद्ययन्त्रका प्रकार और प्रस्तुत- "] पुल विद्यापतिने १६८२ ई० चैयरहस्यपद्धति लिम्बी यो। प्रणालो लिपिवद्ध है। जिस प्रकार विना तालके गान | बंशीधर-१ एक प्रसिद्ध गायिक। इन्होंने बाचस्पति की शोभा नहीं होती, उसी प्रकार वाद्ययन्त नहीं रहनेसे | | मिश्र-रचित तत्त्वकौमुदीकी टीश और शब्दप्रामाण्य- तालको महिमा समझमें नहीं आती। क्योंकि ताल " खण्डनको रचना की। २ छन्दोमरी और पिलालप्रकाश वाद्ययन्त्र से ही निकला है। उनमेंसे मुहसे फूक कर जो बांसुरी बजाई जाती है, उसको भी कहते है। " नामक टोकाकार । २५ वैदिक । ये कुशपतिका और । पुराने ग्रन्योंमें लिखा है, कि वशी वास होकी होनी होमविधि नामक दो वैदिक वन्य लिम्ब गये हैं। चाहिये ; पर सैर, लाल चन्दन आदिकी लकड़ीकी अथवा वशीघरदैवज्ञ-दैवतकालनिधि नामक संस्कृतज्योतिर्गन्थ- के रचयिता। सोने चांदोकी भी हो सकती है। यह बाजा प्रायः डेढ़ वालिस्त लंबा होता और मुहसे फूक कर वजाया जाता वंशोधारिन् (सं० पु० ) वंशी धरतीति धृ-णिनि । १ श्री- है। इसका एक सिरा वासकी गाठके कारण वद कृष्ण। २ वशीचादक, वह जो बासरी वजाता हो। रहता है। वद सिरेकी ओर सात स्वरोंके लिये सात वंशीपना ( स० स्त्री० ) योनिभेद । “वशीपना तु या छेद होते है और दूसरो ओर वजाने के लिये एक विशेष युक्तवशीपत्रद्वयारुति.।" (लोकप्र० ५७ म.) प्रकारसे तैयार किया हुआ छेद होता है। उसी छेद- नशाय (स० लि०) वो भवे इति मश-प्यञ् । सगजात, वाले सिरेको मुंहमें ले कर फूकते हैं और खरोंचाले । सम्भ्रान्त। छेदों पर उगलियां रख उसे बंद कर देते हैं। जव जो वंशीवट (सं० को०) वृन्दावनमे वह बरगदका पेड जिसके स्वर निकलना होता है तब उस स्वरवाले छेद परकी। नीचे श्रीकृष्ण बंशी बजाया करते थे। वृन्दावन देखो। उगली उठा लेने है। इसी तरह वार वार उंगलिया रख वावदन वशीवदन (स० त्रि०) वंशीन्यस्ताधर, सर्वदा वशी और उठा कर दजाते हैं। वजानेवाला।