पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४४१

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४४ बंशीवतनदास-चक जीवनचरिल, १२८८ सालमे देवा चौधरानो देवी चौब- उन्दनि अपने नवजीउनका प्रटन ला लोगोको जना रानीका कुछ अंश बङ्गदर्शन में निकल कर पीछे वह दिया था। पुस्तकाकारमें प्रकाशित हुआ। १२८४ सालमे यादमा टिपटी-मायां में टिश-गवर्नमेण्टको निक्ट इनकी चन्द्रने बनदर्शनकी सम्पादकना छोड़ दी। पीछे उनके बडे. अच्छी स्याति थी। उपयुक्त समयमें इन्हें पचान मिला। भाई सजीवचन्द्र सम्पादक हुए। सजीयनन्द्रको मृत्यु- भिमेण्टने नी मार्गदशनाले Mayeो इन्हें के बाद बङ्गदर्शनका निकलना बंद हो गया। रायबहादुर और सी, आई,, की उपाधि दी। पेन्शन के ___ कुछ वर्ण वाद साधारणी-सम्पादक श्रीयुक्त अक्षय बाद इनका अधिकांश समय सादित्यसंत्रा, धर्मचर्चा चन्द्र सरकार महाशयकी चेष्टासे नवजीवन प्रकाशित और ज्योतिःशास्त्रकी आलोचनामें व्यतीत होता था। हुआ। नवजीवनके साथ वहिमचन्द्रने मानो नवजीवन उनके पक भी पुत्र न था। फेवल दो स्याएं थी। प्राप्त यि । आनन्दमठक शेषमे तथा देवी चौधरानीमें पेन्सन पाने के बाद इनके शरीरमै गी शिथिलना मा गई । इन्होंने जिस ज्ञान और कर्मयोगका सूत्रपात किया, धारिखर १३०० सालको ची चैत्र अपराहकालके सीताराममें उसको परिणति है। वा कर २३ मिनिटमें बहुमूत्रजनित अर तथा मूत्र- नाली विस्फोटक रोगले पाले साहित्यरयो महामति वद्धिमचन्द्र परलोकको सिधारे। उनकी मृत्युले बग- साहित्यको जो क्षति हुई है, उसको फिर पत्ति होनेको नहीं। उस समय बदालके अधिकांग सामयिक और संबादपत्रके सम्पादकने दुःख प्रकट करते हुए कहा था, बिहिन बाबूकी मृत्युसे बद्गालका साहित्यराज्य राज- हीन हो गया। वहाली के उदय-गठनमें बदिमचन्द्रकी हृदयप्रतिमा विशेष कार्याकारी हुई थी । जातीय जीवन- श्री सम्मक परिणतिकै समय अपर नुनस्य जातिके मध्य भी शायद ऐसी महीयसी प्रतिभाका परिचय मिलता हो । वटिम दाबू सर्वतोमुखी प्रतिभाके असाधारण दृष्टान्त है। इतिहास, गणित, साहित्य वादि विषयोंमें ही वे सर्वाश्रेष्ठ वदिमचन्द्र चट्टोपाध्याय । थे। इनशीप्रतिका प्रधान टक्षण खानन्ता था ।गाल- में ऐसे जीवनका नितान्त यसन्नाय था। क्या स्वदेशी क्या बदके अन्तिम गौरवरवि सीतारामका प्रकृन थालेय विदेशी सबोंके निकट ये समान स्वाधीन चित्तका परिचय इनकी तुलिकासे कुछ भिन्नरूपमें चित्रित होने पर दे गये हैं। स्वतन्त्रता या जातीयता योये बिना वगालो भी उनके जीवन में जो संन्यासिरूपी महापुरुषका प्रभाव किस तरह अगरेजी शिनास उपकार उठा सकते हैं, विस्तृत हुया था, सीताराममें वदिमचन्दने वही चित्र वद्धिमचन्द्र उनके आदर्श थे। दंगालियोका नितान्त 'दिखानेकी चेटा की थी। उस समय वनिमचन्द्र के जमाई | दुर्भाग्य हुआ, कि उनके धर्म और सामाजिक मत अन रखालचन्द्र वन्दोपाध्यायने 'प्रचार' नामक एक मासिक अगमें फैलने पहिले ही वे परलोक सिधारे। उनका पत्र निकाला। वह मासिकपन वद्धिम वादूके परामर्शसे धर्मतत्व उनके धर्मजीवनकी अनुक्रमणिकामात थी। ही निकाला गया ण, इसमें सन्देह नहीं। प्रचारमें कृश्य । उनका धर्मप्रत गीताके समान था। निकाम भक्ति या चरित्र और गीतामर्म तथा नवजीवनमें धर्मतत्त्व प्रकाश कर सरल वृत्तिको सफलाकाझो ईश्वरमुसिता उनके प्रचारित ।