पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४४७

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४५२ नव दृश्यपट उन्मोचित कर रहे हैं। उस तुपारमण्डित । नदीतीरवनों ग्राम अथवा नगरोम विशेषतः स्नान करने शिखर पर अरुणकिरणके प्रतिफलित होनेसे तुपार | के घाटों पर देव मन्दिरादि प्रतिष्ठित हो कर देशवासियों- धवल पर्गतसानु एक ज्योतिर्मय हैमस्तूपमे पर्यवसित की धर्मपरायणता तथा स्थापत्यशिल्पका परिचय दे रहे हो रहा है। दिवाभागमे कभी वह सूर्यकिरणसे समु. है। ग्रामके मध्य अथवा पाास्थ ये सब अट्टालिकाये द्धासित हो कर दिग दिगन्त आलोरित करता है या मन्दिर श्यामल मास्य वैचित्यकी एकाग्रता भंग कर और कभी गाढ झटिकाले समाच्छादित हो कर अपूर्व देने हैं। कही कहीं भग्न मन्दिर अथवा प्राचीन प्रासा- मेघमालाको तरह निश्चल टण्डायमान है। ये पर्वत । वादि विध्वस्त हो कर जगलपूर्ण स्तृएराशिमें परिणत गानको विधौत करके छोटी छोटी स्रोतखिनी प्रसर । हो गये हैं। ये सब प्राचीन कीर्तिनिदर्शन प्रत्नतत्त्वविदों. गतिसे समतल उपत्यका प्रान्तमै अवतीर्ण हो कर परस्पर की आलोचना करनेकी चीजे है। पार्वात्य वनमाला के सयोगले पुष्ट हो एक एक प्रकृष्ट जलवार रूपये प्रवा- इन सब स्तूपोपरि गठित जगलों में सौन्दर्यका विशेष हित हो रही है । उक्त नदियों में हिमपादनिःसृत गंगा विकाश न होने पर भी उनमें विभिन्न जातीय हिंन्न तथा ब्रह्मपुत्र हो यहाले मान प्रवाह हैं। इसरो उनकी जीवोंका वास हो गया है। इन जगलो आस-पासमे ही शाखा प्रशाखाये हैं। गगा तथा ब्रह्मपुत्र देखो। भी छोटे छोटे प्राय विद्यमान हैं। वारत विक्रमे बगाल. यही नदियाँ बङ्गालकी शोभा तथा शस्य के विभिन्न नदीवत्ती ग्राम अथवा नगरोंमे प्राकृतिक समृद्धिका एकमात्र कारण हैं। हिमालयपृष्ट अथवा ; सौन्दर्यका इतना ही वैवस्य दृष्टिगोचर होता है, कि समी उत्तर-बगालके उच्च स्थानों को विधीत करके इन नदिन- स्थान मानो नवभपासे सुसजिन हो कर दर्शकों के चित्त- ने निम्न बङ्गालको निन्न भूमिमें एक मृद स्तर ला को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। कर संचय कर दिया है। इस स्तर को उारताशक्ति इस बंगाल प्रदेश में जितनी नदियां तथा शाखा देखी ऐसी है, कि जिस स्थानमे इस तरह रतर संचित हो जाती है, उन सवॉमे गंगा और ब्रह्मपुत्र प्रधान है। तिम्ता, जाता है, वहां पर्याप्त परिमाणमें विभिन्न प्रकारके शस्य भागीरथी ( हुगली), दामोदर, रूपनारायण प्रभृति कई उत्पन्न होते है। गंगा तथा ब्रह्मपुत्रके उत्तर उपत्यका दुसरी दूसरी नदिया अपेक्षाकृत क्षुद्र होने पर भी प्रधान खण्ड एवं निस्त बंगालके समतल प्रान्तमें इस तरह नदिया ही कहलाती है । इनके अलावे कई शाखा नदियों- नदी-जालसे समाच्छन्न हो जानस शरपक्षेतीको सीने से अथवा नदीके शविशेष विभिन्न नामसे परिचित जानेको विशेष सुविधा हो गई है। कमी कमी ये नदिया | हैं। जैसे अजय, आडियल-खा, बराकर, भैरव, विद्याधरी, वन्य विताडित हो कर उसय नीरवती प्रामको जलमय | वड निस्ता, छोट तिस्ता, बूढीग'गा, चित्रा, धलेश्वरी, कर देती है जिससे भूपृष्टमे एक प्रकारकी पीक जम धलकिशोर वा द्वारकेश्वर, इच्छामती, यमुना, कपोताक्ष, जाती है। यह पीक भी शस्योत्पादन विशेष उपयोगी करतोया, कालीगंगा, कालिन्दी, मेघना, मरा-तिस्ता, होतो है । कसी कमी टौर ठौर पर खाई लोद कर नाली | मातला वा रायमङ्गल, मयूगक्षी, पझा, रूपनारायण, प्रभृतिले जल ला कर खेत सीचनेको व्यवस्था की जाती रदीप, मरखती। है। उच्च भूमिमें अप अथवा पुकारण्यादि खोद कर मो उपरोक्त नदियां अथवा उनकी शादायें एवं संयुक्त कृषिकार्य सम्पन्न किया जाता है। इन सभी कृपिक्षेत्रों- खाइयाँ बगालके विभिन्न स्थानमें विस्तारित होनेसे के बीच छोटे छोटे गाँव, वडे गांव, नगर अथवा वाणिज्य-कृषिक्षेत्रादिको सींचनेकी जिस तरह सुविधा है, उसी प्रधान बन्दर समूह विराजित हैं। नगरके आस-पास तरह नौकाओंके द्वारा पण्यध्य एक स्थानसे दूसरे स्थान नगरवासियों के स्वहस्तगेपित पुग्पोद्यान अथवा फल- लाने पर एवं ले जानेकी सी सुविधा है। दुका विण्य रमादि परिशोमित उपवनसमूह त तन्मध्यस्थ अहा है, कि प्राकृतिक परिवर्तनसे नदियों को गति दुसरी लिकादि स्थानीय सौदाकी वृद्धि कर रही है। गंगादि । ओर परिचालित होनेके कारण कई नदियोंकी प्राचीन