पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४४८

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पदेश धारा प्राय साद गद ५। 7 धाराओं में वर्षा ऋतुक | यह स्थिर किया है, कि निम्नवरका अधिकाश स्था अतिरिक्त अन्य अतुओम बहुत मन शेष रह नाता समुद्रगममें पडा हुआ था।कालनमसे समुद्रगम नितना है। ये सब धाराये मरातिस्ता बूढीगगा प्रभृति नामों | हो पोछे हटता गया उतना हो चर पड़ता गया। पीछे से परिचित हैं। दूसरा दूसरी स्तिनो हा नदियोंको यही चर जासमाज बासस्थान के रूपमें परिणत हो धारागोंके थानोंम तो विद्युत ही नल नहीं रहता। गया है। पृथ्वीके नीचे पड़ी हुई शपूर (सीप)मडली इस नदियां ऊपर रैरपथ रिये पुर बाधे गये हैं। आदिको हड़ी और नरोभून मिट्टोके स्तरादि उसका र मरा हुन नदियोंको धारामाको भरफ उसके अपर प्रमाण देते हैं। महाभारतके यनपय ११३५० युधिधिरके लोहवम विस्तारित किया गया है। कई नदियोंसे रोधयात्रा विवरणम कौशिकोतीर्धसे कुछ दूर पाच सौ व्यापारको सुविधाक रिणे गरएट बहादुरने खाइ खोद नदीयुक्त गङ्गामागर सङ्गम तथा द से भी कुछ दूर पर उनका धाराओंको गुमरी योर परिचालित कर दिया। समुद्र के किनारे कलिङ्ग देश रहनेसे साफ मा मालूम है, निमस इस देशवामिग तिनेका तो लाभ पहुचना होता है कि समस्त तीर उस समय उत्ताराम फुन्छ हे और स्निने अत्य त हानि होती है । प्राचीन कितना दूर ता विस्तृत था। कौनिकीका वर्तमान नाम कोसी हीनदिया श हो पर म समय शत्यक्षेत्र में पर्या ] तारकेश्वटिया हरिपाल मादि प्रामोंके निकट यसित होगा है। उन स्थानो क दागिन्दे से | कौशिका प्राचीन गर्म दना जाता है। प्राय राजदून हाहाकार कर रहे हैं। वारिपातरूप जगदीश्वरका । मेगारयनोज परमासे तीन सौ मीर दूर गङ्गासागर अन्याय मिवा यहाका प्रजागो के प्राणों की रक्षाका समी धान लिख गप है। और कोई दूसरा उपाय नहीं है। कहीं कहीं पाइ, माघ मान र जिम प्रकार हम लोग नावारी जिरेक प्रभृति द्वारा देश रक्षा विधान हुया है, जितु चे मि स्थानीय गो का ही कुछ उपकार कर सकते हैं। समुपए पर सनद्वाप आदि चरजात द्वोपरी उत्पत्ति देखते हैं, प्राचीन पारम भी उसा प्रकार समुद्रतीरवत्तों म्वर्णप्रसू पगाल को दिया पाल्य होने पर मा इस समय नदियोंक मुहाने पर मिट्टा नम जानसे क्रम द्वापर जगामारसे यदाका प्रजा दुर्भिय तथा अनकटसे उत्पत्ति हुई थी। इसी कारण बहुत से स्थानोंके तमिफ प्रपोडिन है। अतिम 'द्वाप' दियारा या दिया' और 'चर' शब्द दिया दियो के अलापेलान म्याT पर फूप तथा तडा पडते है। चन्द्रदाप, नवदीप अपद्वीप, शुक्चर, वरचर गादिवे द्वारा यहाका नामाव दूर किया जाता है। कासादिया रूपदिया आदि स्थान शायद उसी चरस दामोदर आनि यात सो नदियों पर वाघ बाघ र नल रक्षाको व्यवस्था है। वहाकी छोटी छोटी जल धारामोंमे उत्पन हुए होंगे। धाधही यहा रोगोंदे पिये विशेष उपकारी है। उस समय लोसमाजमा प्रथित घर गागे चत्र __ बीरभूम आदि नाना म्यानां यहुसे गीतल, लवण | पर पक्ष, लतादिमे परिपूर्ण हो उपयर, प्राम और धारे और उग्ण जल पूर्ण प्रमाण दृष्टिगोचर होते है। पेमद धारे नगरमें परिणत हो गया है। वितु आज मा । म्यायन प्राचीनकार से ही सीमित्ररूपमें गिने जाते) यह चराभिधान दूर नहीं हुमा है। चमक, बदाइ हैं। सश विशेष चिरण निला प्रमग रिना गा गिदद आदि मिम प्रकार दीगर्मस पोछे सौधमाला दसवरण जो प्राचीनत्यमा परियार, महगाल मन्ति सुरम्य नगरमें परिणत हो गया है उमाप्रसार भूतत्वको आलोचना करनेसे सदनम ना जा नदास्रोतमे जाये गये घालूके रण मा मुहानाराममुद्र माना है। तट पर सश्चित हो गत हैं और जिसमे चरभूमिको भना उत्पचि होता है। आज जहा पर मारसमात्रिक दिन भूतत्वविदोन विशेष गधेपना और अनुशीलनक वाद' सागर ताययात्रिगण हे होकर स्नानादि परत, Vol 1 114