पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४५१

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वदेश पहलेसे सृष्ट हुई है। समुद्र एक समय उसीके चरण- कई तरहको फसल उत्पत को जा सकती है। इधर स्पर्श कर प्रवाहित हो रहा था। समय पा कर वहासे जमीन यदि कुछ मी जोती वाई न जाय पड़नी रह जाय, हट कर उसने इम तृतीय विभागकी जमीनकी सृष्टि की। तो बहुत शोत्र घास-पान जङ्गलसे परिपूर्ण हो है। यह भूभाग प्रथम और द्वितीय विभागले वहुत अर्धा- जाती है। चीन है। किन्तु अर्वाचीन होने पर भी द्वितीय विभागसे पहली कही हुई चार प्रकारको मिट्टियों में पहली प्रतार- बहुत अधिक कठोर हुआ है। किन्तु यह कठोरता प्रथम | को मिट्टा सबसे नीरस है। चौथे प्रकारको जमीनका विभागके बराबर नहीं। तरह किसी समय ही घने जङ्गलोंसे पूर्णकी अवस्था चतुर्थ विभाग-इस विभागको मिट्टो सब जगह पड्कोली नहीं होती। अथवा यहां उन्निदोंकी वृद्धि और विकाश भी है, किन्तु किसी किसी जगह जरा कडी है। प्रथम और ऐसी सनेज या शीघ्रतर नहीं। द्वितीय और तृतीय चतुर्थ विभागकी मिट्टाको वरावरी करने पर स्पष्ट हो | विभागीय जमीनको उारता प्रायः एक समान है पृथक धमाकान्त मालूम होती है। गङ्गाके दक्षिण राज तथा प्रथम विमागीय जमीनरी अपेक्षा बहुत गुणमे मतंज महल के दूसरे पार और उत्तर मालदहके पार-इन दोनों है । यहां तक, कि काई कोई अश चतुर्थ विभागके की मिट्टीका मुकाबला करने पर अच्छी तरह पार्थध | जैसा है। दिखाई देता है। राजमहलके पार गङ्गाके जलधार तक चतुथ विभागको मिट्टो मार तृतीय विभाग का मिट्टा पत्थर और कंकड़का रास्ता और कडी मिट्टी और ठोक यद्यपि दोनों ही काले समुद्र हट जाने से जाग उठा हैं उनके दुसरे पार सारी जमीन अथवा मालदह जिलाके सही, किन्तु दनक निर्माण प्रकरणा प्रकृतिगत विभि- दोआस पंकयुक्त मिट्टो या केवल राजमहल और माल- नता वहुन है। इस तरहको मिट्टीके निमाणसे दरके पार ही क्यों, समग्र गगीरथी के दोनों पार मिट्टोको समुद्र के नित्य मार भाटाका समय जल हट जाने के तुलना करने पर दोनों मिट्टियोंगे सामान्य दृष्टि से भो | साथ कुछ सादृश्य दिखाई देता है। भाटाकं समय प्रभेद परिलक्षित होता है। भागोरशीक पश्चिम पारके समुद्र के ढालुए. किनारे की भूमिमें जिस तरह स्तवक नितान्त धारकी मिट्टो ले कर तुलना करनेसे विशेष कुछ । रतवकमै दाग रख जल नीचे जा कर गिर जाता है, भा प्रभेद दिखाई नहीं देता। जहा तक नदीको क्रियासे यहां भी उसी तरह कोई नैसर्गिक कारणवश कालक्रम- मिट्टीका अश छुट गया है या पहले छुट चुका है, उसकी से जैसे समुद्रका जल स्तवक स्तवकसे हट कर पृषक सीमा पार कर जाने पर मिट्टोकी परीक्षा करना आव हो गया है, ठीक उसी तरह ही इन सारे जमीनका उदय श्यक है। हुआ है और उसके साथ साथ वायुके प्रबल आघातसे पश्चिममे भागीरथी, उत्तरमें पद्मा और उसकी शाखा- वालुकाराणि स्तूपीकृत हो कर और उसी कारणले प्रशारवा, पूर्वमे धलेश्वरी और मेघना तथा दक्षिणमें | कासे मजबूत हो प्रकाण्ड प्रकाण्ड बालके टीले दिखाई समुद्र तक इस गाड्य बहोप भूभाग ही चतुर्थ विभाग देते हैं, किन्तु चतुर्थ विभागकी मिट्टीकी निर्माण परि- का आयतन है। गङ्गा और उसकी असंख्य शाखाओंके पाटी दूसरे तरहको है। प्रवाह द्वारा लाई मिट्टोसे समुद्र भरा जा कर क्रमसे | वड्डालके दक्षिणका चौवीसगना, खुलना, वरिशाल दियारा पड़ कर वोपकी सारी जमीन सृष्ट हुई है। जिलेका दक्षिण भाग और सुन्दरवनको सवस्था मनोयोग इसलिये प्रायः समस्त भूभाग ही पक्षोली मिट्टो अति | पूर्वक परिदर्शन करनेसे इस चतुर्थ विभागकी भूमि- अविकतरपसे देखी जाती है। फलतः इस पडीली मिट्री- निर्माणका कौशल अति सहज ही अनुभव किया जा के गुणले इस भूभागकी प्रायः सारी जमीन उर्वराशक्ति | सकता है। नदोके प्रवाहसे लाई मिट्टी क्रिया द्वारा नदी- भी इतनी अधिक है, कि उसके साथ अन्य किसी विभाग के सङ्ग स्थलस्थ समुद्रमे चर पड़ता है सही, किन्तु वह को तुलना नहीं की जा सकनी। यहाँ वर्षके भीतर हो | एक वार हो कुछ स्थान चारों ओर समानभावसे भर