पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४५८

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वनदेश ४.३ धर्म। | धर्म प्रण विगा। तबसे वकालमें अनेक फकीरो, पीरो इनमय अधिवासियों में प्रधानत हिन्दू मुसलमान का आविर्भार हुथा। इन सब पीरो स्थानमें आज भा देशी और विदेती गणान और आदिम आर्या घमासेमी । मेला लगता है। हिन्दू मुमरमान दोनो भक्तिपूर्वक दिखाई देते हैं। हिन्दू मुमरमान और पान धमाय पोरसा पूजा रिया परने हैं। वहुन दिनो से मुमलमा लम्बी होने पर भी ये सम्प्रदाय विशेष शिभिन ।। के ससगसे हिन्दू ममान सत्यनारायणका( सत्यपीर) शेष शाक्त और चैष्णा मादि असे हि दुर्योमें प्रेणा | वो पूजा प्रार्शित हुइ है । मुमतमान श द देवो । भाग हैं और उनमें फिर रामान दो, वीरपन्यी मादि बङ्गालके मुसलमान राजत्यके मध्यकालम अर्थात् जैसे साम्प्रदायिक विमाग निखाइ देता है, मुसलमानों में इम्वीमन्ती १५वीं शता दोके अतमै सन् १४८५ इ०में भी उसी तरदरिया धीर गुनीके मिया यहाची पराजी! नवद्वापर्म श्रीचैतन्य महाप्रभुमा निर्मार हुवा । रक्षा आदि पृथक मत विद्यमार हैं। फिर राणामि गेमन, के सुविख्यात मुलता हुमन शाह गीर नसरत् शाहके कैलिक, यूनाना गिरजे और प्रोटेएएट समाजक मिया राजत्वकालमै उ दोन वय वैष्णव मत प्रचार किया मेडिष्ट चापेल पेमरियान मिसन एपिसकोपेलि था। उसके बाद चैष्णव धग उत्तरोतर बढ रहा था। यन मिसन, उदार मिमन मादि साम्प्रदायिक मतभेद । उप समसामयिक और परवत्ती वैश्णय कवि धग दिखाई देता है। गनाय्या सम्प्रदायका धर्मात स्थान प्रचारमें महायक हुए थे। हो न उत्तमोत्तम सस्त मेदसे पृथक पृषक है। प्रय रया मीर पुछ गाउपाद पर जनमाधारणके बौद्ध और विदूधमस्रोतकी प्रघर धन्या पर गमय सम्मुख भागवत यादि प्रोन घेणय धर्मक पिशद मर्मको बङ्गार भरपूर थी। पा-या वौद्ध राजाओंके अधि | प्यार को धो । उनको सुपरित पदरहरी पाठ कारमें बौद्ध धर्मका नो अक्ष प्रमाय बङ्गारम चिरान | और गान कर वहतरे रिमुग्ध वित्तमे श्रीचैतन्यके रहा है, अाज भी तान्त्रिक उपासनामें उसका प्रभून चरणो में आश्रय ग्रहण करते हैं। जोजोय गोम्यामी, निदर्शन विराज रहा है। वैदिक उपासनापद्धति उस समय रूपसातन कृष्णदास कविराज, कविकर्णपुर, नरोत्ता एक्दम ही यशरायसे अ तर्हित होग, र्थ, सासे मदा | दामनासुघोष ज्ञानदाम, गोरिन्द दाम विद्यापति, जयदेव राम आनिशर कनोजसे पाच साग्निा ब्राह्मण ला कर | आदि वैष्णव कवियो को ज्ञान हाती नाज भी य गाल बहालमें येदमागको अथ पण रम्बनेका चेष्टा की। उस के एक प्रा तसे दूसरे प्रात तक प्रतिध्वनित होती है। वादफे सनयशोय हिन्दू रानगण मा हिदूधर्म प्रतिष्ठा । श्रीचंद यदव और भ पाय कवियोंका नाम देवा। के रियनिशप मनोयोगा हुए थे। पल्लाल का कोरीन्य वैष्णवधमकी शाखा प्रशाखाके रूपसे भिजा, मच्यादा इस ब्राह्मण प्रभाव विस्तारका बया तर फर है। गुरुसत्य, सती मा, हरिपोला, रातभिकारी योर उधलकी दौद्ध और हिदुओफ समसमयमे बालम जैन धर्म सला, अनन्तयुली, कपिराजी, निहङ्गा बिन्दुधारी, का विस्तार हुआ है।म समय भी नाना म्याम नैन | अतियडी मादि मतक उद्र होने पर भी यथायमें यह और धौद्ध कत्तिया परिलक्षित हो रही हैं। इन सध) अभिर धर्ममत नहा कहा जाता है। सृष्टीय १त्यो कोसियांग पियरण बङ्गार के प्रतनरव प्रसङ्गम रिता | शनाट्दा भारम्भकालमें राजा राममोहन रायने वेदात गया है। हिन्दू न और बौद्धधर्मका पिपिरण उन ! मत प्रतिपाद्य प्राममत प्रचार किया। उमो समयसे ही एन्दोंमें देखा। आदि प्राप्तमाजको प्यात्ति हुए। इसके बाद उनके इसके बाद सायशके अध पतनम बगाल के मुमर | प्रार्तितमतका सस्कार र महात्मा फॅशनच द्रसेनी तप मानांके अभ्युदय होनेसे यहा पठान, मुगल आदि विभिन विधान (प्राहा) मतको प्रतिष्ठा की। राममोहन राय, केशव धेणोके इसलाम धर्मावलम्बियों का मायुदय हुमा । चद्र सेन भार माहासमाज शब्दमें विशप विवरण देखे । इसा समय बहाल के बहुतेरे अधिवासियो ने इसलाम . महात्मा राममोहा जिस समय दक्षिण पदम ब्राह्मधर्म