पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४६१

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वलिने उन निष्पाप पांच पुत्रोंको राजसिंहासन पर बैठा । से पहले ) अन बदमें अत्रिय समाजकी प्रतिष्ठा हुई थी। कर योग मार्गका आप्रय लिया । (३१ अध्याय) और तो पया, यहांके अनेक नृपतिने योगबल से या कर्म. ___ उद्ध,त प्रमाणोंके वल कहना पड़ता है, कि वलि फलसे ब्राह्मणत्व तक लान किया था। उसी बहुत पुराने अथवा उनके पांच पुत्रोंसे ही अंग वंगादि जनपद मे समयसे ही ब्रह्मालियों को जन्मभूमि यहु मात्यिक योगी, चैदिक-सम्ता प्रचारित और चातुर्गा समाज संग | ऋषि, शानी, मानी मीर महावीरोंकी लीलास्थली हुई ठित हुआ। यो । एमी कारणमे योधायन-धर्मसूत्र में और मनुग्नंहिता ____ महामारतकारने वलि-पुत्र अग, वगादिके नामानु , में जो स्थान भार्यावामके अनुपयुक्त कहा गया था, सार भिन्न भिन्न देशोंफी नामोत्पत्ति स्वीकार की है। महाभारतमें बगप्रान्त उमी फलिङ्गदेश "यनीय गिरि- पर्वोक्त थ वेद, ऐतरेय-ब्राह्मण और पतरेय यारण्यफ मोभित सतत शिजवित" पण्य स्थान कहा गया है। अनुवती होनेसे अवश्य ही कहना पडता है, कि आर्या ___ महाभारनसे हम लोग और भी जानते है, कि महाराज सभ्यता विस रसे पहले अंग, ग, पुण्डका नामकरण युधिष्ठिर के राजसूय या के समय यह बल्देश नाना छोटे सालि पुत्र जिन्होंने जिस राज्यका अधिकार पाया लोटे राज्यों में विभक्त था। मोमके पहले दिग्विजय था, वे उन्हों राज्यों नामानुसार सम्भवतः विख्यात उपलसमें समापर्व मे लिग्ना है। हए थे। जैसे पौण्डके अधिपति महानल चारसुदेव नाना ___ "भीमसेन अपने पक्ष के होने पर मो मुह्म प्रमुहरोको स मेत रोने पर , पुराणोंमे केवलमात्र पांडक' नामसे परिचित है। युद्धमे पराजित कर मगधवासियोंके पनि चले। वहां दण्ड, वलि-पुत्र संगको ६ठी पीढी तीचे अगाधिप । दण्डधार और अपर महोपालोको पराजय कर ये दशरथ लोमपादके नामसं विस्त थे। आप श्रीराम- सभी पकन हो कर गिरिव्रजम आये और जरासन्ध-नन्दन चन्द्र के पिता दशरथके सखा और मागके स्वशुर सहदेवको मानवनायुक्त और करायन कर सयको माथ थे। लोमपाद के प्रपौत्र चम्पसे गकी राजधानी चस्या में ले कर्ण के प्रति दोडे । इसके बाद पाण्डवश्रेष्ठ भोमने नामसे प्रसिद्ध हुए। अगाधिप चम्पके प्रपौत्र पात्र वह चतुरङ्ग-सेनाके बलमे पृथ्वी कंपित कर शवनाशन कर्णके न्नलाके विजय नामक एक पुट हुआ। हरिवशमें चे साथ घोरतर युद्ध क्यिा भार उनको संग्राममें पराजित 'ब्रह्मक्षेत्रोत्तर विशेषणसे विभूपित हुए थे। इन विजय. कर और वशीभूत कर पर्वतयासी राजाओंको महासमरमें के प्रपौत्र पुत अधिरथ सूनवृत्ति अवलम्बन फर क्षत्रिय- अपने वाहवलसे मारा। इसके उपरान्न तीन पराक्रम समाजमे निन्दित हुए थे। सूतने अधिरथ .र्णका पतिग्रह और महाबाहु पुण्डाधिप वासुदेव और कौशिकीकच्छ किया था इससे कर्णको सभी सूत के पुत्र कहते थे। निवासी राजा महाजा इन दोनों नृपनिको युद्धौ परा- __ जो हो, हरिवंशके विवरणमे यदि कुछ भी ऐति- जित कर बगराजकं प्रति धावमान हुए । समुद्रमेन हासिकता हो, तो अवश्य ही स्वीकार करना होगा, कि | और चन्द्रसेन नरपतियों को पराजित कर ताम्रलिप्तराज पौरव ऋषिराज बलिके समय अर्थान् महावीर कर्णकी | पर्यटाधिपति,मुलाधिपति और सागरवासी सबम्लेच्छा. २६वीं पीढ़ी पहलेसे ( वर्तमान समयके पाच हजार वर्ष- को जीता। • "ब्रह्माक्षेत्रोत्तर सत्या विजयानाम विश्रतः ।" (हरिव श वनमें जैन यौर बौद्ध-प्रभाव । ३११५७) यहा ब्रह्मक्षेवोत्तर शब्दका पिसीने अर्थ किया है, हम लोगोंने महाभारत, हरिवंश और नाना पुराणको ब्राह्मण और क्षत्रिय-दोनों धर्मावलम्बी, फिर बहुतोंने अर्थ किया आलोचना कर पाया है, कि मगध, अड्ग, वन और सुमके हैं:- शान्ति प्रभृति द्वारा ब्राह्मणतं उत्कृष्ट और वीर्यादि द्वारा । क्षत्रिय वीरगण आपसमें यात्मीयता और मित्रताके पाश क्षप्रियसे श्रेष्ठ" में आवद्ध थे, उनके आचार प्यवहार बहुत कुछ एक या । न हरिवंश ३१ यत्र्यायमें पूर्वापर वंशावली और विशेष विध- | इसका कारण यह, कि यहां क्षत्रियवंशमें जब कभी कोई | महापुरुष आविर्भूत हुए हैं, तभी उन्होंने साधारणको