पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४६२

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वनदेव उचहानोपदेश प्रदान कर उनत और एकभावापन करा , क्षत्रिय सन्तान अपने अपने प्राधान्यकी रक्षा में उद्युक थे, को चेटा कर पाया है। परबत्ती ग्राह्मणप्राय इस सम्बध ] वह हिदू और जैन दोनोंके हरिवशमें अल्पविस्तर चित्रित में बहुत कुछ निस्तब्ध है सही, पर प्र चीन रेन और ] है। यह भी सम्भव नहीं, कि नेमिनायकी तरह क्षत्रिय दौरोंसे उसका पथेट प्रमाण मिलता है। मादि | प्रचारकोंकी उत्तेजनासे पार पासुदेय एष्ण पो हो ब्राह्मणशास्र जिस तरह गुरुपरम्परासे मुम्ब मुखमें चलता गये थे। जो हो, उस अतीत युगको तिमिरात इतिवृत्त आ रहा है, आदिजैन और वौद्धमय भी उमी ताद गुरु । तसकुल कह कर और निस देह भ्रमप्रमादपरिशून्य परम्परासे मुख-मुखमं चरता रह कर ब्राह्मणशास्रओंको होनेकी सम्भावना न रहनेसे यही क्षान्त हुए। माति पीछे लिपिवद्ध हुआ है। इन सब परम्परागत जैन | महाभारतकार 'चीयश्रेष्ठाश्च राजान " कह कर क्षत्रिय प्रोसे हम लोग देख सकते हैं, कि जिनधर्मप्रचारक को श्रेष्ठताकी घोषणा पर गये है। कुरक्षेत्रके कुल क्षयकर २४ तीर्थरों से सिफ धादि जिन पभदेयके अलावा | महासमरसे ही मार्यावर्तका क्षत्रियमभार खा होने २ अपितनाथ, ३ सम्मरनाथ, ४ अमिनन्दन, ५ सुमति । लगा तथा सीमा त प्रदेशसे दूसरी दुद्ध जातियोंने नाए ६ पद्मपम, सुगर सचन्द्रप्रभ, सुविधिनाय । भारतमें घुमने की सुविधा पार । प्राह्मणप्राधाय भी १. शीतलनाथ ११ श्रेयामनाथ १२ वासुपूज्य । फैलो रगा। इस समय पूर्ण और दक्षिण भारतम १३ गिमलनाथ, १४ मनन्तनाथ १५ धर्मनाथ, १६ शान्ति | ब्राह्मणलोग क्मकाण्डप्रचारफे साथ पौराणिक देवपूजा नाथ १७ कु युनाथ १८ अरनाथ १६ मल्लिनाथ, मुनि । प्रतिष्ठामें उद्योगी हुए थे, पव क्षत्रियेतर जनसाधारण सुवन, २१ नमीमाध, २२ नेमिनाथ, २३ पार्श्वनाथ और बहुतेरे भादरफे साथ वर्गकाण्डवहुर सहज पूजामें अनु २४ महानो, इन २३ तीर्थक माय यगालीका सन्ना। रत हो रहे थे। पितु इस समय उत्तर पश्चिम भारतमें घट गया था। पे सभी परम ज्ञानी कह कर जैन समाज क्षत्रिय प्रभाव हास होने पर भी पूर्णभारतमें एकदम में 'देवाधिदेव' अर्थात् देवप्राह्मणसे श्रेष्ठ कह कर Bास नहीं हो सका, यर यहाके क्षत्रियों के गम्युदयको पूजित थे। सुविधा हुइ थी । ये कर्मकाण्डयाहुल देवपूजा, सतुए न उक्त तीर्थडमिसे २३यें तीथदुर पार्श्वनाथने इस्सी थे। आत्मसयम और आत्मोत्सर्ग लाममें समी सचेष्ट सन् ७१७ के पहले मानभूम जिरेके समेतशिखर पर | थे। दुक्षेत्रम क्षानजीवनका भीषण परिणाम देख उदों (वर्तमान परेशनाथ पहाइ पर) मोक्षलाम पिया ने तरवार चलानेको अपेक्षा मोक्षपपा उपाय निका २७०० पर्ण पूर रादयनमें उनके प्रमायसे बहुनौने हो । सना ही पुरुषार्थ समझाया। उसीके फ्ल्से पूर्ण भारत सत्मचारित चातुर्याम धर्म प्रहण क्यिा था । भरिए | में घुद्ध और तीर्घटका मम्युदय हुमा था। नेमिपुराणान्तर्गत जैन हरियशमें लिखा है, कि यादयपति पाणिनिफे मटाध्याया ६२१०० ) और नैन-हरि धीरप्या शाति नेमिनाथने अदयदादि देशमें आ कर या पढनेसे जाना जाता है, कि मारताय युगके बाद जैन प्रम प्रार दिया था। जिस साय भगवान श्रीरण | पूर्वी भारतमं 'अरिएपुर" और "गौडपुर' नामक दो ब्रह्मण्यधर्मरक्षाम सारयत धर्म प्रचारमें रित थे, उम। प्रधान नगर था। जैनहरिवशम अरिएपुर गौर सिंहपुरा ममय उनके हो पा शानि भिक्षधम प्रचारमें भR | पात्र उल्लेख पाया जाता है। अरिष्टनेमि धा नेमिनाथके सर हुए थे। उनका मत मालावरोयो । इसलिए नाम पर मरिएपुरका नाम पहा है, इसमें कुछ समय प्राह्मणों के धर्मप्रग्यमे स्थानलाम नहीं पिया सदो, पर नहीं। इन तीन माचीन नगरीमसे गीहपुर पुपदेशमें अनाचार्यगण उसकी रक्षा पर मायसमाजका पा और और भरिएपुर उत्तराद था, ऐसा बोध होता है। तरफा मित्र देने मरमर दे गये । यद्यपि उम गीरपुरसे हो पोडे गोडराज्यका नामकरण हुमागमा समय जिनधर्म माराममानमे सुप्रतिष्ठित हुमा थाया नदों वौद गौर जैन प्रयोष सिद्दपुर नाम प्रधान नगर मुझ समेह किन्तु माज मा जो पूर्ण भारत एक प्रास्तों या राइदेशमें मयस्थित था। इस प्रकार समस्त रादेश