पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४६५

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वादेश इस देश में क्षत्रियोंकी गोटी जम गई थी। उस समय उनके प्रभावले मगध, मंग, गधा फर्जिनमें सेना- अबुलफलको गणनानुसार कह सकता , किसम्राट | चार ही प्रबल हो उठा था । वगाधिपतिने उनके साथ पशोकके पहले ही इस म्यानमें कायमधोका अधिकार हो । वैवाहिक सम्बन्ध जोर लिया था। लिगाधिपनिने चला था एवं प्राचीन कालीन कायाराजे उनके । शायपति एपोशाहको फन्याका पाणिग्रहण किया था। अधीश्वर मगधाधिपतियोंके मतानुवत्तीं थे। उनके अभ्युदयकालमें युमुम्ब भलियोंने उनको यो अशोकके बाद उनके पात्र सम्राट् दशरथ जैनधर्मानु- सहायता की थी। मारवेल भिक्षगजने जिस मगधपति रक हुए। घरायरके नागार्जुनी पहाट पर उत्तीर्ण दश पर थाक्रमण किया था, वे ही सम्मवनः अन्तिम मीळ. रथही लिपिले जाना जाता है, कि उन्होंने जैन आजीवकों- पति पदध थे । मिक्ष गजके कलिंगमें प्रत्यावर्शन करने के मम्मानार्थ बहुतों दान की व्यवस्था की थी। पर घावध भी फिरसे अपनी गजधानीको लौट शाये। ___ अशोक-पौत्र दशरयके बाद मौर्यागीय पांच राजे वद्री दुर्य लता देख कर उनको गजन्न करनेका पाटलिपुत्रमें अधिष्टिा हुए। उनके नाम ये-सहन, । पड यन्त्र-पट रचा गया। बाणमहके धचरितम लिना मालिक, सोमशर्मा, शतधन्वा तथा वृदय । इन पांचों है, कि मैन्यबल परिदर्शन गनेश छटनाने दुष्ट पुप. राजाओंके राज्यकाल में मीर्य प्रभाव बहुत कुछ फीका पर मिलने अपने ग्वामी मौयं चाहश्को मार डाला। हम गया था । अशोक जिम मुविस्तीर्ण साम्राज्यको प्रतिष्ठा तरहने सेनापति पुष्पमिवने मायमिंदामन पर अधि- कर नये थेउस विपुल साम्राज्यको रक्षा करनेकी शनि । फार जमाया। मौर्य राजमन्त्री कैद कर लिये गये । पुर. उनके वश में थी ऐमा नहीं जान पड़ना । अशोक मिदफे साथ ही साथ प्राय: १७६ ग्व० पूर्वाद शुगराज- दूर दूरके देशों में शासन निर्यात के निमित्र गजप्रतिनिधि वंशको प्रतिष्ठा एई। राग्न गये थे । धीरे धीरे वे अयमर पा कर स्वाधीन हो प्रामणाम्युदय । गये । मार्यराज दशरथ जिस राजगतिका परिचय दे गये ___ पुष्यमिन्न देवधिप्रमका थे । ग्राहरण-पुरोदितको सलाद- है, उनके वगधरोंमे उसकी श्री-योनि भी पाई नहीं। से उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया था। अवमेघ सम्पन्त फर जाती। पुष्यमित्र भारतके मन्त्राट् हुए थे। बहुत समय बाद चन्द्रगुप्त तथा अशोक-प्रियीने ३१५३१६से लेकर | वे पूर्व भारतमे वैदिक धर्मप्रचारमें मनोयोगी हुए । रहों २१५२१६ पन्ति साम्राज्य शासन किया। प्रियदर्शी पुष्यमित्रके राज्यकालमे ग्रीक नृपति मिनिन्द्र (Perundcr) देशी। अवदानादि दौद्धमन्यों के मतानुसार अशोक ने मध्यमिका और साकेत विजय वर पाटलिपुत्र पर वाट १०० वर्ष तक मौाधिकार रहा। हमला किया। किन्तु वहाँमे उन्हें लौट जाना पड़ा। उदयगिरिको हाथोगुफा १६४ मीर्यान्हमें उत्कीर्ण पाटलिपुत्रके पूर्व यवनोंने आगे कदम बढ़ानेका माहस खारवेलकी मुबहन् शिलालिपिसे जाना जाता है, कि न किया। वहुनेरे अनुमान करते हैं, कि उस समय कलिङ्गपनि भिक्षुग पारवेल उनके १२वे राज्यामे ययन लोग सशोक कोर्मियों को तोड़-फोड गये थे। फिर (अर्थात् १६३ मौब्दिमै ) गंगातीर जा कर मगध्रपतिको वादग्रन्यो अनुसार पुग्पमित्र ही अशोकके कीर्तिलोपके अपने चर्म लाया था। मगधपनि उनके भयसे मथुरा कारण थे। जो हो, यवनके आक्रमणसे मगधराज्य बहुत भाग गये। पहले ही लिखा जा चुका है, कि वीरमोक्षके | कुछ विश्वल हो गया था। पीछे चूढ़े राजाफे मरने पर १५५ वर्ण वाट अर्थात् ३१२ खष्टके पूर्वाष्टमें चन्द्रगुप्तका उनके वंशधरको धोना दे फर दूमरे दूसरे राजे राज्य अमिषेक हुआ था। इसी अमिपेक्यसे मौर्याद लेनेका पड्यन्त्र रचने लगे। उसी पडयन्त्र के फलसे बारम्म हुमा । म तरहसे ईसाके जन्मसे २०६ वर्ष पूर्ण अभिनयकालमें मित्रदेवने अग्निमिलका सर काट डाला। कलिंगपतिने मगध विजय किया था। वे दूसरे दूसरे पडयन्त्रकारियोंने अन्निमित्रके कनिष्ठ सुज्येष्ठको राजा धर्माका बिहेगी न होने पर मो म्वयं निष्ठावान जैन थे। बनाया। किन्तु शुद्ध सुज्येष्ठ के भाग्यमें भी अधिक दिन