पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४६७

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निको प्रभावले हो ना, यवन, पारद और भार , पीच अवन्ती, अनूर, नीद, आनन, सुराष्ट्र श्यन्न, तीच भास्करशिल्पका समोकरण या । सम्राट अशोक- कच्छ, निधि, मांगेर, कुशा, अपरान्न, निराद आदि कोसमय केवल भारत में ही क्यों, उदर मध्य पगिया और जनपद अधिकार महाजनपकी उपाधि प्राण को! युरोपमै बौध का प्रचार होने पर भी उददेवडी झोई पाटलिपुताय मी उनले अनुत्तीर थे । इस प्रतिमा प्रतिष्ठित न हुई। अशोकर समय बुद्ध प्रतिमा राजद्रोटिना के समय पार्शवपुत्र के निकट लिच्छविगण पूजाको भावश्यकता मी किसीने हृदयगम नही लिया। प्रबट हो छ। जन सामन्तगों ने मा स्वाधी- पहले लिया जा चुका है, कि माहोपीय गणोंने ही नना चालन की । इनर-पश्चिम नमान्नो पानिक भारतमे वप्रतिमा निर्माण कर प्रचार दिया था। इस माननयंग नर उठाने लगे। बार करना पया, वसुदेव का प्रथाके अनुवती हो कर महायान मत प्रचार साथ मृत्यु के साथ उचर-भारतीय मामास हो नापति बुद्धकी लो ठाविपरिणी नाना प्रतिमा गढ कर गया नया आमीर, गति , लिच्छवि, नाग, दिदय आदि भारतके नाना पुण्य स्थानोंम प्रतिष्ठित गने लगे। उन जातियों ने नामा म्यान अधिकार का छोटा छोटा राज्य सब यपूर्व मास्कर शिल्पोंका निदर्शन भारतको नामा कायम लिया का नाम उत्तर-मारनने चिलुम हो स्थानोले ही अाविष्कृत हुआ है । उन सब शिल्पनैपुण्यकी गया। देने भारतीय मिल्पिगण सन्यनगननसामाजमा शी लीगेसमागमे दिवाने पाटलिपुत्र इयल हो गये हैं। दिया। बुग्यका विषय है, कि उनका इतिहास लिने का सनिक जो महारान मन प्रचार कर गये, समय पा; उपग दाज तक भी बाहर नहीं हुआ है। पूर्वी भारतके कर वह संगाधित और परिवर्तित हो तान्तिक दौड । नाना म्धानमित्यन्धापनमे प्रयामी सामन्ता बाग धर्ममी सृष्टि हुई थी। एक दिन समस्त बनादेश इस अलन्द्रिोद उपस्थित हुआ जिससे अनेक राजकुमार तान्त्रिक बौद्ध सागरमें दब गया था, वह वात पीछे लिप्नी म्वदेश परित्याग कर तुद काम्बोज वर्तमान स्न्यो जायगी। दिया), सदोष ( अण्णम्) और यहीप चले गये तथा रहाराज कनिष्कके बाद उनके पुत्र हुबिक या एक नजित बन्योज यादि स्थानमें नैव और नगरकोर्शि सिंहासन पर बैठे । पेशावरसे ले कर पूर्व बन पर्यन्त प्रतिष्ठित की। सैकटी या योत चला, दाज भी यह उनके कब्जेमे था। नाना स्थानोंसे उनकी जो शिला। सर हिन्द्रकीर्ति विद्यमान है। लिदि लोग मुद्रालिपि निकली है, उससे बोध होता है री सदी मध्यभारतमे तैकुट क या हैहयवंश प्रबल २. उन्होंने पितासे अधिक समय तक साम्राज्य शासन हो के। इस बंगले ईश्वरदत्त २४६ ईमे उजयिनीके किया था। उनके समयमें मी शासन करने के लिये मनपा को परारन पर चेदि या कलचुरि-सवत् लौटे। पाटलिपुत्र में उनके अधीन एक क्षत्रप अधिष्ठित थे। उनके सादग्रसे योन शहर दम्बल करनेको बेष्टा विका पुत्र शकाधिप वसुदेव या वासुदेव थे। की ; किन्तु उनका उद्देश्य पर्थ हो गया। री सदीके उन्हो ने ट से लेकर ७८ काम तक साम्राज्यका भोग शेष मागमे गुप्त और उनके लडके घटोत्कच नामक दो किया था। उनकी मुद्रामे शिव, त्रिशद और नन्दिमूर्ति सामल महाराज मगधरें प्रबल हो । घटोत्कचके पुत्र किन थी, इसलिये व नरपति कहलाने थे। कनिक म चन्द्रगुप्मने लिच्छवि गजान्या सुमारदेवीसे व्याह कर जो मुविस्तीर्ण माम्राज्यका पतन कर गये, वसुदेवके पाटलिपुत्रदा सिंहासन पाया। थोड़े हो दिनोंमें वे सनर उतने ध्वंसका सूत्रपात हुआ। सम्भवतः उनके वार्यावर्त्तके सम्राट हो गये। गुम राजपश देग्नो। अन्य धर्म ग्रहण करने पर उनके अधीन दूर देशवामी कर्णसुवर्ण ( मुर्शिदाबाद जिलेकी रागामाटो) और क्षवषमण विरक्त हो कर सभी स्वाधीन हो गये । उनमेसे उसके निझटबत्ती प्राचीन ईटके स्तूपमे समय समय पर उन्जयिनीपति रुद्रदाम प्रधान थे। उन्होंने थोड़े हो समय- यहाके गुमराजों को समय प्रचलिन बहुत स्वर्णमुदा