पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४८५

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वडनामापा १६३ विभक्ति। नहीं जाना जाता । पोळे या 'क' का बार धारण संग्कृत और प्रानकी तरह वङ्गालो मापाम भी मात्र फरका और सम्प्रदान जताने के लिये प्रचलिना विभक्ति प्रचलिन है।पहला भापानी विभक्ति पहले कहां- मिन्नु पूर्व वाला यही 'के' पर्म और सम्प्रदान को छोट से अनुकत हुई है उसका अनुमान करना मान नहीं है। पर अन्य सभी विभक्तियोंम युक्त होता था। इसमें भी क्योंकि बदला विभक्ति में कुछ संरकनकी अनुयायी अने प्रमाण मिलने । अतएव याल कमसे कौन किस है। विशेषत' कई जगह प्रथमा विभक्तिका एण्यचन प्रकार परिवर्तित या उमका निर्णय करना यात संस्कृतका विसर्ग वाला नहीं आता। पाटिन । वमनन दिलाने के लिये मी जिस प्रकार फिर एमी प्रकार प्रथमा विभक्तिके एकवचनमें | 'दिगेरा' इत्यादि व्यवहार होनाई मी प्रकार पुराने प्रथम प्राकृतका गनुयायी व्यवहत था। पान्ले यावचन जताने लिये काम मात्र 'म' प्राकृतमे प्रथमा विभक्ति जिस प्रकार एकवचनमें 'साल' 'यादि प्रभृति जोडे जाने थे। जोडा जाता है, बगलामें भी उसी प्रकार प्रथमा विभक्ति कमोन्नति के विधानानुग्मार पाछे इस आदि गन, के पम्वचनमें पहले एकार जोदनेकी रीति थी। 'क्षादि शकसाथ पष्ठीया योग हो र गृक्षदिर (प्राकृत-"शामी ए निद्वणके विशोहेदि" मक. ३ 4:) हुआ है तथा उस पृक्षादिषे उत्तर फिर ग्यार्थी युरू प्राकृत भाषामे द्विवचनमें कोई भेद नहीं दिखाई। मा है। देता । प्रायः दोनों ही जगह सिर्फ संरयाबोध वा याकार- पूर्व और पश्चिम बदमें यही कही आज भी फा योग हुआ है। अमे-"भव आदि तम दाभदाय 'सामागो तोमागो रामागो' मालिका प्रहार देया जाता परिमो जादो देउण आणामि मुगलया" (१) "यदि है। वेद आदिशजन्य ..' युक्त माव पीछे 'क' मे पुत्ता" (२) इन दोनों स्थानोंके "न जानामि के रूप परिवर्तन आए। आमागो आदिन्ट कुशलयो" तथा "कुल मे पुदको” द्विवचनको जगह प्रारून 'सहावं' 'तुमाकं से प्रनीन होने हैं। आकार जोडा गया है। यहाला मापामें अभी टो बचन करणकारक वोधक अभी जो द्वारा भौर दिग द्वारा प्रचलित है, एकवचन और बहुपचन, द्विवचन-वोधक व्यवहन होता है, पहले यह सब कुछ भी नहीं था । उस किमी विभक्तिका प्रचलन नहीं देखा जाता । पूर्वपचलिन समय संस्टन 'रामेण' को जगह प्रारुतमे 'रामएका यदलामें बहुवचनके वोधके लिये प्राकृनके अनुयायी | व्यवहार था। द्वारा शब्द संस्कन द्वार शब्द निकला यो झार जोडा गया है। है। प्रारत भाषाको पञ्चमीके बहुवचन में 'हि'नो' व्यबहन ___ आज कल फिर लेख्य भाषाके वहुवचनमें 'आ कार होता था,-"भासो हितो तो।" (वररचि) जोडनेकी प्रथा नहीं देखी जानो। अभी उस स्थान पर बङ्गलामें यह हितो' पद 'हाते' रूपमें परिणत 'या 'र' शब्द अधिकार कर बैठा है। है। पूर्वकालमें बङ्गलामे उसने 'दन्त' रूप धारण किया ___ बदलामें द्वितीया और चतुर्थी, इन दोनों विभक्तिम | था। ही 'के' प्रचलित है। मोक्षमूलरके मतसे इस 'क' ___ फालकमसे वह 'इन्त' '६इने' रूपमें परिवर्तित हुआ संस्कृतके स्वार्थमें 'द' होता आया है। प्राकृत भापामें है। फिर कही कहीं 'हने' रूप हुआ है। यह का मी इस 'क' का बहुत प्रचार है। विशेषतः गाथामे इस प्रायःप्राचीन प्रन्यों में देखा जाता है। 'क' का प्रचलन सबसे अधिक देता जाता है। वररुचिके प्रारुतप्रकाशके मतसे पष्ठीके वनुवचनम ____ ढाई सा नर्प पहले बङ्गली भाषामे विशेषरूपसे इसी 'ण' होता है। 'ण' और बङ्गलाका 'र' दोनों हो पक प्रकार का प्रचलन था। वह कभी फर्ता और कभी मूर्द्ध पय वर्ण हैं, स्वभावतः हो 'ण'के उच्चारणगत प्रभेदन का कारकरूपमें व्यवहत होता था। किन्तु इसका कौन उडीसामें आन भी क.थ्य भाषामे 'ण' और 'र' एक ही कर्ता और कौन रूपमे व्यवहत होता था, वह सहजमें। रूप सुना जाता है।